प्रोजेक्ट विधि (Project Method) - प्रयोजना/परियोजना/प्रोजेक्ट प्रणाली द्वारा सीखना

Project Vidhi

परियोजना या प्रोजेक्ट प्रणाली के जन्मदाता विलियम किलपैट्रिक (W. H. Kilpatrick) हैं। वे प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री डीवी के शिष्य रह चुके थे। अतः उनके प्रयोजनवाद या व्यवहारवाद से विशेष रूप से प्रभावित थे। किलपैट्रिक के विचार में वर्तमान शिक्षा का सबसे बड़ा दोष उसका सामाजिक जीवन से पूर्णतया अलग होना है।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली पूर्णतया सैद्धान्तिक है और उसका व्यावहारिक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। विद्यालयों में छात्रों को केवल सूचना मात्र प्रदान की जाती है। अत: यह आवश्यक है कि शिक्षा और जीवन का परस्पर सम्बन्ध स्थापित किया जाये।

किलपैट्रिक के अनुसार-"हम चाहते हैं कि शिक्षा वास्तविक जीवन की गहराई में प्रवेश करे, केवल सामाजिक जीवन में ही नहीं वरन् उस उत्तम जीवन में जिसकी हम आशा करते हैं।"

प्रोजेक्ट प्रणाली का दार्शनिक आधार है व्यवहारवाद। इस प्रणाली में छात्र उद्देश्यपूर्ण क्रियाएँ पूर्ण संलग्नता से सामाजिक वातावरण में करते हैं। छात्र जो कुछ भी सीखता है वह क्रियाशील होकर सीखता है तथा वह जो क्रियाएँ सीखता है, वे सामाजिक जीवन से सम्बन्धित होती हैं।

परियोजना या प्रोजेक्ट का अर्थ (Meaning of project)

परियोजना या प्रोजेक्ट की परिभाषा विभिन्न विद्वानों ने निम्न ढंग से दी है-

  1. पार्कर के अनुसार, "प्रोजेक्ट कार्य की एक इकाई है, जिसमें छात्रों को कार्य की योजना और सम्पन्नता के लिए उत्तरदायी बनाया जाता है।"
  2. किलपैट्रिक के शब्दों में, "प्रोजेक्ट वह उद्देश्यपूर्ण कार्य होता है जो पूर्ण संलग्नता के साथ सामाजिक वातावरण में किया जाये।"
  3. बेलार्ड के अनुसार, "प्रोजेक्ट यथार्थ जीवन का एक ही भाग है जो विद्यालय में प्रयोग किया जाता है।"
  4. स्टीवेन्सन के शब्दों में, "प्रोजेक्ट एक समस्यामूलक कार्य है, जो स्वाभाविक स्थिति में पूरा किया जाता है।"

उपर्युक्त परिभाषाओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि

  1. प्रत्येक प्रोजेक्ट का कुछ न कुछ प्रयोजन अवश्य होता है।
  2. प्रोजेक्ट रुचिपूर्ण होता है।
  3. प्रोजेक्ट क्रिया सामाजिक वातावरण में की जाती है।
  4. प्रत्येक प्रोजेक्ट को आरम्भ करने के पश्चात् उसे पूर्ण करना भी आवश्यक माना जाता है।

प्रोजेक्ट प्रणाली के सिद्धांत (Principles of project method)

प्रोजेक्ट प्रणाली के निम्न सिद्धान्त हैं-

  1. प्रयोजनता- प्रोजेक्ट का सप्रयोजन होना परम आवश्यक है। अध्यापक छात्र के सम्मुख प्रयोजन-युक्त कार्य प्रस्तुत करता है।
  2. क्रियाशीलता- 'प्रोजेक्ट' में क्रिया को भी प्रधानता दी जाती है। इसमें ‘करके सीखने' का सिद्धान्त प्रयोग में लाया जाता है। छात्र जो कुछ भी सीखता है, वह करके सीखता है।
  3. यथार्थता- छात्र को प्रदान किये जाने वाले समस्यात्मक कार्य यथार्थ या वास्तविक होने चाहिये। वास्तविक जीवन से सम्बन्धित समस्याओं का हल छात्र शीघ्र निकाल लेते हैं।
  4. उपयोगिता- उपयोगी कार्यों में छात्र अधिक रुचि रखते हैं तथा उन्हें शीघ्र कर लेते हैं। अतः प्रोजेक्ट का उपयोगी होना भी आवश्यक है अर्थात् ज्ञान का उपयोगी और वास्तविक होना आवश्यक है।
  5. रोचकता- इस प्रणाली में प्रोजेक्ट का चुनाव छात्र स्वयं करते हैं। अतः अपना कार्य करने में विशेष रुचि लेते हैं। छात्रों के सामने समस्याएँ भी रुचिपूर्ण ही प्रस्तुत की जाती हैं।
  6. स्वतन्त्रता- प्रोजेक्ट प्रणाली में छात्रों को स्वयं अपना कार्य चुनने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की जाती है।
  7. सामाजिकता- इस प्रणाली में छात्रों को उन क्रियाओं को करने के अवसर प्रदान किये जाते हैं, जिनके करने से उनमें सामाजिकता का विकास होता है।

