अजैविक घटक (Abiotic Components), Ajaivik Ghatak - पर्यावरण

अजैविक घटक (Abiotic Components) किसी पारिस्थितिक तन्त्र में पाए जाने वाले सभी निर्जीव पदार्थ उसके अजैविक घटक कहलाते हैं।
Ajaivik Ghatak - Abiotic Components

पर्यावरण के संघटक: पर्यावरण अनेक तत्त्वों का समूह है तथा प्रत्येक तत्त्व का इसमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्राकृतिक पर्यावरण के तत्त्व ही पारिस्थितिकी के भी तत्त्व हैं, क्योंकि पारिस्थितिकी का एक मूल घटक पर्यावरण है। सामान्य स्तर पर पर्यावरण के तत्त्वों को जैविक एवं अजैविक दो समूहों में वर्गीकृत किया जाता है।

अजैविक घटक

अजैविक घटक (Ajaivik Ghatak) किसी पारिस्थितिक तन्त्र में पाए जाने वाले सभी निर्जीव पदार्थ उसके अजैविक घटक कहलाते हैं। पर्यावरण के अजैविक घटकों में प्रकाश, वर्षण, तापमान, आर्द्रता एवं जल, अक्षांश, ऊँचाई, उच्चावच आदि शामिल होते है।

पर्यावरण के प्रमुख अजैविक घटक इस प्रकार हैं:-

  • प्रकाश (Light) हरे पौधों के लिए प्रकाश आवश्यक है, जिसके द्वारा वे प्रकाश संश्लेषण करते हैं। सभी प्राणी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में हरे पौधों द्वारा निर्मित भोजन पदार्थ पर ही निर्भर होते हैं। सभी जीवों के लिए सूर्य से आने वाला प्रकाश (सौर ऊर्जा) ही ऊर्जा का अन्तिम स्रोत है।
  • वर्षण (Precipitation) कोहरा, वर्षा, हिमपात अथवा ओलावृष्टि, का एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अजैविक कारक है। अधिकांश जीव सीधे अथवा परोक्ष रूप में किसी-न-किसी प्रकार से वर्षण पर निर्भर होते हैं, जो अधोभमि से होता है। वर्षण की मात्रा अलग-अलग होती है, जो इस प्रकार निर्भर है कि आप पृथ्वी पर कहाँ हैं।
  • तापमान (Temperature) यह पर्यावरण का महत्त्वपूर्ण घटक है, जो जीवों की उत्तर जीविता (Survival) को वृहद रूप से प्रभावित करता है। जीव अपनी वृद्धि हेतु एक निश्चित सीमा तक के तापमान को ही बर्दाश्त कर सकते हैं। उस सीमा से कम या अधिक तापमान की स्थिति में जीवों की वृद्धि रूक जाती है।
  • आर्द्रता एवं जल (Humidity and Water) अनेक पौधों तथा प्राणियों के लिए वाय में नमी का होना अति आवश्यक है, जिससे वे सही कार्य कर सकें। कुछ प्राणी केवल रात में ही अधिक सक्रिय होते हैं, जब आर्द्रता अधिक होती है। जलीय आवास पर, रसायन तथा गैस की मात्रा में होने वाले परिवर्तनों का तथा गहराई में अन्तर आने का प्रभाव पड़ता है।
  • अक्षांश (Latitude) जैसे-जैसे हम विषुवत् रेखा से उत्तर या दक्षिण की ओर बढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे सूर्य का कोण भी सामान्यत: छोटा होता जाता है, जिससे औसत तापमान गिरता जाता है।
  • ऊँचाई (Altitude) विभिन्न ऊँचाइयों पर वर्षण तथा तापमान दोनों में भिन्नता पाई जाती है। वर्षण आमतौर से ऊँचाई के साथ बढ़ता जाता है, लेकिन चरम ऊचाइया पर यह कम हो सकता है।
  • उच्चावच (Relief) भू-आकार या उच्चावच पर्यावरण का एक अति महत्त्वपर्ण तत्त्व है। सम्पूर्ण पृथ्वी का धरातल या उच्चावच विविधता से युक्त है। यह विविधता महाद्वीपीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक देखी जा सकती है। सामान्यतः उच्चावच के तीन स्वरूप- पर्वत, पठार एवं मैदान हैं।
पर्वत पर एवं मैदान में भी विस्तार, ऊंचाई, संरचना आदि की क्षेत्रीय विविधता होती है तथा अपरदन एवं अपक्षय क्रियाओं से अनेक भू-रूपों या स्थलाकृतियों का जन्म हो जाता है; जैसे-कहीं मरुस्थलीय स्थलाकृति है, तो कहीं चूना प्रदेश की और यदि एक और हिमानीकृत है, तो दूसरी ओर नदियों द्वारा निर्मित मैदानी डेल्टाई प्रदेश।

जैविक घटक

पर्यावरण के जैविक घटकों के अंतर्गत पौधों, प्राणियों (मानव, जंतु, परजीवी, सूक्ष्मजीव आदि) एवं अवघटकों (Decomposer) को शामिल किया जाता है। पारितंत्र के जैविकीय घटक अजैविक पृष्ठभूमि में परस्पर क्रिया करते हैं और इनमें प्राथमिक उत्पादक (स्वपोषी) एवं उपभोक्ता (परपोषी) आते हैं।

1. प्राथमिक उत्पादक (Primary Producers)

प्राथमिक उत्पादक जीव, आधारभूत रूप में हरे पौधे, कुछ खास जीवाणु एवं शैवाल (Algae), जो सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में सरल अजैविक पदार्थों से अपना भोजन स्वयं बना सकते हैं। वे स्वपोषी (Autotroph) अथवा प्राथमिक उत्पादक (Primary Producers) कहलाते हैं।

2. उपभोक्ता (Consumers)

उपभोक्ता वे जीव जो स्वयं अपना भोजन नहीं बना सकते एवं अन्य जीवों से अपना भोजन प्राप्त करते हैं, उन्हें परपोषी (Heterotrophs) अथवा उपभोक्ता (Consumers) कहते हैं। इनके पुनः तीन उपवर्ग होते हैं
  1. प्राथमिक उपभोक्ता - ये शाकाहारी (Herbivores) जन्तु होते हैं।
  2. द्वितीयक उपभोक्ता - ये मांसाहारी (Carnivores) जन्तु होते हैं।
  3. तृतीयक उपभोक्ता या सर्वाहारी (Omnivores) - इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से मनुष्य आता है, क्योंकि यह शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों को खाता है।

वियोजक या अपघटक (Decomposers)

वियोजक/अपघटक (Decomposers) ये सक्ष्मजीव होते हैं, जो मृत पौधों जन्तुओं तथा जैविक पदार्थों को वियोजित (सड़ाना-गलाना) करते हैं। इस क्रिया के दौरान ये अपना भोजन भी निर्मित करते हैं तथा जटिल कार्बनिक (जैविक) पदाथा का एक-दूसर से पृथक कर उन्हें सामान्य बनाते हैं जिनका स्वपोषित, प्राथमिक उत्पादक हरे पौधे पनः उपयोग करते हैं। इनमें से अधिकांश जीव सुक्ष्म बैक्टीरिया तथा कवक (Fungi) के रूप में मृदा में रहते हैं।

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