क्रियापरक या गतिविधि आधारित अधिगम उपागम - शिक्षण उपागम

Kriyavidhi or Gatividhi Aadharit Adhigam Upagam

क्रियापरक (गतिविधि आधारित) अधिगम उपागम

Activity Based Learning Approach

क्रियापरक एवं शिक्षण अधिगम का प्रवर्तक रूसो को माना जाता है। रूसो का कथन है, "यदि आप अपने बालक की बुद्धि का विकास करना चाहते हैं तो उस शक्ति का विकास करना चाहिये, जिसे इसको नियन्त्रित करना है। उसको बुद्धिमान और तर्कपूर्ण बनाने के लिये उसे हष्ट-पुष्ट और स्वस्थ बनाना होगा।"

अत: क्रियापरक विधि का अर्थ है छात्र को अपनी स्वयं की क्रिया द्वारा ज्ञान प्राप्त करना। छात्र की क्रिया से तात्पर्य है जिस क्रिया को छात्र किसी उद्देश्य से पूर्ण करता है उसमें उसका मानसिक और शरीर दोनों क्रियाशील रहते हैं।

इस आधार पर यह स्पष्ट है कि छात्र की क्रियाएँ दो प्रकार की होती हैं- शारीरिक तथा मानसिक। चहलकदमी, आत्मक्रिया एवं आत्म अभिव्यक्ति इसके प्रमुख अंग माने जाते हैं।

क्रियात्मक या क्रियापरक विधि का साधन सामूहिक शिक्षण अधिगम होता है। इस विधि का प्रयोग समस्त विषयों अथवा क्रियाओं के शिक्षणअधिगम के लिये किया जाता है परन्तु इसका प्रयोग करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि शिक्षण अधिगम को सम्पन्न करने में निर्धारित समय से अधिक समय न लगे।

एक ही समूह के सभी बालकों को एक समय में एक ही कार्य करना चाहिये। जैसे एक ही समूह के छात्र किसी मॉडल का निर्माण कर रहे हैं तो सभी छात्रों को एक ही प्रकार का मॉडल बनाना चाहिये।

क्रियापरक या गतिविधि आधारित अधिगम उपागम का वर्गीकरण

क्रियापरक विधि को निम्नलिखित क्रियाओं में विभाजित किया जा सकता है:-

1. अनुभव प्राप्ति से सम्बन्धित क्रियाएँ

अनुभव प्राप्त करने वाली क्रियाओं का उद्देश्य है बालकों द्वारा नये अनुभव प्राप्त करना। बालक किसी स्थान का भ्रमण करके, किसी औद्योगिक संस्थान को देखकर या किसी वस्तु का निरीक्षण करके नवीन अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

2. ज्ञान प्राप्ति से सम्बन्धित क्रियाएँ

इन क्रियाओं का मूल उद्देश्य है छात्रों द्वारा अनेक तथ्यों का ज्ञान प्राप्त करना; जैसे- बालकों द्वारा इस तथ्य का ज्ञान प्राप्त करना कि उनके घर में प्रयोग होने वाली वस्तुएँ कहाँ-कहाँ से आती हैं।

3. ज्ञान प्रदान से सम्बन्धित क्रियाएँ

इन क्रियाओं का मूल उद्देश्य यह है कि बालक किस प्रकार अपने अर्जित ज्ञान को व्यक्त कर सकता है? बालक किसी विषय पर वाद-विवाद करके, किसी स्थान का मानचित्र बनाकर या उद्योगों का वर्गीकरण करके अपने अर्जित ज्ञान को प्रदर्शित कर सकते हैं।

क्रियापरक अधिगम के सिद्धान्त

Principles of activity based learning

क्रियापरक विधि इस सिद्धान्त का प्रतिपादित करती है कि छात्र को ज्ञान प्राप्ति करने हेतु स्वतन्त्रता प्रदान करनी चाहिये। इसके अतिरिक्त इस शिक्षण उपागम के सिद्धान्तों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है:-

  1. क्रियापरक विधि 'आत्म-स्वतन्त्रता' के सिद्धान्त को मानती हैं। इसके अनुसार आत्म-स्वतन्त्रता की प्राप्ति हेतु आत्म-क्रिया करना आवश्यक होता है।
  2. इस उपागम के माध्यम से बालक का चहुँमुखी विकास उसकी स्वयं की क्रिया के द्वारा सम्पन्न होता है।
  3. यह विधि अन्तर्निहित क्रिया के सिद्धान्त को प्रतिपादित करती है। इस सिद्धान्त के अनुसार समस्त प्राणियों में एक समान आन्तरिक प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है, जिसे वे अभिव्यक्त करना चाहते हैं।
  4. यह उपागम मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधरित है। यह छात्र की क्रिया चेतना के तीनों स्तरों को प्रभावित करती हैं (i) चिन्तनात्मक, (ii) रुचि संकल्पना तथा (iii) निर्णय।
  5. इस विधि के माध्यम से बालक सहज प्रवृत्तियों की ओर प्रेरित होकर ज्ञान अर्जन करते हैं।

क्रियापरक अधिगम की विशेषताएँ

Characteristics of activities based learning

सिद्धान्तों के आधार पर गतिविधि आधारित अधिगम उपागम अथवा क्रियापरक विधि की निम्नलिखित विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं:-

  1. यह विधि बालक को करके सीखने का अवसर प्रदान करती है, जिससे बालक ज्ञानार्जन करते हैं।
  2. यह विधि बालक को कार्य करने में इतना निमग्न कर देती है कि उसे ज्ञानार्जन करते समय थकान का अनुभव नहीं होता है।
  3. यह विधि बालक को स्वयं ज्ञान और अनुभव प्राप्ति का अवसर प्रदान करती है।–
  4. यह विधि शिक्षक केन्द्रित न होकर बाल केन्द्रित होती है।
  5. इस विधि के द्वारा बालक क्रियाशील होकर अधिगम प्रक्रिया में रुचिपूर्ण सहभागिता करते हैं।
  6. यह विधि बालकों को अनेक वस्तुओं को बनाने का प्रशिक्षण प्रदान कर उनकी व्यावसायिक कुशलता को बढ़ाती है।
  7. यह विधि क्रिया के सिद्धान्त को केवल विषय के रूप में ही नहीं वरन् एक अधिगम विधि के रूप में भी प्रयोग करती है।
  8. यह विधि वस्तुओं के संग्रह, पर्यटन, अवलोकन और परीक्षण को महत्त्व देती है।