निदानात्मक शिक्षण एवं उपचारात्मक शिक्षण - अधिगम उपागम

Nidanatmak Shikshan evam Upacharatmak Shikshan - Adhigam Upagam

निदानात्मक शिक्षण एवं उपचारात्मक शिक्षण

Diagnostic Teaching and Remedial Teaching

यदि कोई छात्र लगातार किसी विषय में अनुत्तीर्ण होता है या पढ़ने में कमजोर होता है तो छात्र की असफलता की जानकारी प्राप्त करना निदान कहलाता है। छात्र की असफलता के कारणों की जाँच कर इनके निराकरण के लिये उपाय किये जाते हैं तो यह उपचार कहलाता है। निदानात्मक परीक्षण और उपचारात्मक शिक्षण की प्रतिक्रियाएँ साथ-साथ रहती हैं।

निदानात्मक शिक्षण एवं उपचारात्मक शिक्षण प्रक्रिया के सोपान

निदानात्मक शिक्षण एवं उपचारात्मक शिक्षण क्रिया निम्नलिखित पदों में पूर्ण होती है:-

  1. वर्गीकरण- पहले छात्रों को उनके बौद्धिक स्तर के आधार पर विभिन्न वर्गों से वर्गीकृत कर लिया जाता है।
  2. कठिनाई की प्रकृति की जानकारी- इसके पश्चात् छात्रों को होने वाली कठिनाइयों की जानकारी प्राप्त करते हैं।
  3. पिछड़ेपन का कारण- छात्रों की उपलब्धि अनेक आन्तरिक एवं बाह्य तथ्यों से प्रभावित होती है; जैसे- शैक्षिक क्षमता की कमी, अध्ययन की आदतें, कार्य करने की आदतें, कुशलताओं की कमी तथा भावनात्मक पर्यावरण और भौतिक कारण आदि।

निदानात्मक शिक्षण

Diagnosis Teaching

निदानात्मक शिक्षण का महत्त्व (Importance of diagnosis teaching)

शैक्षिक निदान से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है, जिसकी सहायता से हम व्यक्तिगत छात्रों की कठिनाइयों और उनकी अयोग्यताओं का अनुमान लगाते हैं। इसका उद्देश्य है कि सीखने में कम से कम कठिनाइयाँ हों। छात्रों की त्रुटियों का विश्लेषण करके हम उनके लिये उपचारात्मक शिक्षण की योजना बनाते हैं।

उपचारात्मक शिक्षण का अर्थ है इस प्रकार का शिक्षण जिससे छात्रों की त्रुटियों का समाधान हो सके।

शैक्षिक निदान छात्रों के लिये अति आवश्यक है जिसके महत्त्व को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है:-

  1. छात्रों को शिक्षा ग्रहण करते समय आने वाली कठिनाइयों तथा उसकी न्यूनताओं का निर्धारण करना ही शैक्षिक निदान है।
  2. शैक्षिक निदान में शिक्षक अपने विद्यार्थी की सम्प्रति में कमी के कारण का अध्ययन अपने वैयक्तिक स्तर तक करता है। उसको अपनी स्वाभाविक गति से शैक्षिक क्षमताओं के विकास के अवसर एवं तदनुकूल वातावरण उपलब्ध कराता है।
  3. इस क्रिया को अपनाने में शिक्षण एवं मूल्यांकन दोनों में गतिशीलता बनी रहती है। गतिशीलता शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों का शीघ्र परिवर्तित युग में समायोजित एवं समयानुकूल आचरण का विकास करती है। उसको निरन्तर ताजा बनाये रखती है और समय के स्तरों एवं अवसरों के पिछड़ने से बचाती है।
  4. अनेक शैक्षिक दुर्बलताओं के कारण व्यक्तिगत न होकर शिक्षार्थी के सामूहिक संगठन से सम्बन्धित होते हैं, जैसे- शिक्षार्थी के माता-पिता का अशिक्षित होना, शैक्षिक वातावरण न मिलना तथा शिक्षार्थियों को विद्यालय के बाहर की शैक्षिक गतिविधियाँ न मिलना। यह सभी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनसे हमारे शैक्षिक निदान की प्रक्रिया जटिल बन जाती है। इसलिये शिक्षार्थी का विस्तृत अध्ययन केस स्टडी (Case study) के माध्यम से किया जाता है।
  5. सामान्य सम्प्राप्ति परीक्षाओं की अपेक्षा नैदानिक परीक्षण अधिक विस्तृत उद्देश्य लिये होते हैं यहाँ यह मानना भी अनुपयुक्त न होगा कि विभिन्न सम्प्राप्ति परीक्षाओं का कोई नैदानिक महत्त्व नहीं है।
  6. शैक्षिक निदान केवल छात्र को स्तरांकन वर्गोन्नति, विशेष ग्रेड अथवा श्रेणी देने तक सीमित नहीं है वरन् इसमें सुधारवादी दृष्टिकोण भी सम्मिलित है, जिसके अध्ययन से शिक्षार्थी की दुर्बलताओं को दूर करके प्रभावी शिक्षण के आयोजन द्वारा शिक्षार्थी क्षमताओं का उच्चतम सीमा तक विकास किया जा सकता है तथा उसको अधिकतम समाजोपयोगी बनाया जा सकता है।
  7. निदान परीक्षण में तत्परता पर भी ध्यान दिया जाता है।