प्रोजेक्ट प्रणाली की कार्य विधि (Procedure of project method)

प्रोजेक्ट प्रणाली को पूर्ण करने के लिए निम्न पदों का प्रयोग किया जाता है-

  1. परिस्थिति उत्पन्न करना।
  2. योजना चुनना ।
  3. कार्यक्रम बनाना ।
  4. कार्यक्रम क्रियान्वित करना।
  5. कार्य का निर्णय या मूल्यांकन
  6. कार्य का लेखा।

1. परिस्थिति उत्पन्न करना

इस प्रणाली में छात्र को स्वयं प्रोजेक्ट चुनने के अवसर प्रदान किये जाते हैं। अत: अध्यापक इस प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है, जिससे कि छात्रों को उचित प्रोजेक्ट चुनने में रुचि उत्पन्न हो।

2. योजना चुनना

छात्र स्वयं प्रोजेक्ट का चुनाव करते हैं। शिक्षक मार्गदर्शक का कार्य करता है। छात्रों का मत लेकर ही अध्यापक प्रोजेक्ट स्वीकार करता है।

3. कार्यक्रम बनाना

इस सोपान में छात्र कार्यक्रम का निर्माण करते हैं। अध्यापक छात्रों को कार्यक्रम निर्माण के लिए वाद-विवाद के अवसर प्रदान करता है। आवश्यकतानुसार वह छात्रों का पथ-प्रदर्शन भी करता है।

4. कार्यक्रम क्रियान्वित करना

इस पद में छात्र स्वयं कार्य करते हैं। छात्र क्रिया द्वारा सीखता है तथा अनेक विषयों के सम्बन्ध में ज्ञान ग्रहण करता जाता है। अध्यापक छात्रों का केवल मार्ग-दर्शन करता है और स्वयं प्रोजेक्ट में कोई कार्य नहीं करता।

5. कार्य का निर्णय या मूल्यांकन

इस पद में अध्यापक और छात्र परस्पर मिलकर निर्णय करते हैं कि उन्हें प्रोजेक्ट पूर्ण करने में कहाँ तक सफलता मिली है ? इस मूल्यांकन में छात्रों को आत्म-आलोचना का शिक्षण प्राप्त होता है। वे स्वयं निरीक्षण-परीक्षण द्वारा देखते और समझते हैं कि उनसे कहाँ भूल हुई है।

6. कार्य का लेखा

प्रत्येक छात्र के पास विवरण पुस्तिका रहती है, जिसमें वे कार्य का लेखा (Record) दर्ज करते हैं। इसमें अध्यापक देखता है कि छात्र ने निर्धारित कार्य को पूरा किया है या नहीं। अन्त में कार्य का मूल्यांकन दर्ज किया जाता है।

प्रोजेक्ट विधि के प्रकार (Kinds of project method)

किलपैट्रिक ने प्रोजेक्ट का वर्गीकरण चार प्रकार से किया है-

1. रचनात्मक प्रोजेक्ट

इसका उद्देश्य छात्रों में रचनात्मक प्रवृत्ति का विकास करना है। इसमें छात्र नाव बनाने, मकान बनाने तथा पत्र लिखने आदि का कार्य करते हैं।

2. समस्यात्मक प्रोजेक्ट

इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य छात्रों को बौद्धिक समस्याएँ हल करने के लिए प्रेरित करना है। अध्यापक छात्रों के आगे समस्या रखता है और छात्र उसे हल करने का प्रयास करते हैं।

3. रसास्वादन के प्रोजेक्ट

रसास्वादन के प्रोजेक्टों का उद्देश्य छात्रों में रसानुभूति का विकास करना होता है।

4. अभ्यास के प्रोजेक्ट

इन प्रोजेक्टों का उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि छात्र ने किस सीमा तक कौशल या ज्ञान को ग्रहण किया है?

