पियाजे की मानसिक विकास की अवस्थाएँ

Mansik Vikas Ki Avasthaye

आज तक ज्ञानात्मक विकास के क्षेत्र में जितने शोध एवं अध्ययन किये गये हैं, उनमें सबसे अधिक विस्तृत, वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित अध्ययन जीन प्याजे ने किया। यही कारण है कि जीन प्याजे को मनोविज्ञान के क्षेत्र में तृतीय शक्ति (third force) के रूप में जाना जाता है।

पियाजे के ज्ञानात्मक सिद्धान्त में ज्ञानात्मक प्रकिया (Cognition) का अर्थ ज्ञान (Knowledge) से नहीं है बल्कि इसका सम्बन्ध मानव बुद्धि से है, जो ज्ञान को व्यवस्थित एवं संगठित (Organize) करती है तथा उसका उपयोग (Utilize) करती है।

पियाजे का सिद्धान्त शिशु अवस्था से किशोरावस्था तक के बालक के ज्ञानात्मक विकास एवं व्यवहार के प्रति सूक्ष्म दृष्टि एवं सूझ उत्पन्न करता है, जो शिक्षक के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है। पियाजे के अनुसार ज्ञान कार्य करने से प्राप्त होता है।

पियाजे की मानसिक विकास की अवस्थाएँ

Stages of Piaget's Cognitive Development

पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास की आयु के अनुसार निम्न चार अवस्थाएँ बतायी हैं-

  1. संवेदीगात्मक अवस्था : 0-2 वर्ष (Sensorimotor stage)
  2. पूर्व-क्रियात्मक अवस्था : 2-7 वर्ष (Pre-operational stage)
  3. मूर्त-क्रियात्मक अवस्था : 7-11 वर्ष (Concrete-operational stage)
  4. औपचारिक क्रियात्मक अवस्था : 11-15 वर्ष (Formal-operational stage)

1. संवेदीगात्मक अवस्था: 0-2 वर्ष (Sensorimotor Stage)

यह अवस्था बालक के जन्म से लेकर 2 वर्ष की अवधि तक रहती है। इस अवस्था में बालक इन्द्रियों और संवेदनाओं के द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है। इसमें जीवन के प्रथम वर्ष में बालक किसी वस्तु की अवधारणा विकसित करता है। इसके बाद बालक अपने पहुँच से परे लुप्त हुई वस्तुओं का पुनरुद्धार करने का प्रयत्न करता है। वस्तुओं का आकार अपने मस्तिष्क में ग्रहण करने के पश्चात् वह अभ्यास के अवसरों का उपयोग करता है।

जन्म के समय बालक कोई ज्ञान नहीं रखता। धीर-धीरे वह ज्ञान प्राप्त करता है। यह समस्त ज्ञान इन्द्रियों और संवेदनाओं के द्वारा प्राप्त करता है। इस आयु में बालक शारीरिक रूप से वस्तुओं को पकड़कर इधर-उधर रखता है, उन्हें उठाता है, हिलाता-डुलाता है तथा वस्तुओं को मुँह में डालकर ज्ञान प्राप्त करता है।

संवेदीगात्मक अवस्था की मुख्य विशेषताएँ

  1. शरीर पर नियन्त्रण करने की क्षमता का विकास।
  2. वस्तुओं के स्थायित्व की अवधारणा (Concept of object permanence) का विकास।
  3. व्यावहारिक ज्ञान की उपस्थिति तथा प्रतीकात्मक ज्ञान की अनुपस्थिति।
  4. स्थान एवं आवश्यकताएँ भी व्यक्तिनिष्ठ होती हैं 

अर्थात् बालक अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु ही कार्य करता है, जो वह सोचता, समझता है या चाहता है, उसे ही वह सही मानता है। दूसरों के विचारों तथा आवश्यकताओं आदि को समझने की क्षमता उसमें नहीं होती। इसे पियाजे ने आत्मकेन्द्रियता (Egocentrism) कहा है। यह इस अवस्था की प्रमुख विशेषता है।

संवेदीगात्मक अवस्था का विभाजन या भाग

संवेदीगात्मक अवस्था को पियाजे ने निम्न छ: अवस्थाओं में विभाजित किया है-

प्रथम उप-अवस्था : 0-1 माह (Stage I)