निदानात्मक परीक्षण के उद्देश्य (Aims of diagnosis tests)

निदानात्मक परीक्षण के उद्देश्य निम्नलिखित हैं:-

  1. निदानात्मक परीक्षण छात्रों की कठिनाइयों का उपचार करता है।
  2. यह छात्रों की विभिन्न विषयों में उपलब्धियों का मापक होता है।
  3. इसके माध्यम से छात्र की किसी मुख्य विशेषता या गुण का ज्ञान होता है।
  4. छात्र की जन्मजात कठिनाइयों का ज्ञान होता है।
  5. अध्यापकों को अपनी शिक्षण विधियों को प्रभावशाली बनाने में योगदान प्राप्त होता है।

इस प्रकार हम कहते हैं कि निदानात्मक परीक्षण व्यक्ति की जाँच करने के पश्चात् किसी एक या अधिक क्षेत्र में उसकी विशेषताओं एवं कमियों को व्यक्त करता है। नैदानिक परीक्षण हेतु अनेक साधन काम में लाये जाते हैं, जिनमें अवलोकन, साक्षात्कार, प्रश्नावली चैक लिस्ट तथा स्वकार्य विश्लेषण आदि प्रमुख साधन हैं। नैदानिक परख-पत्र का निर्माण सबसे उपयोगी है। विज्ञान में वस्तुनिष्ठ प्रश्न काम में आते हैं।

निदानात्मक प्रश्न-पत्र कैसे बनायें? (How to make remedial question paper ?)

निदानात्मक प्रश्न-पत्र बनाने के लिये मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं:-

  1. निदानात्मक प्रश्न-पत्र के उद्देश्यों का निर्धारण करना।
  2. विषय-वस्तु का विश्लेषण कर शिक्षण बिन्दु का निर्धारण करना।
  3. प्रत्येक शिक्षण बिन्दु पर तीन, पाँच अथवा सात ऐसे सरल प्रश्नों का निर्माण करना जिनके उत्तर अत्यन्त संक्षेप में दिये जा सकें।
  4. प्रश्नों का समूहीकरण करना तथा सीखने के क्रम के अनुसार प्रश्नों को सरल से कठिन के क्रम में लिखना।

विषय-वस्तु का विश्लेषण (Analysis of content)

विषय-वस्तु का विश्लेषण करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है:-

  1. शिक्षक को विषय-वस्तु का पूर्ण ज्ञान हो।
  2. विषय-वस्तु से सम्बन्धित जितने भी विचार योग्य शिक्षण बिन्दु हैं, उनका संग्रह किया जाय तथा उनसे सम्बन्धित विषय का ज्ञान पूर्ण ज्ञात हो।

जैसे- भौतिक एवं रासायनिक परिवर्तन प्रकरण से सम्बन्धित छात्र की दुर्बलता देखनी है तो इनकी परिभाषा, अन्तर एवं प्रयोग पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न बनायेंगे। यह प्रश्न विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। विषयगत कमियों को खोजने के पश्चात् उन क्षेत्रों पर उपचारात्मक कार्य किया जाता है। इसके पश्चात् पुनः परीक्षण किया जाता है और उससे यह पता लगाया जाता है कि क्या छात्र उन क्षेत्रों में पारगंत हो गया है? यदि फिर भी कमी दूर नहीं होती हो तो फिर उपचार की प्रक्रिया अपनायी जाती है। इस प्रकार पूरी कमजोरी होने तक यह व्यवस्था चलती रहती है।

वस्तुनिष्ठ परीक्षण के प्रकार

वस्तुनिष्ठ परीक्षण के प्रकार निम्नलिखित हैं:-

1. पूर्ति परीक्षण (Completion test)

