प्राथमिक स्तर पर बाल विकास के अध्ययन की उपादेयता एवं महत्व

Prathmik Star Par Bal Vikas Ke Adhyayan Ki Upadeyata Aur Mahatva

प्राथमिक स्तर पर बाल विकास के अध्ययन की उपादेयता एवं महत्व (Utility and Importance of Child Development Study at Primary Level)

प्राथमिक स्तर पर बालक शैशवावस्था से निकलकर बाल्यावस्था में पहुँच जाता है। इसमें बालक की आयु वर्ग को 6 वर्ष से 12 वर्ष तक निर्धारित किया गया है, जबकि पूर्व प्राथमिक स्तर पर बालक को आयु 4 से 6 वर्ष तक होती है। इसलिये प्राथमिक स्तर एवं पूर्व प्राथमिक स्तर पर बालकों की गतिविधियों में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है।

प्राथमिक स्तर पर भी बाल-विकास की प्रक्रिया का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके अभाव में शिक्षक तथा विद्यालय सम्बन्धित कर्मचारी बालकों के चहुंमुखी विकास में अपने दायित्व का निर्वाह नहीं कर सकता।

प्राथमिक स्तर पर बाल विकास के अध्ययन की उपयोगिता एवं महत्त्व को निम्नलिखित बिन्दुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है-

1. शारीरिक विकास में उपादेयता (Utility in physical development)

बाल्यावस्था में बालक की लम्बाई 2 से तीन इंच तक बढ़ जाती है। शरीर के भार में भी व्रद्धि होती है। हड़ियों की संख्या भी 350 तक हो जाती है। इस प्रकार प्राथमिक स्तर पर बालकों में अनेक परिवर्तन आते हैं, जिन्हें बाल विकास की प्रक्रिया के आधार पर समझा जा सकता है।

यदि शिक्षक को बाल विकास की प्रक्रिया का ज्ञान है तो वह बालक के शारीरिक विकास को सन्तुलित करने का प्रयास करेगा। यदि शिक्षक को शारीरिक विकास में अवरोध दृष्टिगोचर होता है तो वह उसके कारणों को ज्ञात करके उसका समाधान प्रस्तुत करेगा। यह कार्य शिक्षक द्वारा ही उस अवस्था में सम्पन्न किया जा सकता है, जब वह बाल विकास की प्रक्रिया का पूर्ण ज्ञान रखता है।

2. मानसिक विकास में उपयोगिता (Utility in mental development)

प्राथमिक स्तर पर बालक छोटी-छोटी पंक्तियों को दोहराता है, कहानी सुना सकता है एवं दिन, तारीख, सिक्कों तथा वर्ष का ज्ञान प्रकट करने लगता है। तीन मिनट में साठ से सत्तर शब्द तक बोल सकता है।

इस स्तर पर शिक्षक का दायित्व होता है कि बालक की गतिविधियों का निरीक्षण करके वह ध्यान रखे कि उसका मानसिक विकास पूर्ण रूप से हो रहा है या नहीं। इसके लिये उसको बाल विकास के अध्ययन की आवश्यकता होती है क्योंकि मानसिक विकास के मानक जान के अभाव में वह बालको को सन्तुलित विकास की ओर उन्मुख नहीं कर सकता।

यह तक उसको बाल विकास की प्रक्रिया का अध्ययन करने पर प्राप्त होता है। अत: प्राथमिक के बालकों को मानसिक विकास में बाल विकास की प्रक्रिया का अध्ययन उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है।

3. संवेगात्मक विकास में योगदान (Contribution in emotional development)

प्राथमिक स्तर पर बालको के अन्दर क्रिया के प्रति प्रेम, ईर्ष्या,द्वेष एवं प्रतियोगिता से संवेग प्रकट करना प्रारम्भ हो जाता है। माता-पिता के द्वारा किये गये कथन के प्रति वह हाँ या ना कहकर चुप हो जाता है। बाल्यावस्था के अन्तिम वर्षों में वह संवेगों पर नियन्त्रण करना सीख जाता है।

बालकों का उचित संवेगात्मक विकास विद्यालयी व्यवस्था के ऊपर निर्भर करता है, जिसमें शिक्षक का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। शिक्षक को बाल विकास की प्रक्रिया का ज्ञान होने पर वह प्राथमिक स्तर पर होने वाले सम्भावित संवेगों के विकास को ध्यान में रखकर बालकों का सहयोग करता है तथा मार्ग-दर्शन करता है।

अत: बाल विकास के अध्ययन के अभाव में वह बालकों के संवेगात्मक विकास में सहयोग नहीं कर पायेगा।

4. सामाजिक विकास में उपयोगिता (Utility in social development)

प्राथमिक स्तर पर बालकों में सामाजिक भावना, आत्मनिर्भरता एवं वैयक्तिकता का विकास होने लगता है। बाल विकास के ज्ञान से सम्पन्न शिक्षक यह जानता है कि इस स्तर पर बालकों में कौन-कौन से गुण विकसित होने चाहिये?