इस अवस्था की विशेषताएँ निम्न हैं -

  1. जन्मजात स्वतः प्रेरित क्रियाएँ (Inherited reflexes)
  2. आत्मकेन्द्रियता (Egocentrism)
  3. बुद्धि की आदिम अवस्था। (बुद्धि का विकास बालक तथा वातावरण के बीच होने वाली अन्तः-क्रिया पर)।

द्वितीय उप-अवस्था : 1-4माह (Stage ll)

इस अवस्था की निम्न विशेषताएँ हैं-

  1. कारण एवं उसके प्रभाव का आभास।
  2. क्रियाओं की पुनरावृत्ति।
  3. प्रीहेन्सन (Prehension) अर्थात् वस्तुओं को पकड़ना एवं छोड़ना।
  4. विभिन्न अनुक्रियाओं एवं वातावरण के साथ समन्वय; जैसे- सुनने एवं बोलने के प्रयत्न के बीच।
  5. नवीन व्यवस्थापन के फलस्वरूप खेल की प्रक्रिया।
  6. आत्मकेन्द्रियता (Egocentrism) की ही स्थिति।

तृतीय अवस्था : 4-8 माह (Stage III)

इस अवस्था में द्वितीयक वृत्तीय क्रियाएँ (Secondary circular reactions) प्रकट होती हैं। इन्हें वृत्तीय क्रियाएँ इसलिये कहा जाता है क्योंकि बालक अपनी क्रियाओं को बार-बार दोहराता है। इस अवस्था की वृत्तीय क्रियाएँ पर्यावरणीय घटनाओं को बनाये रखने के उद्देश्य से की जाती हैं, जो कि संयोग से उसके पास आती हैं।

उदाहरण के लिये, जब शिशु संयोगवश झुनझुने को हिलाता है एवं आवाज सुनता है तो उसी आवाज को पुनः सुनने के लिये वह झुनझुने को बार-बार हिलायेगा। इस प्रकार वह हिलाना सीख जाता है।

वह वस्तुओं को परिचालित करना भी सीखता है। इस क्रिया के लिये दो पद्धतियों के समन्वय की आवश्यकता होती है (अ) पकड़ना (Grasping)। (ब) सुनना (Listening)।

चतुर्थ उप-अवस्था : 8-12 माह (Stage IV)

इस अवस्था में बालक ऐसी जटिल क्रियाओं को कर सकता है, जो उसकी इच्छा को प्रकट करती हैं। चिह्नों के माध्यम से वह पूर्व घटनाओं का आभास कर सकता है। बालक नयी वस्तुओं के प्रति प्रतिक्रिया करता है तथा संकेतों को समझने का प्रयत्न भी करता है।

खेल इसका मन बहलाने का प्रमुख साधन बन जाता है तथा छिपी वस्तुओं को खोजने का प्रयत्न करता है। यह उसकी स्मृति विकास को दर्शाता है। इस अवस्था में द्वितीयक वृत्तीय क्रियाओं का समन्वय होता है।

पंचम् उप अवस्था : 12 से 18 माह (Stage V)

यह तृतीय वक्रित प्रतिक्रियाओं (Tertiary circular reaction) की अवस्था है, ये क्रियाएँ प्रयोगात्मक और सृजनात्मक हो जाती हैं। इस उप-अवस्था में बालक क्रिया एवं वस्तु के सम्बन्ध की खोजबीन करता है। शिशु वस्तु से प्रयोग कर इसे देखने, समझने और नवीन वस्तु की खोज करने का प्रयास करता है।

सोपान चार में बालक केवल लक्ष्य के साधनों का निर्माण करते हैं। इसके विपरीत अवस्था पाँच में बालक प्रयास एवं त्रुटि के प्रयोग द्वारा, सक्रिय रूप से नये साधनों की खोज करते हैं। पियाजे के अनुसार प्रयोग करने की यह नयी क्षमता वस्तु स्थायित्व की समझ में अधिक प्रगति समझ को आगे बढ़ती है।

षष्ठम् उप-अवस्था : 18 से 24 माह (Stage VI)

यह मस्तिष्क संयोग द्वारा नये साधनों के खोज की अवस्था है (Stage of invention of new means through mental combination)। इस अवस्था में वास्तविकता के मानसिक प्रतिनिधित्वों के बनाने की योग्यता विकसित होती है।

बालक लक्ष्य का प्रत्यक्षीकरण करके उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करने लगता है। बालक प्रयत्न और भूल उपागम द्वारा उचित क्रियाएँ करने लगता है। भाषा विकास की प्रारम्भिक पहचान के रूप में मुँह खोलने लगता है। दो वर्ष की अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते बालक अनेक उपस्थित एवं स्मृतिजन्य वस्तुओं एवं अनुभवों का अनुक्रमण करने लगते हैं। बालक वस्तुओं को ढूँढने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।