प्रोजेक्ट प्रणाली के गुण या विशेषताएँ (Merits or characteristics of project method)

प्रोजेक्ट प्रणाली में ध्यान से देखने पर निम्न विशेषताएँ मिलेंगी-

1. जीवन से सम्बन्धित

प्रोजेक्ट प्रणाली में पुस्तकीय शिक्षा की अवहेलना करके छात्रों को जीवन की वास्तविकता की शिक्षा दी जाती है। छात्र जीवन की यथार्थ समस्याओं को हल करना सीखते हैं।

2. चरित्र-निर्माण में सहायक

प्रोजेक्ट प्रणाली छात्रों का सर्वांगीण विकास करती है। छात्र विभिन्न समस्याओं को अपने प्रयास द्वारा हल करते हैं। अत: उनमें आत्म-विश्वास को भावनाओं का विकास होता है तथा वे कार्य का स्वयं मूल्यांकन भी करना सीखते हैं।

3. मनोवैज्ञानिक प्रणाली

प्रोजेक्ट प्रणाली प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक थॉर्नडाइक (Thorndike) के सीखने के नियम पर आधारित है। ये नियम हैं- (1) तत्परता का नियम, (2) अभ्यास का नियम तथा (3) प्रभाव का नियम। प्रोजेक्ट प्रणाली में इन तीनों नियमों का प्रयोग सफलता के साथ किया जाता है।

4. प्रजातान्त्रिक भावनाओं पर आधारित

शिक्षा की यह प्रणाली पूर्णतया प्रजातन्त्रीय भावनाओं पर आधारित है। इस प्रणाली में छात्रों को विचार-विमर्श कर प्रोजेक्ट चुनने तथा कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की जाती है। छात्र परस्पर सहयोग द्वारा किसी सामूहिक प्रोजेक्ट को पूरा करते हैं। इस प्रकार छात्रों में प्रजातन्त्रात्मक भावनाओं का विकास होता है।

5. मानसिक विकास में सहायक

प्रोजेक्ट प्रणाली में छात्र स्वयं सोचने, निरीक्षण करने तथा परस्पर वाद-विवाद द्वारा किसी समस्या को हल करने का प्रयास करते हैं। अत: उनका मानसिक विकास उचित दशा में होता है।

6. रुचिपूर्ण प्रणाली

यह प्रणाली रुचिपूर्ण है क्योंकि छात्र समस्या को हल करने में आनंद का अनुभव करते हैं तथा प्रयोजन की स्पष्टता उन्हें कार्य करने के लिए उत्साहित करती है।

7. हस्तकार्य के प्रति श्रद्धा

प्रोजेक्ट प्रणाली में छात्र प्रायः अधिकांश कार्य हाथ से करते हैं। अत: उन्हें हाथ से कार्य करने में आनन्द आता है। वे हाथ से कार्य करने में लज्जा अनुभव नहीं करते।

8. उत्तरदायित्व की भावना का विकास

इस प्रणाली में बालक अपने उत्तरदायित्व को समझने का पाठ सीखता है। जो प्रोजेक्ट वह हाथ में ले लेता है उसे पूर्ण करना अपना उत्तरदायित्व समझता है।

9. सह-सम्बन्ध पर आधारित

यह शिक्षा प्रणाली सह-सम्बन्ध पर आधारित है। इसमें विषयों के समन्वय पर बल दिया जाता है। विषयों को पृथक करके पढ़ाना अमनोवैज्ञानिक है।

10. विद्यालय और समाज से सम्बन्ध

यह प्रणाली विद्यालय और समाज के मध्य सम्बन्ध स्थापित करती है। प्रोजेक्ट का चुनाव सामाजिक वातावरण से किया जाता है तथा उसे पूरा भी सामाजिक वातावरण में किया जाता है।

सामाजिक योजनाओं (प्रोजेक्टों) के उदाहरण (Examples of social projects)

सामाजिक योजनाओं में निम्न प्रोजेक्टों या योजनाओं को प्रयोग में लाया जा सकता है-

  1. ग्राम,नगर या विद्यालय की स्वच्छता ।
  2. सामुदायिक सर्वेक्षण।
  3. सिंचाई के विभिन्न साधन।
  4. यातायात के साधन ।
  5. पोस्ट ऑफिस, सहकारी बैंक,सरकारी दुकान आदि का अध्ययन।
  6. ग्राम पंचायत का चुनाव, संगठन एवं कार्य प्रणाली।
  7. मानचित्र, मॉडल, समय रेखा तथा चित्र आदि का निर्माण।