अभिप्रेरित करने की विधियाँ (Methods of Motivating) - अभिप्रेरणा की विधियाँ in Hindi

Abhiprerit Karne Ki Vidhiyan

अभिप्रेरणा की विधियाँ (Methods of Motivating)

कक्षा शिक्षण में प्रेरणा का अत्यन्त महत्त्व है। कक्षा में पढ़ने के लिये विद्यार्थियों को निरन्तर प्रेरित किया जाना चाहिये। प्रेरणा की प्रक्रिया में वे अनेक कार्य करते हैं, जिसके फलस्वरूप विभिन्न छात्रों का व्यवहार भिन्न होता जाता है; उदाहरणार्थ- सामाजिक तथा आर्थिक अवस्थाएँ, पूर्व अनुभव, आयु तथा कक्षा का वातावरण आदि सभी तत्त्व प्रेरणा की प्रक्रिया में सहयोग प्रदान करते हैं।

अभिप्रेरित करने में प्रयोग होने वाली विधियाँ (Methods of Motivating)

अध्यापक विद्यार्थियों को सिखाने तथा अभिप्रेरित करने के लिये निम्न विधियों और प्रविधियों का प्रयोग कर सकते हैं-

1. सन्तोष और असन्तोष (Satisfection and disatisfaction)

हम उन आनन्ददायक अनुभवों की इच्छा करते हैं जिनसे सन्तोष प्राप्त होता है और कष्टदायक अनुभवों से बचने का प्रयत्न करते हैं, जिनसे असन्तोष प्राप्त होता है। शिक्षक को आनन्ददायक अनुभव देने चाहिये, जिससे विद्यार्थी को सन्तोष मिले। सन्तोषप्रद प्रेरणा ही विद्यार्थी को अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिये प्रेरित करेगी।

2. उत्साहवर्द्धन (Encouragement)

शिक्षक को विद्याथियों का उत्साहवर्द्धन करने के लिये उनके कार्य पर पुरस्कार प्रदान करने चाहिये। पुरस्कार विद्याथियों को पढ़ने के लिये उत्साहवर्द्धन में सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

शिक्षक को ध्यान रखना चाहिये कि वह पुरस्कारों का प्रयोग इस प्रकार करे कि अपनी भूमिका पूरी करने के पश्चात् वह विद्यार्थियों को इस प्रकार प्रेरित कर सके कि उसकी स्वतन्त्र रूप से घर पर पढ़ने की रुचि बनी रहे।

3. प्रशंसा को सुदृढ़ करना (To make rigid the praise more and more)

विद्यार्थियों को अभिप्रेरित करने में प्रशंसा अधिक प्रभावशाली होती है। प्रेरणा की यह सुदृढ़ता व्यक्तिगत विद्यार्थियों में भिन्न-भिन्न होती है। उचित अवसर पर ही प्रशंसा का प्रयोग करना चाहिये। विद्यार्थियों के प्रत्येक कार्य पर प्रशंसा करने की आवश्यकता नहीं। इससे प्रेरणा शिथिल हो जाती है।

4. प्रतियोगिता (Competition)

पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं में प्रतियोगिता प्रेरणा एक विशिष्ट साधन है। विद्यालय में अध्यापक विद्यार्थियों के मध्य प्रतियोगी कार्यक्रमों के माध्यम से प्रेरणा प्रदान कर सकता है।

5. सहयोग (Co-operation)

सहयोग भी प्रेरणा का महत्त्वपूर्ण साधन है। सहयोग की भावना पर ही समूहों का निर्माण होता है। सहयोग द्वारा सम्पूर्ण कक्षा को अध्ययन में व्यस्त रखा जा सकता है।

6. नवीनता (Novelty)

किसी विषय के नवीन तथ्यों का उद्घाटन कर अध्यापक विद्यार्थियों में विषय के प्रति उत्सुकता और रुचि उत्पन्न कर सकता है। अध्यापक को नवीनता का लाभ प्राप्त करने के लिये नवीन ज्ञान को पूर्व ज्ञान से सम्बद्ध कर पढ़ाना चाहिये।

अध्यापक को विषय की व्याख्या भिन्न-भिन्न प्रकार से करनी चाहिये, जिससे शिक्षण में नवीनता बनी रहे। नवीनता का संचार होने से रुचि के भाव जाग्रत हो जाते हैं।

7. लक्ष्य निर्धारित करना (Fixation of aims)

अध्यापक को समस्त कक्षा के लिये ऐसे लक्ष्य निर्धारित करने चाहिये, जिनकी प्राप्ति सुगमता से हो सके। सीखने में लक्ष्य का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। यदि विद्यार्थी का लक्ष्य लाभप्रद है तो वह लक्ष्य प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील होगा और तुरन्त मिलने वाले कम लाभ को छोड़ देगा।

8. मानसिक तनाव से मुक्ति (Free of mental tension)

विद्यार्थियों को अभिप्रेरित करने के लिये इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उनमें मानसिक तनाव उत्पन्न न हो। फिर भी विद्यार्थियों के मस्तिष्क में यदि थोड़ी उत्सुकता हो तो वह समस्या समाधान में शीघ्रता करता है।

इसलिये अध्यापक को विद्यार्थियों में कुछ उत्सुकता उत्पन्न करनी चाहिये, जिससे अभिप्रेरण सरलता से हो सके।

9. आदर्श (Ideals)

विद्यार्थी अवलोकन और अनुकरण द्वारा सुगमता से सीखता है। इसलिये विद्यार्थी को प्रेरित करने के लिये अध्यापक को आदर्श प्रस्तुत करना चाहिये, जिसको देखकर विद्यार्थी अनुकरण कर सकें। ऐसे आदर्शों का प्रदर्शन श्रव्य और दृश्य सामग्री के उपयोग से किया जा सकता है।

10. रुचियाँ (Interests)

विद्यार्थी जिस कार्य में अधिक रुचि लेता है, उसमें उसकी अधिक अभिप्रेरणा होगी और अभिप्रेरणा से वह कार्य शीघ्र एवं भली-भाँति सीखा जा सकेगा। अत: शिक्षक को विद्यार्थी की रुचियों को पहचान कर तदनुरूप शिक्षण कार्य करना चाहिये।

11. कक्षा को अभिप्रेरित करना (Motivation inclass-room situations)

कक्षा में बाह्य एवं आन्तरिक अभिप्रेरणा दोनों ही आवश्यक होते हैं। बाह्य प्रेरणा का सम्बन्ध विद्यार्थियों के बाह्य वातावरण से होता है, जबकि आन्तरिक प्रेरणा का सम्बन्ध उनकी रुचियों, अभिरुचियों, दृष्टिकोण और बुद्धि आदि से होता है। यह प्राकृतिक अभिप्रेरणा होती है। इसके लिये शिक्षण विधि की आवश्यकता का ज्ञान एवं आत्म-प्रदर्शन का अवसर योग्यतानुसार देना चाहिये।

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