कार्य-कारण को समझने की क्षमता भी पर्याप्त परिपक्वता प्राप्त कर लेती है। वह कारण एवं परिणामों में सम्बन्ध स्थापित करने लगता है।

2. पूर्व-क्रियात्मक अवस्था: 2-7 वर्ष (Preoperational Stage)

यह भाषा कौशल विकास की प्रमुख अवस्था है, जिसमें सन्दर्भ शब्दों की समझ पैदा होने लगती है। अब बालक वस्तु तथा उसके सन्दर्भ को प्रकट करने वाले शब्द में अन्तर स्पष्ट करने लगता है। चिह्न एवं प्रतीक में अन्तर स्पष्ट होने लगते हैं। विचार एवं कार्यों में गति आ जाती है, जिससे बालक अधिक से अधिक सूचनाएँ एकत्र करने लगता है। धीरे-धीरे उसमें तार्किक गणितीय सम्प्रत्ययों (Logic mathematical operation) का विकास होने लगता है। क्रियाओं का मानसिक प्रस्तुतीकरण प्रारम्भ हो जाता है, जिसे विचार (Thought) कहा जाता है।

यह अन्तर्दृष्टि द्वारा सीखना या सूझ द्वारा सीखना (Insight learning) की आदिम अवस्था है, जिसमें बालक किसी बाह्य व्यवहार (Overcaution) के बिना अपनी समस्याओं को मानसिक रूप से सुलझाने लगता है।

पूर्व-क्रियात्मक अवस्था के कुछ व्यवहार इस प्रकार हैं-

  1. आत्मकेन्द्रियता (Egocentrism)
  2. शृंखलाबद्ध केन्द्र विहीन चिन्तन (Chained concatenative thinking)
  3. मानवीयकरण (Anthropomorphism)

आत्मकेन्द्रियता (Egocentrism)

आत्मकेन्द्रियता का आशय केवल स्वतः (Self) को केन्द्र मानकर सभी क्रियाएँ करने से है। पूर्व-क्रियात्मक अवस्था में बालक अपने से हटकर दूसरों के दृष्टिकोण या विचार को नहीं समझ पाता । वह स्वयं जिस प्रकार सोचता या समझता है-सोचता है कि दूसरे भी उसी प्रकार सोचते या समझते हैं।

शृंखलाबद्ध केन्द्र विहीन चिन्तन (Chained concatenative thinking)

इसका अर्थ विचारों का केन्द्र विहीन या बिन्दु विहीन होना है अर्थात् बालकों के मस्तिष्क में विचारों की श्रृंखलाएँ बिना किसी एक बिन्दु या केन्द्र के बनती हैं। सभी विचार अव्यवस्थित रहते हैं। इस प्रकार वह विचारों में समन्वय तथा क्रम स्थापित नहीं कर पाता।

मानवीयकरण (Anthropomorphism)

इसका तात्पर्य निर्जीव वस्तुओं को मनुष्य के रूप में सम्बोधित करने से या व्यवहार करने से है। पूर्व-क्रियात्मक बालक मनुष्य तथा वस्तुओं में अन्तर स्पष्ट नहीं कर पाता, वह दोनों को मनुष्य जैसा सम्बोधित करता है।

पूर्व-क्रियात्मक अवस्था के भाग

पूर्व-क्रियात्मक अवस्था (Pre-operational stage) को दो उप-भागों में बाँटा गया है-
  1. पूर्व-संकल्पनात्मक काल : 2-4 वर्ष (Pre-conceptual phase)
  2. अन्तःप्रज्ञ चिन्तन काल : 4-7 वर्ष (Intuitive thought)

पूर्व-संकल्पनात्मक काल : 2-4 वर्ष (Pre-conceptual phase)

दो वर्ष का बालक कार्य-कारण स्थान तथा वस्तुओं के आपसी सम्बन्ध को समझने लगता है। भाषा की दृष्टि से उसके विचार अभी अस्पष्ट होते हैं। अभी वह विचार एवं संकेतों में अन्तर स्पष्ट नहीं कर पाता।