इसलिये वह सामाजिक गणों के विकास हेत विद्यालय में अनेक प्रकार की सामाजिक गतिविधियों का आयोजन करता है, जिससे बालकों का सन्तुलित सामाजिक विकास सम्पन्न हो। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि शिक्षक बाल विकास के ज्ञान के अभाव में बालकों के सामाजिक विकास में किसी भी प्रकार का योगदान नहीं दे सकता।

अत: बाल विकास का अध्ययन प्राथमिक स्तर पर महत्त्वपूर्ण है।

5. चारित्रिक विकास में उपयोगिता (Utility in character development)

प्राथमिक स्तर पर बालक शिक्षक एवं अभिभावक की आज्ञा को पालन करने के लिये तत्पर रहते हैं। वे अन्याय, चोरी, स्वार्थ एवं झूठ बोलने से सम्बन्धित कार्यों के प्रति उदासीन हो जाते हैं। शिक्षक के लिये यह आवश्यक हो जाता है कि वह बालकों के चारित्रिक विकास में अपना पूर्ण सहयोग करे।

शिक्षक चारित्रिक विकास में उस स्थिति में सहयोग कर सकता है, जब उसे यह ज्ञात हो कि प्राथमिक स्तर पर बालकों का चारित्रिक विकास किस प्रकार होता है? यह प्रक्रिया बाल विकास के अध्ययन से ही शिक्षक को प्राप्त हो सकती है। अत: चारित्रिक विकास में बाल विकास के अध्ययन की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

6. भाषा विकास में उपयोगिता (Utility in language development)

प्राथमिक स्तर पर भाषा विकास पूर्ण प्राथमिक स्तर से भिन्न होता है। इसलिये भाषा के सन्तुलित विकास के लिये शिक्षक को बाल विकास की प्रक्रिया का ज्ञान आवश्यक होता है। इसमें शिक्षक को यह ज्ञान हो जाता है कि प्राथमिक स्तर पर भाषायी विकास की स्थिति क्या होनी चाहिये?

इस स्थिति के अनसार ही वह बालकों के भाषायी विकास की व्यवस्था करता है तथा इसम अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करता है। इस प्रकार बाल विकास की उपयोगिता भाषायी विकास में पूर्णत: दृष्टिगोचर होती है।

7. सृजनात्मकता के विकास में उपयोगिता (Utility in development of creativity)

प्राथमिक स्तर पर बालकों की सृजनात्मकता का क्षेत्र बढ़ जाता है। इसमें बालक अभिनय करने की योग्यता प्राप्त कर लेता है। बालक विभिन्न प्रकार के खिलौनों का निर्माण करता है तथा अन्य उपयोगी डिजायनों का निर्माण करने लगता है।

शिक्षकों द्वारा बालकों की सृजनात्मक गतिविधियों का सन्तुलित विकास करने के लिये बाल विकास की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है क्योंकि इसके द्वारा ही वह बालकों के सृजनात्मक स्तर को ज्ञात करके उसमें आवश्यक सुधार करता है। इसलिये बाल विकास का अध्ययन सृजनात्मक विकास के लिये उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है।

8. सौन्दर्य बोध सम्बन्धी विकास में उपयोगिता (Utility in asthetic related development)

बाल्यावस्था में बालक विभिन्न प्रकार की प्रकृति वर्णन, देश-भक्ति गीतों को समझना प्रारम्भ कर देता है। वह कविता गद्य एवं नाटक आदि के केन्द्रीय भाव को ग्रहण करने लगता है। सौन्दर्यानुभूति सम्बन्धी दक्षताओं का विकास एक शिक्षक उस अवस्था में कर सकता है, जब उसे बाल्यावस्था की सौन्दर्यानुभूति के स्तर का ज्ञान हो।

यदि बालकों का सौन्दर्यानुभूति स्तर निम्न है तो शिक्षक अपनी व्यक्तिगत सहायताद्वारा तथा विद्यालयी गतिविधियों द्वारा सौन्दर्यानुभूति को बढ़ाने का प्रयास करता है। इस प्रकार बाल विकास का अध्ययन सौन्दर्यानुभूति के विकास में उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण है।
Saudarya Bodh Sambandhi Bal Vikas
सौन्दर्य बोध सम्बन्धी बाल-विकास

9. प्रभावी शिक्षण में उपयोगिता (Utility in effective teaching)

प्राथमिक स्तर पर बालकों को शिक्षा प्रदान करने की शिक्षण विधियों में तथा पूर्व प्राथमिक स्तर पर शिक्षा प्रदान करने की विधियों में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है। प्राथमिक स्तर पर बालक का मानसिक स्तर उच्च हो जाता है। इसलिये इस स्तर पर खेल के अतिरिक्त शिक्षण पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

इस स्तर पर शिक्षक बालकों के स्तरानुकूल शिक्षण विधियों का प्रयोग करके शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाता है। यह कार्य बाल विकास के अध्ययन द्वारा ही सम्भव होता है क्योंकि इस ज्ञान के आधार पर ही वह बालक की सम्भावित योग्यता को ज्ञात करता है।

10. मूल्यों के विकास में उपयोगिता (Utility in development of values)

मूल्यों के विकास में भी बाल विकास के अध्ययन की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। बाल विकास की प्रक्रिया में प्राथमिक स्तर पर विकसित होने वाले मूल्यों का स्पष्ट वर्णन है। इसके आधार पर शिक्षक को यह ज्ञात हो जाता है कि प्राथमिक स्तर पर बालकों में किन-किन सामाजिक, नैतिक एवं मानवीय मूल्यों का विकास करना है?

इस कार्य के लिये वह बालकों के मूल्य विकास में आने वाली समस्याओं का समाधान करता है तथा बालकों को सन्तुलित मूल्य विकास की ओर उन्मुख करता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि मूल्य विकास के लिये बाल विकास का अध्ययन परमावश्यक है।

उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि बाल विकास की प्रक्रिया का ज्ञान प्राथमिक स्तर पर शिक्षक एवं शिक्षण से सम्बद्ध सभी व्यक्तियों को होना चाहिये। बालकों के सामाजिक, मानसिक एवं शारीरिक विकास आदि में सावधानीपूर्वक प्रयत्ल करने चाहिये, जिससे बालको के कोमल मन को आघात न लगे। इसलिये प्राथमिक स्तर के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में बाल विकास के अध्ययन को अनिवार्य रूप से स्थान मिलना चाहिये।

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