मानसिक स्वास्थ्य सुधार के उपाय - घर, विद्यालय और समाज का योगदान

Mansik Swasthya Sudhar Ke Upay

मानसिक स्वास्थ्य सुधार के उपाय

Measures of Mental Health Improvement

बालक के मानसिक रूप से स्वस्थ न रहने के कारण उसके अन्दर असमायोजन उत्पन्न हो जाता है। इससे बालक पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वह समायोजन उचित रूप से नहीं कर पाता। उसकी क्षमता में कमी आ जाती है।

छात्र के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु निम्न उपाय करने चाहिये-

1. शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान

अच्छे मानसिक स्वास्थ्य के लिये अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य का होना भी आवश्यक है। इसलिये बालक को सदैव अपने शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिये।

2. मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की शिक्षा

प्रत्येक बालक को मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान की शिक्षा दी जानी चाहिये। ऐसा करने से वह अपनी कठिनाइयों को समझकर उनका उचित उपचार कर सकेगा, जिससे उसका समायोजन भी ठीक बना रहेगा।

3. आर्थिक कठिनाइयों को दूर करना

बालक में समायोजन का मुख्य कारण उसकी आर्थिक स्थिति होती है। घर की आर्थिक दशा ठीक होने पर ही वह आर्थिक चिन्ता से मुक्त होगा और उसका समायोजन भी अच्छा होगा।

4. उचित मात्रा में गृह तथा कक्षा कार्य प्रदान करना

बालक के मानसिक स्वास्थ्य को ठीक बनाये रखने के लिये उसे विद्यालय में उचित मात्रा में गृह तथा कक्षा कार्य दिया जाय। कार्य की अधिकता एवं कार्य की कमी दोनों ही बालक में असमायोजन उत्पन्न कर देती हैं।

5. भविष्य में व्यवसाय की प्राप्ति

अधिक आयु के बालकों को यह चिन्ता रहती है कि पढ़-लिखकर जब तैयार हो जायेंगे तो हमें नौकरी कहाँ मिलेगी? हम क्या करेंगे? आज के बेरोजगारी के समय यह चिन्ता रहती है। उनको नौकरी या व्यवसाय चयन की चिन्ता न होगी तो वे मन लगाकर विद्याध्ययन करेंगे तथा उनका मानसिक स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा।

6. मनोरंजन की व्यवस्था

बालकों के मनोरंजन की भी उचित व्यवस्था होनी चाहिये। कठिन परिश्रम के कारण बालकों को मानसिक थकान हो जाती है। अत: समायोजन प्रभावित होता है।

7. सदाचरण वाले मित्र बनाना

बालकों को चरित्रवान एवं विश्वास पात्र मित्र बनाने चाहिये, ताकि संकट के समय वे काम आ सकें। अच्छे मित्रों के अभाव में आपत्ति के समय मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है।

8. शिक्षण सामग्री की सुविधा

बालकों को अध्ययन हेतु पर्याप्त मात्रा में शिक्षण सामग्री उपलब्ध होनी चाहिये।

9. विद्यालय का वातावरण

विद्यालय में सहयोग एवं सहानुभूति का वातावरण होना चाहिये। छात्रों, अध्यापकों तथा प्रधानाध्यापक आदि के बीच तनाव नहीं होना चाहिये।

10. छात्र संघ की स्थापना

बालकों का मानसिक स्वास्थ्य प्राय: दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली, बेरोजगारी एवं तानाशाही रवैया के कारण खराब हो जाता है। अत: इन समस्त कारणों के निवारण हेतु छात्र संघों की प्रान्तीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर स्थापना होनी चाहिये। इससे छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहेगा।

घर, विद्यालय और समाज का मानसिक स्वास्थ्य सुधार में योगदान

Contribution of Home, School and Society in Mental Health Reformation

बालक के सुधार तथा परिवर्तन में घर, विद्यालय तथा समाज की प्रमुख भूमिका रहती है। समाज तथा विद्यालय उसके विकास को प्रभावित करते हैं। बालक इन संस्थाओं से प्रत्यक्ष रूप से सम्बन्धित रहता है। अत: ये उसके विकास को किसी न किसी रूप में प्रभावित करती रहती हैं।

