सामूहिक विधियों द्वारा सीखना, प्रमुख सामूहिक विधियाँ - अधिगम

Samuhik Vidhiyan

सामूहिक विधियों द्वारा सीखना (Learning by group methods)

सामान्य रूप से यह देखा जाता है कि छात्रों को समूह में कार्य करने में आनन्द का अनुभव होता है। बालक को अपने साथियों के साथ खेलना अच्छा लगता है। कक्षा में पढ़ते समय भी छात्र अपने साथियों से बातें करते हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि समूह में रहकर छात्र का अधिगम प्रभावशाली रूप से हो सकता है।

इसलिये वर्तमान समय में अनेक सामूहिक विधियों का प्रचलन देखा जाता है, जिनके माध्यम से छात्र अधिगम करता है। विद्यालय में अनेक प्रकार की सामूहिक विधियाँ संचालित करके छात्रों के अधिगम का मार्ग प्रशस्त किया जा जाता है।

जैसे- छात्रों को खेल-खेल में गिनती सीखने के अवसर दिये जाते हैं। मैदान बनाने के कार्य से बालक मापन सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करता है। क्रिकेट में रनों एवं ओवरों की संख्या से गिनती सीखता है।

इस प्रकार की स्थितियाँ छात्रों के अधिगम को स्थायी रूप प्रदान करती हैं तथा रुचिपूर्ण अधिगम प्रदान करती हैं। इसमें छात्रों को सभी कार्य सामूहिक रूप में प्रदान किये जाते हैं तथा प्रत्येक छात्र को सामूहिक रूप से कार्यों के प्रति उत्तरदायित्व दिया जाता है।

प्रमुख सामूहिक विधियाँ (Main Group Methods)

प्रमुख सामूहिक गतिविधियों पर विचार किया जाये तो अनेक प्रकार की गतिविधियों के माध्यम से बालक विद्यालय एवं विद्यालय के बाहर अधिगम करता है। इनका वर्णन निम्न रूप में किया जा सकता है-

1. खेल द्वारा अधिगम (Learning by game)

सामान्य रूप से बालक घर पर विविध प्रकार की मिट्टी की मूर्ति एवं फलों का निर्माण करते हैं, जिससे वह एक ओर फल एवं सब्जी के बारे में ज्ञान प्राप्त करते हैं वहीं दूसरी ओर वह कला सम्बन्धी अधिगम करते हैं। खेल खेलने से बालक एक-दूसरे के प्रति प्रेम एवं सहयोग का प्रदर्शन करते हैं, जिससे उनमें सामाजिक गुणों का विकास सम्भव होता है।

इसी प्रकार खेल के द्वारा छात्र विविध प्रकार के कौशलों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। खेल विधि द्वारा छात्रों के अधिगम की प्रक्रिया तीव्र एवं स्थायी रूप में देखी जाती है।

2. समूह विधि द्वारा अधिगम (Learning by group method)

समूह विधि द्वारा अधिगम की प्रक्रिया को सरल एवं उपयोगी बनाया जा सकता है। इसमें छात्रों के समूह बनाकर उनके कार्य प्रदान किये जाते हैं। इसमें कुछ प्रतिभाशाली छात्रों को प्रत्येक समूह में रख दिया जाता है। ये छात्र समूह के प्रमुख बना दिये जाते हैं तथा उस समूह को शैक्षिक कार्य प्रदान किये जाते हैं जो कि पाठ्यवस्तु से सम्बन्धित होते हैं।

इस प्रकार के समूह में छात्र एक-दूसरे की सहायता करते हुए सीखते हैं। आवश्यकता पड़ने पर शिक्षक द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। इस प्रकार समूह में छात्रों द्वारा अधिगम किया जाता है। अनेक अवसरों पर छात्र अपनी इच्छा के अनुसार समूह का निर्माण किया जाता है।

3. सामूहिक प्रतियोगिता द्वारा अधिगम (Learning by group competition)

बालक के समक्ष जब प्रतियोगिता रखी जाती है तो बालक पूर्ण मनोयोग से कार्य करता है क्योंकि उसके समक्ष जीत का लक्ष्य होता है। इसी क्रम में जब बालकों को समूह में रखकर अधिगम कार्य प्रदान किये जाते हैं तो उनमें सीखने की भावना तीव्र हो जाती है।

