सम्प्रेषण एवं विद्यालय - विद्यालय प्रबन्ध में सम्प्रेषण की उपयोगिता

Sampreshan Evam Vidyalaya - Vidyalaya Prabandh Mein Sampreshan Ki Upyogita

सम्प्रेषण एवं विद्यालय

(Communication and School)

सम्प्रेषण का विद्यालय व्यवस्था से क्या सम्बन्ध है? सम्प्रेषण की अवधारणा का विकास क्यों हुआ? इन प्रश्नों के सन्दर्भ में एक उत्तर सामने आता है कि सम्प्रेषण की उपयोगिता विद्यालय के लिये किसी न किसी रूप में अवश्य होनी चाहिये।

यदि सम्प्रेषण को विद्यालय व्यवस्था से सम्बन्धित करके चलाया जाये तो विद्यालय व्यवस्था के कुशल प्रबन्धन एवं शिक्षण अधिगम में सम्प्रेषण का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। शिक्षण व्यवस्था में शिक्षक के शिक्षण कार्य को सरल एवं प्रभावी बनाने में सम्प्रेषण का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

डॉ. ए. बरौलिया लिखती हैं, "आधुनिक युग में सम्प्रेषण साधनों के महत्त्व को प्रत्येक क्षेत्र में स्वीकार करना चाहिये क्योंकि हमारी सम्पूर्ण विद्यालयी व्यवस्था में सम्प्रेषण नींव के पत्थर का कार्य करता है चाहे वह व्यवस्था शिक्षण अधिगम, प्रबन्धन एवं प्रशासन से सम्बन्धित क्यों न हो?"

अतः सम्प्रेषण के महत्त्व एवं आवश्यकता को हम विद्यालय प्रबन्धन एवं प्रशासन के सन्दर्भ में अध्ययन करेंगे। इसके साथ-साथ शिक्षण अधिगम में इसकी उपयोगिता का भी वर्णन करेंगे।

विद्यालय प्रबन्ध में सम्प्रेषण की उपयोगिता

(Utility of Communication in School Management)

विद्यालय प्रबन्ध में सम्प्रेषण अपनी प्रभावी भूमिका का निर्वाह करता है क्योंकि विद्यालय प्रबन्ध में जो अवधारणा पायी जाती है वह लोकतान्त्रिक परम्परा विकेन्द्रीयकरण पर आधारित होती है।

सम्प्रेषण साधन किस प्रकार से प्रबन्ध प्रक्रिया को सुदृढ़ एवं प्रभावी बनाते हैं। इसका अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत करेंगे:-

1. स्वतन्त्रता का सिद्धान्त (Theory of freedom)

विद्यालय प्रबन्ध में विचारों की स्वतन्त्रता को अधिक महत्त्व दिया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति से उसके विचार जानने का प्रयास किया जाता है, जिससे कि विद्यालय सम्बन्धी नीतियों एवं नियमों के निर्धारण में विचारों का लाभ प्राप्त हो सके।

सम्प्रेषण की प्रक्रिया में विचारों का आदान-प्रदान होता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार स्वतन्त्रतापूर्वक प्रकट करने का अधिकार होता है। विद्यालय प्रबन्ध से सम्बन्धित सभाओं में प्रत्येक व्यक्ति के विचार जानकर ही अन्तिम निर्णय तक पहुँचा जाता है, जिससे विभिन्न विद्वानों के विचारों का लाभ विद्यालय के शैक्षिक प्रबन्ध को पहुँचता है।

कभी-कभी व्यक्ति स्वयं उपस्थित न होकर सम्प्रेषण माध्यमों के प्रयोग जैसे- वीडियो, यूट्यूब एवं फोन आदि से अपने विचारों को प्रकट करता है जो कि सम्प्रेषण के माध्यम से ही सम्बन्धित हैं।

2. समानता का सिद्धान्त (Theory of equality)

विद्यालय प्रबन्ध में समानता का सिद्धान्त अपनाकर सबको समान रूप से कार्य को वितरण किया जाता है। अधिकार के सम्बन्ध में भी समानता का दृष्टिकोण अपनाया जाता है। सम्प्रेषण में जब व्यक्ति किसी के विचार को सुनता है तो समान रूप से वह दूसरे व्यक्ति को अपने विचारों से अवगत कराता है।

प्रबन्ध में समानता का सिद्धान्त किसी विद्वान का विचार होगा जिसे सम्प्रेषण के माध्यम से जनसामान्य के स्तर तक पहुँचाया गया। धीरे-धीरे यही विचार एक सिद्धान्त के रूप में विकसित हुआ जिसे समानता का सिद्धान्त कहते हैं। जिसका प्रयोग विद्यालय प्रबन्ध में होता है।