इसमें दिये गये रिक्त स्थानों की पूर्ति छात्र सही शब्दों को लिखकर करता है; जैसे:-

  1. वह यन्त्र जिससे वायुदाब नापते हैं उसे . . . . . . . . . . . . . . . . कहते हैं।
  2. प्रकाश-संश्लेषण में पौधे . . . . . . . . . . . . . . . . गैस लेते हैं।
  3. HCI का रासायनिक नाम . . . . . . . . . . . . . . . . है।
  4. KCI का रासायनिक नाम . . . . . . . . . . . . . . . . है।

2. साधारण स्मृति परीक्षण (Simple recall test)

इसमें छात्रों को एक सीधे प्रश्न का उत्तर एक शब्द में देना पड़ता है:-

  1. मनुष्य में मूत्र को छानने का कार्य कौन करता है ?
  2. मानव में कुल कितनी हड्डियाँ होती हैं ?
  3. पौधों में भूमि से पत्तियों तक खाद्य पदार्थ कौन ले जाता है ?
  4. श्वसन क्रिया में हमारे शरीर का कौन-सा अंग भाग लेता है ?

3. बहुनिर्वाचन परीक्षण (Multiple choice test)

इस परीक्षण में चार विकल्प दिये होते हैं, उनमें से सही विकल्प को चुनना होता है।

(1) इसमें कौन-सा जीव माँसाहारी नहीं हैं?
  1. सिंह
  2. कुत्ता
  3. लोमड़ी
  4. हाथी।
(2) निम्नलिखित में कौन-सा रासायनिक परिवर्तन का उदाहरण है?
  1. बल्ब का जलना
  2. कम्प्यूटर का संचालन
  3. दिन-रात का होना
  4. बर्फ का पिघलना।

4. सत्य असत्य परीक्षण (True false test)

इस परीक्षण में कुछ ऐसे कथन दिये गये हैं। परीक्षार्थी उसके सामने हाँ या नहीं अथवा सत्य/असत्य में से किसी एक पर निशान लगाता है:-

  1. लकड़ी बिजली का सुचालक है। - हाँ/नहीं
  2. H, गैस हवा से भारी है। - हाँ/नही
  3. पौधे सदैव प्रकाश की ओर झुकते हैं। - हाँ/नही
  4. परमाणु विद्युत उदासीन होते हैं। - हाँ/नही

5. मेल परीक्षण (Matching test)

इसमें दो अलग-अलग समूहों में शुद्ध अथवा अशुद्ध कथन दिये जाते हैं। छात्रों को पहले प्रत्येक शुद्ध या अशुद्ध कथन के लिये दूसरे समूह से सही को छाँटना पड़ता है।

उदाहरण- शुद्ध कथन का मिलान कीजिये।

1. H2O ऑक्सीजन
2. सूर्य जल
3. आकाश तारे
4. O2 ताप

6. युक्ति परीक्षण (Reasoning test)

इसमें एक कथन के अनेक प्रकार के उत्तर दिये जाते हैं और तर्क के आधार पर जो सबसे उपयुक्त होता है, उसे छाँटना पड़ता है; जैसे:-

उदाहरण-जो सबसे उपयुक्त उत्तर हो उसे रेखांकित कीजिये

हवा मिश्रण है क्योंकि-

  1. यह दिखायी नहीं पड़ती।
  2. यह पानी में घुलनशील है।
  3. इसका लिटमस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  4. इसकी रचना प्रत्येक जगह भिन्न होती है।

5. वर्गीकृत रूप (Classification type)

यह मेल परीक्षण का ही दूसरा रूप है, इसमें ऐसे शब्दों का समूह प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें से एक बेमेल हो। छात्रों को बेमेल शब्द छाँटकर अलग-अलग करना होता है, जैसे-

  1. लोहा, ताँबा, जस्ता तथा मैग्नीशियम,
  2. हाइड्रोजन, कैल्सियम, नाइट्रोजन तथा ऑक्सीजन,
  3. अदरक, हल्दी, आलू तथा सेब।

असाधारण प्रयोग परीक्षण (Unusual uses test)

यह प्रयोग गिलफोर्ड ने सन् 1972 में तथा टोरेन्स ने सन् 1962 में टिन के प्रयोग के नाम से किया था। इससे वैज्ञानिक चिन्तन के आधार पर रोचक अस्वाभाविक एवं महत्त्वपूर्ण उपयोगों को खोजा गया; जैसे-

  1. नाखून,
  2. जल,
  3. पौधों की पत्तियाँ तथा
  4. पेड़ जो कि अनेक उपयोगों हेतु प्रयोग में लाये जाते हैं।