(अ) घर का मानसिक स्वास्थ्य सुधार में योगदान

1. घर का प्रभाव

बालक घर में जन्म लेता है और उसका विकास भी घर में ही होता है। अत: घर का वातावरण बालक को सबसे अधिक प्रभावित करता है।

2. शान्तिमय वातावरण

जिन घरों का वातावरण शान्तिमय तथा कलह से मुक्त होता है वहाँ बालकों का संवेगात्मक विकास भी स्वाभाविक रूप में होता है। कलहयुक्त वातावरण में पले बालक झगड़ालू तथा संवेगात्मक दृष्टि से अस्थिर होते हैं।

3. भाषा का विकास

बालक बोलचाल का प्रशिक्षण घर से ही सीखता है। माता -पिता की भाषा बालको को सबसे अधिक प्रभावित करती है।

4. माता-पिता का व्यवहार

माता-पिता का बालकों के प्रति व्यवहार भी उनके विकास को प्रभावित करता है। यदि माता-पिता अपने सभी बालकों को समान दृष्टि से प्यार करते हैं, तो बालकों का मानसिक विकास भी ठीक प्रकार से होगा।

इसके विपरीत पक्षपातपूर्ण व्यवहार बालकों में द्वन्द्व उत्पन्न करता है। जो माता-पिता किसी विशेष बालक पर लाड़-प्यार अधिक करते हैं, उसके बिगड़ने की अधिक सम्भावना रहती है।

5. सदस्यों का व्यवहार

परिवार के सदस्यों का परस्पर व्यवहार भी बालक के व्यवहार को प्रभावित करता है। जिन परिवारों के सदस्य शिष्ट तथा नियम से जीवन व्यतीत करने वाले होते हैं, वहाँ बालक भी शिष्ट व्यवहार करने वाले तथा नियमबद्ध जीवन व्यतीत करने वाले होते हैं।

6. आर्थिक दशा

परिवार की आर्थिक दशा भी बालकों के विकास को प्रभावित करती है। जिन परिवारों की आर्थिक दशा अच्छी होती है, वहाँ बालकों को पर्याप्त पौष्टिक भोजन मिलता है। अत: इनका शारीरिक विकास भी उचित दशा में होता है।

परन्तु आवश्यकता से अधिक गरिष्ठ भोजन बालकों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है। प्रायः अमीरों के बालक इसी कारण पेट के रोगी होते हैं। दूसरी ओर निर्धन परिवारों के बालक धनाभाव के कारण पौष्टिक भोजन प्राप्त नहीं कर पाते।

अत: उनका शारीरिक विकास भी ठीक प्रकार से नहीं हो पाता। धनाभाव के कारण निर्धन परिवार के बालकों की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती। अत: वे कक्षा में भी पढ़ने से पिछड़ जाते हैं।

7. सामान्य बुद्धि का विकास

जिन परिवारों में अच्छी पुस्तकें होती हैं तथा अच्छी पत्रिकाएँ आती हैं, वहाँ के बालकों की सामान्य बुद्धि का विकास तीव्रता से होता है।

8. अनुशासन का प्रशिक्षण

जिन परिवारों में अनुशासन की भावना आवश्यकता से अधिक कठोर होती है तथा माता-पिता बात-बात पर बालकों को कठोर दण्ड देते हैं, वहाँ के बालक विद्रोही होते हैं या चोरी छिपे अपराध करने लगते हैं। उनके मस्तिष्क में एक प्रकार की विकृति उत्पन्न हो जाती है।