अनुकरण (Imitation) तथा खेल के माध्यम से वह अपने विचारों एवं भावों को प्रकट करता है। उसकी भाषा पर उसका नियन्त्रण नहीं होता। नयी वस्तुओं को खोजने के प्रति वह उत्सुक रहता है। स्मृति पर आधारित प्रतिमाओं का निर्माण प्रारम्भ हो जाता है, जिससे उसकी प्रत्यक्ष वस्तुओं एवं स्थूल अनुभूतियों पर निर्भरता कम होने लगती है।

पूर्व-संकल्पनात्मक काल की विशेषताएं: इस अवस्था की मुख्य विशेषताएँ अनुकरण (Imitation), खेल, पूर्व-संकल्पना (Pre-concept) एवं भाषा विकास का प्रारम्भ है।

अतःप्रज्ञ चिन्तन काल : 4-7 वर्ष (Intuitive though)

इस अवस्था में बालक दो प्रकार की बोली या भाषा का प्रयोग करते हैं-

  1. आत्मकेन्द्रित भाषा (Ego-centric speech)- इसमें बालक अपने आप से बोलता है।
  2. सामाजिक भाषा (Socialized speech)- जिसे बालक दूसरों से बोलता है।

इस अवस्था में बालक सामूहिक मोनोलॉग (Collective monologue) प्रदर्शित करते हैं, जिसमें भाषा का प्रयोग किये बिना ही वे एक-दूसरे को प्रेरित करते हैं। धीरे-धीरे उनमें उचित भाषा प्रयोग की क्षमता विकसित हो जाती है।

बाह्य वातावरण से सामंजस्य एवं आन्तरिक संरचनाओं का आत्मसात् सन्तुलित होने लगता है। अभी बालक का चिन्तन अपूर्ण ही रहता है, जिससे वह कार्य-कारण तथा उचित-अनुचित का भेद ठीक से नहीं समझ पाता।

यही कारण है कि बालक इस प्रकार के निर्णय में सूझ एवं अन्तर्दृष्टि का प्रयोग करते हैं, जबकि प्रौढ़ तर्क का सहारा लेते हैं।

3. मूर्त-क्रियात्मक अवस्था: 7-11 वर्ष (Concrete-operational Stage)

मूर्त क्रियात्मक अवस्था 7 से 11 वर्ष तक होती है। इसे संज्ञानात्मक विकास का मुख्य परिवर्तन बिंदु माना जाता है। जब बालक इस अवस्था में आता है तो उसके विचार प्रौढ़ों के विचारों के अधिक निकट होते हैं। इस अवस्था में बालक अनेक तार्किक क्रियाएँ करने में समर्थ हो जाता है।

मूर्त क्रियात्मक तर्क अधिक तार्किक, नम्य और संगठित होता है। इस अवस्था में बालक-बालिकाओं में चिन्तन समस्या समाधान के कौशल का विकास होता है।

मूर्त-क्रियात्मक अवस्था की विशेषताएँ

विकेन्द्रण (Decentration)

इस अवस्था में बालक किसी वस्तु, घटना या पदार्थ के विभिन्न अवयवों एवं आयामों को एक साथ समझ सकता है, उनके सम्बन्धों को समझ सकता है तथा उनमें एकीकरण कर सकता है।

अविनाशिता (Conservation)

बालक अब समझ सकते हैं कि किसी वस्तु या पदार्थ के बाह्य रूप, रंग तथा आकार आदि में परिवर्तन होने पर भी उसकी मुख्य विशेषताओं में परिवर्तन नहीं होता; जैसे- पानी के बर्फ या भाप के रूप में परिवर्तित हो जाने पर भी उसकी मुख्य विशेषताएँ नहीं बदलती तथा उसे पुनः पानी की अवस्था में लाया जा सकता है।

क्रमगत क्षमता (Serialization)

क्रमगत क्षमता का अर्थ किसी आन्तरिक नियम के अधीन वस्तुओं को एक क्रम में रखने की क्षमता है। इसी क्षमता को पियाजे ने ट्रांजिविटी (Transitivity) भी कहा है। 7 वर्ष का बालक इस क्षमता के अनुसार वस्तुओं को कम से जमा सकता है।

नकारात्मक (Negation)

इस अवस्था में बालक किसी कार्य को उल्टे रूप में भी कर सकता है। वह वस्तुओं को पूर्वावस्था की स्थिति में जमा सकता है।

समरूपता (Identity)