नवीन सम्बन्ध परीक्षण (New relationship test)

उक्त परीक्षण मेडनिक रिमट (1952) के साहचर्य परीक्षण पर आधारित है। इस परीक्षण के अन्तर्गत नित्य जीवन में प्रयोग किये जाने वाली वस्तुओं के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है। सभी वस्तुएँ एक-दूसरे से वैज्ञानिक रूप से जुड़ी रहती हैं। यह तीन युग्म से जुड़ा होता है

  1. चीनी तथा नमक,
  2. तेल तथा जल एवं
  3. बिल्ली तथा कुत्ता।

यह भौतिक, रासायनिक तथा जैविकीय गुणों में पर्याप्त सीमा तक समानता रखते हैं। छात्र ऐसे अनेक जोड़े बनाता है, जो कि स्वतन्त्र, मौलिक तथा अस्वाभाविक कल्पना का प्रतिफल होते हैं।

जरा सोचिये, परीक्षण क्यों (Just think, why test)

इस परीक्षण के अन्तर्गत सृजनात्मकता से सम्बन्धित घटनाएँ जुड़ी होती हैं और उनमें कार्य-कारण परिणाम को ज्ञात करना होता है। यह परीक्षण तीन घटनाओं से जुड़ा होता है-

  1. हृदय की धड़कन की वृद्धि के क्या कारण हैं ?
  2. बीजों के अंकुरित होने के क्या कारण हैं ?
  3. किन परिस्थितियों में व्यक्ति अपने विचारों को अभिव्यक्त नहीं कर पाता?

उपचारात्मक शिक्षण

Remedial Teaching

शैक्षणिक निदान का सम्बन्ध छात्रों की व्यक्तिगत योग्यताओं एवं क्षमताओं की जाँच से ही नहीं वरन् उनकी क्षमताओं, कमजोरियों एवं कठिनाइयों के उपचार से भी है। विशिष्ट छात्र की विषयगत कमजोरी एवं कठिनाई को दूर करने के लिये शिक्षक को अपनी अध्यापन विधि में आवश्यक परिवर्तन लाना पड़ता है, जिससे छात्र अपनी योग्यता के अनुसार अधिगम अनुभव प्राप्त कर सके। अतः इस शिक्षण प्रक्रिया (Teaching procedure) को उपचारात्मक अध्यापन (Remedial teaching) कहते हैं।

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि शिक्षक का कार्य चिकित्सक के कार्य से अत्यन्त कठिन है। किसी रोगी के रोग का कारण जीवाणु या विषाणु (Virus) हो सकता है, लेकिन अध्यापक की शिक्षण प्रक्रिया के कारण इतने जटिल होते हैं कि उनका विश्लेषण करना कठिन हो जाता है, जिसके लिये वह विभिन्न प्रकार की विधियों, परीक्षणों एवं उपकरणों का सहारा लेता है।

छात्र की कमजोरी का इस प्रकार उपाय कर चुकने के पश्चात् वह फिर अनेक उपचारात्मक विधियों (Remedial methods) की सहायता से उपचार करता है और छात्र की कमजोरियों को दूर करने का प्रयास करता है।

छात्रों द्वारा की गयी त्रुटियों का ज्ञान होने पर उन्हें दूर करने के लिये 'उपचारात्मक कार्य' व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों प्रकार से किया जाना चाहिये। उपचारात्मक कार्य करते समय विद्यार्थियों का वर्गीकरण (Classification) कर प्रखर तथा मन्द बुद्धि वाले छात्रों के लिये अलग-अलग प्रारूप भी तैयार किये जाने चाहिये।

ब्लायर के अनुसार, “उपचारात्मक शिक्षण का प्रमुख कार्य है, दोषपूर्ण अध्ययन एवं अध्यापन के प्रभाव को दूर करना, इसका मुख्य लक्ष्य है, इन दोषों और दोषों के कारणों को खोजना तथा कमजोरियों का निराकरण करना।"

उपचारात्मक शिक्षण का वर्गीकरण

छात्रों की बुद्धि के आधार पर उपचारात्मक शिक्षण को दो भागों में बांटा गया है, जो निम्नलिखित हैं:-

1. मन्द बुद्धि छात्रों के लिये उपचारात्मक शिक्षण (Remedial teaching for dull I.Q. students)