अत: विद्यालय प्रबन्ध में सम्प्रेषण का योगदान महत्त्वपूर्ण है।

3. सहयोग की भावना (Spirit of co-operation)

शैक्षिक प्रबन्ध में सहयोग की भावना का प्रमुख कार्य होता है। प्रत्येक व्यवस्था के कुशल संचालन के लिये सभी सम्बन्धित व्यक्तियों एवं विद्वानों का सहयोग आवश्यक होता है। इसके लिये हमें सम्प्रेषण माध्यमों की आवश्यकता होती है। जिनके द्वारा विभिन्न विद्वानों के विचार जान सकते हैं उनके आधार पर ही विद्यालय की नीतियों एवं नियमों का निर्धारण करते हैं।

उदाहरण के लिये, हमें वित्तीय प्रबन्ध के बारे में ज्ञान प्राप्त करना है तो उससे सम्बन्धित साहित्य एवं विद्वान का सहारा लेना आवश्यक होगा।

4. सभ्यता एवं संस्कृति का संरक्षण (Protection of civilization and culture)

प्रत्येक विद्यालय में शैक्षिक प्रबन्ध के समय यह ध्यान रखा जाता है कि प्रत्येक शैक्षिक नीति एवं नियम हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का संरक्षण करते हैं। उसको नष्ट करने का कार्य नहीं करते हैं क्योंकि सभ्यता एवं संस्कृति का विकास हमारी सम्प्रेषण प्रक्रिया के माध्यम से होता है; जैसे- एक व्यक्ति सत्य एवं अहिंसा के महत्त्व को सामान्य रूप से व्यक्त करता है। इसके प्रमाण में महात्मा गाँधी का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है तो हमारे समाज में उसको स्वीकार करने के बाद सत्य और अहिंसा हमारी संस्कृति के उच्च एवं आदर्श मूल्य होंगे।

इनके संरक्षण के लिये हमारी शैक्षिक व्यवस्था में ऐसे प्रयास होंगे जो हमारी संस्कृति का संरक्षण करते हैं, जैसे पाठ्यक्रम में संगीत एवं नाटक सहगामी क्रियाओं के रूप में रखा जाता है, कैबरे एवं बार डांस नहीं रखा जाता है क्योंकि यह हमारी संस्कृति के विरुद्ध है।

5. कार्य का विभाजन (Work distribution)

कार्य का विभाजन करते समय व्यक्ति की योग्यता एवं उसकी रुचि का ध्यान शैक्षिक प्रबन्ध में रखा जाता है। व्यक्ति की रुचि एवं योग्यता में ज्ञान का आधार सम्प्रेषण व्यवस्था ही होती है क्योंकि जब तक हम किसी व्यक्ति के विचारों के बारे में नहीं जानते हैं तब तक हम उसकी रुचि के बारे में नहीं जान सकते हैं।

अतः एक योग्य व्यक्ति एवं रुचियों का पता लगाने के लिये उसके साथ सम्प्रेषण की प्रक्रिया का होना अनिवार्य है; जैसे- साक्षात्कार के द्वारा योग्य व्यक्ति का चुनाव सम्प्रेषण प्रक्रिया का सबसे उत्तम उदाहरण है क्योंकि हमको इस तथ्य का ज्ञान तभी हो पायेगा जब हम सम्बन्धित व्यक्तियों से विचार-विमर्श करेंगे।

अत: सम्प्रेषण की प्रक्रिया विद्यालय के शैक्षिक प्रबन्ध में योगदान प्रदान करती है।

6. एकाधिकार के विरुद्ध (Against of monopoly)

हमारे विद्यालय प्रबन्ध में एकाधिकार की प्रवृत्ति नहीं पायी जाती है। प्राचीन समय में संस्थाओं पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार हुआ करता था किन्तु वर्तमान समय में शिक्षा के उद्देश्य एवं कार्यों का क्षेत्र इतना विस्तृत हो गया है कि एकाधिकार की स्थिति प्रबन्ध व्यवस्था में नहीं हो सकती है, इसका श्रेय भी सम्प्रेषण को ही जाता है।

सम्प्रेषण के माध्यम द्वारा विभिन्न विद्वानों एवं आयोगों के विचारों से शैक्षिक जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन आये हैं क्योंकि किसी व्यवस्था के अन्तर्गत कोई गुण पाया जाता है तो उसको सम्प्रेषण के माध्यम से जन सामान्य तक पहुँचाया जाता है उसके उपरान्त उसको व्यवस्था में स्वीकार कर लिया जाता है। विकेन्द्रीयकरण की अवधारणा का श्रेय सम्प्रेषण प्रक्रिया को ही जाता है।

7. क्षमता के अनुसार कार्य (Work according to capacity)