जैसे- प्राथमिक स्तर के छात्रों के समूह बनाकर उनकी गिनती लेखन की प्रतियोगिता करायी जा सकती है। इस प्रतियोगिता में प्रत्येक छात्र स्वयं गिनती सीखेगा तथा अपने समूह के कमजोर छात्र को भी सिखाने का प्रयास करेगा क्योंकि उसको अपने समूह को प्रथम स्थिति में लाना है।

इस प्रकार का अधिगम स्थायी एवं तीव्र गति से सम्पन्न होता है। इसलिये सामूहिक प्रतियोगिताओं की व्यवस्था विद्यालय में होनी चाहिये।

4. सांस्कृतिक कार्यक्रम (Cultural Programme)

विद्यालय में सम्पन्न होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी सामूहिक रूप से छात्रों का सहयोग लिया जाता है। बालकों को समय-समय पर इस प्रकार के कार्यक्रमों में विद्यालय तथा विद्यालय से बाहर भाग लेने के लिये प्रेरित करना चाहिये।

इससे छात्र एक ओर स्वयं कार्य करके अधिगम करता है तथा दूसरे साथियों से भी सीखने का प्रयास करता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अभिभावकों की भी रुचि होती है। इसलिये छात्रों के साथ-साथ विद्यालयों में अभिभावकों को भी आमंत्रित करना चाहिये।

बालक अपने माता-पिता के द्वारा कार्य की प्रशंसा सुनकर सीखने के लिये अधिक प्रोत्साहित होता है। इस प्रकार छात्र सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से अधिक तीव्र गति से सीखता है।

5. शैक्षिक प्रदर्शन द्वारा सीखना (Learning by educational exhibition)

विद्यालय में समय-समय पर शैक्षिक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया जाना चाहिये। इस आयोजन के अन्तर्गत उन विषयों पर प्रदर्शनी करानी चाहिये जो कि प्राथमिक स्तर के विषय के अनुकूल हों।

जैसे- सजीव एवं निर्जीव वस्तुएँ, परिवहन के साधन, प्रमुख खाद्यान्न एवं प्रमुख सब्जियाँ आदि। इन सभी की प्रदर्शनियों से छात्रों में सामूहिक भावना का विकास होगा तथा प्रदर्शनी से सम्बन्धित तथ्यों के बारे में छात्र एक-दूसरे से, शिक्षक से तथा आमंत्रित विशेषज्ञों से सीखने का प्रयास करेंगे। प्रदर्शनी के आयोजन में विषय से सम्बन्धित विशेषज्ञों को अवश्य आमंत्रित करना चाहिये।

6. शैक्षिक मेलों द्वारा सीखना (Learning by educational fairs)

विद्यालय में छात्रों के लिये शैक्षिक मेलों का आयोजन करना चाहिये। इन मेलों के माध्यम से छात्रों को अधिक से अधिक सीखने के अवसर मिलते हैं; जैसे-विज्ञान मेले के आयोजन से छात्रों को विज्ञान सम्बन्धी विविध उपकरणों के बारे में तथा उनके प्रयोग के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है।

जब छात्रों के द्वारा अपने वैज्ञानिक उपकरण प्रदर्शित किये जाते हैं तो छात्र उनके बारे में पहले ही जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार छात्रों को विज्ञान सम्बन्धी तथ्यों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। अत: अन्य विषयों पर भी मेलों का आयोजन किया जा सकता है।

7. शैक्षिक भ्रमण द्वारा सीखना (Learning by educational tour)

छात्रों को शैक्षिक भ्रमण द्वारा सीखने का प्रयास करना चाहिये। सामान्य रूप से शैक्षिक भ्रमण पर जाना छात्रों को अच्छा लगता है। प्राथमिक स्तर पर छात्रों को उन स्थानों का भ्रमण कराना चाहिये जो कि उनके विषय से सम्बन्धित हैं।

जैसे- कृषि क्षेत्रों का भ्रमण कराकर उनको फसलों की जानकारी दी जा सकती है। छात्रों को उद्यान के भ्रमण के लिये प्रेरित करना चाहिये। इससे छात्र पेड़-पौधों एवं फलों के बारे में सीखते हैं। भ्रमण की दूरी अधिक नहीं होनी चाहिये, जिससे कि प्राथमिक स्तर के छात्रों को जाने में कोई कठिनाई न हो। शैक्षिक भ्रमण में उद्देश्य-निष्ठता का पूर्ण ध्यान रखना चाहिये।

सामूहिक विधियों के लाभ (Advantages of Group Methods)

