पाठ्य-पुस्तक प्रविधि - शिक्षण प्रविधि

Pathya Pustak Pravidhi

पाठ्य-पुस्तक प्रविधि (Text Book Technique)

शिक्षण की प्रविधियों में पाठ्य-पुस्तक प्रविधि सबसे अधिक प्रचलित प्रविधि है। अन्य शब्दों में, "यह प्रविधि पाठ्य-पुस्तक को आधार मानती है, जैसे कोई अन्य प्रविधि किसी समस्या या योजना को आधार मानकर चलती है।" इस प्रविधि का प्रयोग भाषा-शिक्षण में किया जाता है।

आजकल कुछ विद्वान् इस प्रविधि को 'तू पढ़ मैं सुनूँ' या 'तू पढ़ प्रविधि' के नाम से भी पुकारते हैं जो कि युक्तिसंगत नहीं है बल्कि इसका बिगड़ा हुआ रूप है, क्योंकि विद्यार्थी बारी-बारी से पढ़ते हैं और अध्यापक सुनता है अथवा अध्यापक पढ़ता है तो विद्यार्थी सुनते हैं।

इस प्रकार पुस्तक का प्रयोग करने को 'पाठ्य-पुस्तक प्रविधि' नहीं कहा जा सकता। इसका प्रयोग तो शिक्षण सामग्री के रूप में होता है और शिक्षण-सामग्री का प्रयोग करते समय कौन-कौन सी सावधानियाँ रखनी चाहिये? यह बात अध्यापक को ज्ञात होनी चाहिये, तभी वह इस प्रविधि का प्रयोग कर सकता है।

पाठ्य-पुस्तक प्रविधि के लाभ (Merits of text book technique)

पाठ्य पुस्तक प्रविधि के निम्नलिखित लाभ हैं:-

  1. इस प्रविधि के प्रयोग से हिन्दी की पाठ्यवस्तु, विभिन्न विधाओं, इतिहास तथा शब्दावली आदि का ज्ञान प्राप्त होता है एवं पद्य पाठों को कण्ठस्थ कराया जा सकता है।
  2. इस प्रविधि द्वारा शिक्षक निर्दिष्ट कार्य को पूरा करने में समर्थ होता है।
  3. अध्यापक को विषय-सामग्री सम्बन्धी तैयारी नहीं करनी पड़ती है।
  4. पाठ्य-पुस्तकें विद्यार्थियों को लक्ष्य करके लिखी जाती हैं, अत: विद्यार्थियों के लिये लाभकारी होती हैं।
  5. यदि कोई बात कक्षा में पूर्णरूप से समझ में नहीं आती है तो विद्यार्थी पुस्तक की सहायता से उस बात को समझ सकता है।
  6. यदि छात्र कभी कक्षा में किसी कारणवश अनुपस्थित रह जाता है तो वह उस दिन का कार्य पुस्तक की सहायता से पूर्ण कर सकता है।
  7. पाठ्य-पुस्तकें विभिन्न प्रकार की सामग्री का सुझाव देती हैं।
  8. अध्यापक को पाठ्यक्रम नहीं देखना पड़ता क्योंकि पाठ्य-पुस्तकें पाठ्यक्रम के अनुसार ही लिखी होती हैं।

पाठ्य-पुस्तक प्रविधि के दोष (Demerits of text book technique)

पाठ्य पुस्तक प्रविधि का प्रयोग करने से कुछ हानियाँ होने का भय रहता है अर्थात् इस प्रविधि के कुछ दोष भी हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है:-

इसके अत्यधिक प्रयोग से शिक्षण-प्रक्रिया का उद्देश्य पूरा नहीं होता क्योंकि सम्भव है कि विद्यार्थी अथवा शिक्षक का दृष्टिकोण निश्चित पृष्ठों को पूरा करने तक ही सीमित रहे।

पाठ्य-पुस्तक में भूल रहने की सम्भावना बनी रहती है, जिससे विद्यार्थियों में को उस समय हानि होने का भय रहता है, जबकि अध्यापक उस भूल को सुधारने में सक्षम न हो।

पाठ्य-पुस्तक के प्रयोग से विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति का विकास अधिक होता है, जबकि अन्य पक्षों का उतना विकास नहीं हो पाता।