प्रबन्धन में प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमता के अनुसार ही कार्य प्रदान किया जाता है। यदि किसी अवस्था में उसको ऐसा कार्य मिल जाता है जो उसकी क्षमता से बाहर का विषय है तो सम्प्रेषण के माध्यम से ही उसमें परिवर्तन होता है; जैसे- एक व्यक्ति को पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं में संगीत का प्रभारी बनाया जाता है किन्तु वह इस दायित्व का निर्वाह नहीं कर पाता है तो व्यक्ति द्वारा अपने विचारों से उस नियोक्ता को अवगत करके अपने कार्य में परिवर्तन कराया जाता है।

अतः व्यक्ति को उसकी क्षमता के अनुसार कार्य प्रदान करने में सम्प्रेषण की अहम् भूमिका है।

8. उत्तरदायित्व की भावना (Spirit of responsibilities)

विद्यालय प्रबन्ध में प्रत्येक व्यक्ति का कार्य क्षेत्र निश्चित होता है। इसके लिये उस क्षेत्र से सम्बन्धित अधिकार प्रदान किये जाते हैं जो उस कार्य के प्रति उत्तरदायी बनाते हैं यह सम्पूर्ण प्रक्रिया सम्प्रेषण के माध्यम से ही सम्पन्न होती है क्योंकि सम्प्रेषण प्रक्रिया में पारदर्शिता एवं स्पष्टता पायी जाती है।

व्यक्ति के क्षेत्र एवं अधिकारों की व्याख्या सन्तुलित रूप में करती है तो व्यक्ति के अन्तर्गत उत्तरदायित्व की भावना एवं कार्य के प्रति सजगता की भावना उत्पन्न होगी। इसके विपरीत अवस्था में कार्य एवं उत्तरदायित्व पर प्रतिकूल असर होगा।

9. साधनों में समन्वय (Adjustment in instruments)

प्रत्येक विद्यालय की प्रबन्ध व्यवस्था सुचारु रूप से तभी चल सकती है जब उसके मानवीय एवं भौतिक साधनों के मध्य सामंजस्य की स्थिति उत्पन्न की जाय। यह कार्य सम्प्रेषण के माध्यम से उचित प्रकार सम्पन्न किया जाता है।

उदाहरण के लिये, एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को विद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था का भार सौंपना है तो उससे पूर्व नियोक्ता एवं कर्मचारी के मध्य सेवा शर्तों एवं साधनों के बारे में विचार विनिमय हो जाता है तो वह उस व्यवस्था में सामंजस्य स्थापित कर लेगा यदि विचार विनिमय नहीं होता है तो अपनी नवीनतम् आवश्यकताएँ बताकर प्रबन्धन के लिये एक नयी समस्या को जन्म देगा।

अतः सम्प्रेषण के माध्यम से विद्यालय प्रबन्ध में साधनों के बीच समन्वय स्थापित किया जा सकता है।

10. नियन्त्रण (Control)

विद्यालय प्रबन्धन में उसके लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये व्यवस्था पर नियन्त्रण होना अनिवार्य है क्योंकि नियन्त्रण के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति स्वेच्छाचारिता एवं निरंकुशता का अनुगमन करेगा।

समय-समय पर नियोक्ता द्वारा निरीक्षण करके आवश्यकता के अनुसार सुझाव प्रस्तुत किये जायेंगे। सम्बन्धित व्यक्ति की समस्याओं के बारे में ज्ञान प्राप्त किया जायेगा तथा यह पता लगाया जायेगा कि ऐसे कौन-कौन से कारण हैं जिनके आधार पर इसकी कार्य क्षमता प्रभावित हुई है।

इसके उपरान्त उनका समाधान प्रस्तुत किया जायेगा। इस प्रकार का कार्य सम्प्रेषण प्रक्रिया के माध्यम से ही सम्पन्न होगा। यदि एक प्रबन्धक अपने अधीनस्थ कर्मचारी की समस्या का समाधान नहीं कर सकता है तो विद्यालय के सम्पूर्ण प्रबन्ध पर किस प्रकार नियन्त्रण रख पायेगा? यह एक विचार का विषय है।

निष्कर्ष:-

इस प्रकार उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि कुशल प्रबन्धन में सम्प्रेषण की प्रभावी एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस सन्दर्भ में प्रो. एस.के. दुबे कहते हैं कि,

विद्यालय प्रबन्ध में मानवीय संसाधनों के कुशलतम् प्रयोग के लिये सम्प्रेषण की प्रक्रिया आधारशिला का कार्य करती है जिस पर सुव्यवस्थित सुदृढ़ एवं क्रमबद्ध प्रबन्धन के भवन का निर्माण होता है जो कि समाज की आकांक्षाओं एवं नागरिकता के मूल्यों का छात्रों में विकास करता है।"

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