सामूहिक विधियों के प्रमुख लाभों का वर्णन निम्न रूप में किया जाता है-

  1. सामूहिक विधियों को मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुरूप माना जाता है क्योंकि बालक का स्वभाव सदैव समूह में कार्य करने के लिये तत्पर रहता है तथा समूह में बालक अधिक गति से सीखता है।
  2. बालक समूह में अन्य सहयोगियों के माध्यम से सीखता है तथा अपनी प्रत्येक सीखने सम्बन्धी समस्या को छात्रों के समक्ष प्रकट करता है, जिससे उसके सहयोगी छात्र उसका समाधान करते हैं।
  3. सामूहिक अधिगम की व्यवस्था के अन्तर्गत सभी छात्रों को कार्य करने का अवसर मिलता है तथा प्रत्येक छात्र अपने समूह को अग्रसर करने का प्रयास करता है।
  4. सामूहिक क्रियाओं में छात्र पूर्ण मनोयोग का प्रदर्शन करता है क्योंकि उसका उद्देश्य अपने समूह की जीत सुनिश्चित करना होता है। इसलिये छात्र स्वयं सीखता है तथा दूसरों को सिखाता है।
  5. सामूहिक विधि द्वारा छात्र समायोजन को सीखता है क्योंकि समायोजन के अभाव में छात्र अपने साथियों, समाज एवं विद्यालय से कुछ भी नहीं सीख सकता।
  6. समूह में छात्र एक ही विषय पर तथा एक ही प्रकार से कार्य करने के तरीकों पर विचार करता है, जिसके परिणामस्वरूप छात्र अनेक प्रकार के कौशलों एवं विधियों को सीखता है।

सामूहिक विधियों के दोष (Demerits of Group Methods)

सामूहिक विधियों की प्रभावशीलता एवं उपयोगिता के पश्चात् भी इन विधियों में अनेक दोष पाये जाते हैं, जिनका वर्णन निम्न रूप में किया जा सकता है-

  1. समूह में प्रतिभावान एवं मन्दबुद्धि बालकों के मध्य समायोजन नहीं हो पाता जिससे छात्र किसी भी कार्य को कुशलता से सम्पन्न नहीं कर पाते।
  2. समूह में कार्य करने से छात्रों के मध्य उत्तरदायित्व की भावना का अभाव देखा जाता है, जिससे छात्र एक दूसरे पर दायित्व सौंपकर अपने दायित्व से बचने का प्रयास करते हैं।
  3. समूह में कार्य करने की अपेक्षा छात्र बातें करते हैं तथा जो कार्य उनको दिया जाता है उस पर वह कोई ध्यान नहीं देते। इस प्रकार सामूहिक कार्यों के परिणाम अच्छे नहीं होते।
  4. समूह में सम्पन्न की जाने वाली गतिविधियों में अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं; जैसे- शैक्षिक भ्रमण के प्राथमिक विद्यालयों में संसाधन उपलब्ध नहीं होते।

सामूहिक विधियों द्वारा अधिगम को प्रभावशील बनाने में विद्यालय, शिक्षक एवं परिवार की भूमिका

Role of School, Teacher and Family to Make Effective of Learning by Group Methods

सामूहिक विधियों का उपयोग यदि उचित रूप में किया जाये तो इनसे अधिगम को सफल एवं उपयोगी बनाया जा सकता है। इसके लिये निम्न उपाय करने चाहिये-

  1. छात्रों को समूह में कार्य देने से पूर्व उनकी रुचि के बारे में पता करना चाहिये जिससे उनको रुचिपूर्ण कार्य मिल सके तथा उन कार्यों को वे सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सकें।
  2. छात्रों को समूह में कार्य प्रदान करने से पूर्व उनका सम्बन्ध पाठ्यवस्तु से अवश्य निर्धारित करना चाहिये जिससे लक्ष्यों की प्राप्ति सम्भव हो सके तथा प्रत्येक क्रिया उद्देश्य निष्ठ हो।
  3. शिक्षक को सामूहिक कार्य करने वाले छात्रों पर पूर्ण दृष्टि रखनी चाहिये, जिससे छात्र आपस में बात न करें।
  4. छात्रों के समूह बनाते समय उनके स्तर के अनुकूल समूह बनाने चाहिये, जिससे छात्रों में कुसमायोजन की समस्या उत्पन्न न हो।
  5. छात्रों में सामूहिक कार्य कराने से पूर्व विद्यालय में संसाधनों की व्यवस्था पूर्ण कर लेनी चाहिये।