9. घर के वातावरण में सुधार के सुझाव

घर के वातावरण में सुधार के सुझाव निम्न हैं-

  1. घर का वातावरण पूर्णतया, शान्तिमय होना चाहिये। बात-बात पर माता-पिता को लड़ना-झगड़ना नहीं चाहिये।
  2. अभिभावकों को लालन पालन करने का प्रशिक्षण लेना चाहिये।
  3. बालकों की विभिन्न शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाय।
  4. बालकों के साथ मनोवैज्ञानिक व्यवहार किया जाय तथा उन्हें बात-बात में डाँटना-डपटना नहीं चाहिये।
  5. निर्धन परिवार के बालकों को सरकार द्वारा पर्याप्त आर्थिक सहायता प्रदानकी जाय।
  6. अभिभावकों का कर्तव्य है कि वे अपने बालकों को खेलने-कूदने की स्वतन्त्रता दें।
  7. परिवार के समस्त सदस्यों का आचरण नैतिकतापूर्ण होना चाहिये।

(ब) विद्यालय का मानसिक स्वास्थ्य सुधार में योगदान

विद्यालय बालक के सुधार में निम्नलिखित योगदान करते हैं-

  1. विद्यालय बालक के लिये स्वास्थ्यप्रद और शिक्षाप्रद वातावरण प्रदान करते हैं। इस प्रकार के वातावरण में उनका शारीरिक विकास और मानसिक विकास उचित प्रकार से होता है।
  2. विद्यालय बालकों को विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर प्रदान करते हैं, इस प्रकार उनमें सामाजिकता का विकास करते हैं।
  3. जिन बालकों के घर का वातावरण शैक्षिक नहीं होता, वे बालक विद्यालय में इस अभाव की पूर्ति कर लेते हैं।
  4. वाद-विवाद, कविता प्रतियोगिता तथा अन्य साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेकर बालक अपना साहित्यिक विकास करते हैं।
  5. विद्यालय सामूहिक खेल-कूद तथा व्यायाम-शालाओं का आयोजन करके छात्रों के शारीरिक विकास में एक महत्त्वपूर्ण योग प्रदान करते हैं।
  6. विद्यालयों में बालकों की रचनात्मक शक्ति तथा प्रतिभा का विकास होता है।
  7. स्वशासन जैसी योजनाओं में भाग लेकर बालक प्रजातन्त्र का पाठ सीखते हैं।
  8. बुनियादी विद्यालय बालकों को विभिन्न प्रकार के हस्त-शिल्प का प्रशिक्षण देकर व्यावसायिक क्षमताओं का विकास करते हैं।

(स) समाज या समूह का मानसिक स्वास्थ्य सुधार में योगदान

  1. समूह एक प्रकार से समाज की इकाई होती है। बालक किसी न किसी समूह के सदस्य होते हैं और उसके प्रति निष्ठावान होते हैं। बालकों के खेलने-कूदने की विभिन्न क्रियाएँ समूह में ही होती हैं। ऐसी दशा में बालक का समूह द्वारा प्रभावित होना स्वाभाविक हो जाता है।
    अत: समूह बालक के विकास को अवश्य प्रभावित करता है। समाज बालक में सामाजिकता की भावना का विकास करता है।
  2. समाज में रहकर बालक परस्पर सहयोग और सहकारिता की भावना सीखते हैं तथा नेतृत्व की भावना का जन्म होता है।
  3. समाज बालकों को संगठन और नेतृत्व का प्रशिक्षण देता है।
  4. यदि समाज के सदस्य दुराचारी और भ्रष्ट हैं तो अच्छे बालक भी भ्रष्ट और दुसचारी हो जाते हैं।
  5. समाज बालकों में प्रतियोगिता की भावना उत्पन्न करता है। वह प्रतियोगिता अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी।
  6. बुद्धिमान मित्रों के समूह में बालक का मानसिक विकास होता है।
  7. समाज में न रहने पर बालक एकान्तप्रिय तथा असामाजिक हो जाता है।
  8. समाज में रहकर बालक अपनी रुचियों, क्षमताओं तथा योग्यताओं का विकास कर लेता है।
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