मन्दबुद्धि छात्रों के लिये निम्नलिखित उपचारात्मक कार्य किये जाने चाहिये:-

  1. मन्द बुद्धि छात्रों को कक्षा में आगे बैठने का स्थान दिया जाये।
  2. चार्ट, मॉडल एवं क्रियात्मक कार्यों के माध्यम से प्रत्यय, सिद्धान्त से क्रियाएँ उन्हें समझायी जायें। कमजोर तथा पिछड़े छात्रों की कक्षा व्यवस्था अलग-अलग हो तथा इनकी संख्या कक्षा में 20 से अधिक नहीं होनी चाहिये।
  3. मन्द बुद्धि छात्रों के लिये अभ्यास तथा प्रत्यास्मरण कार्य पर विशेष बल दिया।
  4. मन्द बुद्धि छात्रों के लिखित कार्य को विशेष रूप से जाँच कर व्यक्तिगत रूप से इनको मार्ग-दर्शन प्रदान किया जाये।
  5. प्रत्यय एवं सिद्धान्त से श्यामपट्ट कार्य कराया जाये अथवा अन्य कार्यों में इनका सहयोग लिया जाये। जाँच कार्य कर उस पर आवश्यक सुझाव दिये जायें।
  6. मन्द बुद्धि छात्रों को आवश्यक प्रोत्साहन एवं सीखने के अवसर प्रदान किये जायें।
  7. दृश्य-श्रव्य उपकरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होने चाहिये।
  8. मन्द बुद्धि छात्रों से क्रियात्मक एवं प्रयोगात्मक कार्य करवाये जायें अथवा उन्हें खेल विधि (Play method) द्वारा पढ़ाया जाये। सामान्य विज्ञान शिक्षण में तथा सिद्धान्तों का शिक्षण में प्रयोग किया जाये।
  9. उन्हें मौखिक एवं लिखित प्रश्नों का भी अभ्यास कराया जाये। प्रश्न व्यावहारिक एवं समस्यामूलक होने चाहिये।

2. प्रखर बुद्धि छात्रों के लिये उपचारात्मक शिक्षण (Remedial teaching for intelligent students)

प्रखर बुद्धि वाले छात्रों के लिये निम्नलिखित उपचारात्मक कार्य किये जाने चाहिये:-

  1. प्रखर बुद्धि वाले छात्रों को उचित मार्ग-दर्शन के साथ-साथ अध्ययन हेतु विशेष सामग्री प्रदान की जाये।
  2. प्रखर बुद्धि छात्रों को उनके स्तर के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में ज्ञान दिया जाये।
  3. उन्हें ऐसी शिक्षण विधियों से पढ़ाया जाये, जिससे उन्हें शीघ्रता से अधिक कार्य करने के अवसर प्राप्त हों।
  4. प्रखर बुद्धि वाले छात्रों के समक्ष अनेक प्रकार की जटिलतम समस्याएँ उत्पन्न की जायें अथवा रखी जायें, जिससे वे उन्हें चुनौती के रूप में ले तथा अपनी क्षमता का अधिकाधिक उपयोग उनके समाधान में कर सकें।
  5. प्रखर बुद्धि वाले छात्रों को मन्द बुद्धि वाले छात्रों को सहायता प्रदान करने हेतु प्रोत्साहित किया जाये।
  6. प्रखर बुद्धि छात्रों को समय-समय पर उचित सम्मान तथा परामर्श मिलता रहे, जिससे उनके स्वाभिमान को ठेस न पहुँचे।
  7. प्रखर बुद्धि छात्रों को गृह कार्य मन्द बुद्धि छात्रों की तुलना में अधिक दिया जाये तथा साथियों के गृह कार्य में की गयी त्रुटियों को दूर करने के लिये सुझाव दिये जायें।
  8. प्रखर बुद्धि छात्रों को कक्षा में पढ़ाये जाने वाली सामग्री के अतिरिक्त इस प्रकार के कार्यों का अवसर प्रदान किया जाये, जिससे उनकी अभिरुचियों का विकास हो सके?

यदि शैक्षणिक निदान को उपचार से सम्बन्धित कर दिया जाये तो निश्चित ही इससे छात्रों को बहुत लाभ होगा। प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध किया जा चुका है कि शैक्षणिक निदान एवं उपचारात्मक शिक्षण सभी विषयों में उपयोगी सिद्ध हुए हैं। निदानात्मक परीक्षाओं एवं उपचारात्मक शिक्षण में चोली-दामन का सम्बन्ध है।

बुनकर तथा मेलवी के शब्दों में- "निदानात्मक परीक्षाओं का प्रमुख उद्देश्य किसी विषय-वस्तु में बालक की विशिष्ट कमजोरी को प्रकाश में लाना है, जिससे कमजोरी के कारणों की छानबीन कर सुधार के लिये उपचारात्मक कदम उठाये जा सकें।"