समरूपता का तात्पर्य यह है कि वस्तुओं के रूप या आकार में परिवर्तन हो जाने पर भी वे अपने मूल आयतन या मात्रा को बनाये रखती हैं अर्थात् इस अवस्था में बालकों को इस तथ्य का ज्ञान होता है कि वस्तुओं के सभी टुकड़ों का योग मूल वस्तुओं के बराबर होता है।

क्षतिपूर्तिकरण (Compensation or peciprocity)

इस अवस्था में बालक यह समझ सकते हैं कि किसी एक दिशा या आयाम में किसी भी प्रकार की कमी की पूर्ति दूसरी दिशा या आयाम में अधिकता के द्वारा की जाती है।

मानसिक पुनर्प्रस्तुतीकरण (Mental pepresentation)

इस अवस्था में बालक कार्यों का प्रस्तुतीकरण मानसिक प्रतीकों के द्वारा कर सकते हैं। उदाहरण के लिये, विद्यालय से घर तक का मार्ग शब्दों द्वारा बताने के साथ-साथ मानचित्र बनाकर भी दर्शा सकते हैं।

4. औपचारिक-क्रियात्मक अवस्था: 11-15 वर्ष (Formal-operational Stage)

यह अवस्था मानसिक विकास की ऊर्ध्वगामी प्रक्रिया (Vertical Decalage) की अवस्था है अर्थात् इस अवस्था में समस्याओं के समाधान हेतु उच्च मानसिक स्तर की मानसिक क्षमताएँ विकसित होती हैं, जबकि मूर्त क्रियात्मक अवस्था (Concrete operational stage) में क्षैतिज (Horizontal) दिशा में मानसिक क्षमताओं का विकास अधिक होता है।

इस अवस्था में किशोर विचारों के माध्यम से स्थूल अनुभवों के अभाव में भी चिन्तन कर सकता है तथा समस्याओं का मानसिक समाधान ढूँढ सकता है। वह परिकल्पनाएँ बना सकता है तथा उनकी सत्यता स्थापित कर सकता है।

औपचारिक-क्रियात्मक अवस्था की मुख्य विशेषताएँ

  1. इस अवस्था में किशोर अपने चिन्तन पर भी चिन्तन कर सकता है। वह काल्पनिक या शुद्ध परिकल्पनाएँ बना सकता है। इस प्रकार परिकल्पनाएँ बनाना एवं उनकी सत्यता स्थापित करना इस अवस्था की एक मुख्य विशेषता है।
  2. बालक में तार्किक क्षमताएँ विकसित हो जाती हैं तथा वह अमूर्त चिन्तन (Abstract thinking) के योग्य हो जाता है।
  3. समस्याओं के समाधान में वह प्रत्यक्ष एवं वर्तमान वास्तविकताओं पर निर्भर नहीं रहता।
  4. उसके प्रयोग में एक व्यवस्था एवं क्रम उपस्थित हो जाता है।
  5. वह अमूर्त अवधारणाओं (Abstract concepts) को समझ सकता है एवं आत्मसात् कर सकता है; जैसे- नैतिकता, प्रेम, अस्तित्व एवं ईमानदारी आदि।
  6. पियाजे के अनुसार, औपचारिक क्रियात्मक अवस्था ज्ञानात्मक विकास की अन्तिम अवस्था है अर्थात् सभी प्रकार की मानसिक क्षमताओं का अधिकतम विकास इस अवस्था में हो जाता है। इस अवस्था के उपरान्त उपलब्धि में तो विकास हो सकता है किन्तु ज्ञानात्मक क्षमताओं में इस अवस्था के बाद विकास नहीं होता।
  7. इस अवस्था के प्रारम्भिक काल में किशोर बालक-बालिकाओं में स्वकेन्द्रीयकरण (Egocentrism) की प्रवृत्ति पायी जाती। इस अवस्था में स्वकेन्द्रीयकरण की अवधारणा में एक नवीन आदर्शीकरण (Naive idealism) का पुट है, जो ज्ञानात्मक विकास की प्रथम दो अवस्थाओं के स्वकेन्द्रीकरण (Egocentrism) से भिन्न है। स्पष्ट है कि किशोरावस्था आदर्शवादिता, तर्क, कल्पना तथा दिवास्वप्न आदि विशेषताओं की अवस्था है।
  8. इस अवस्था की एक दूसरी विशेषता समस्या समाधान की क्षमता है। किशोर सैद्धान्तीकरण (Theorizes) करता है। अपने सिद्धान्तों का उपागमवत् विश्लेषण करता है, पुनर्निरीक्षण करता है तथा सभी व्याख्याओं को उचित स्थान देता है।