श्रीराम शर्मा - जीवन परिचय, रचनाएँ और भाषा शैली स्मृति

श्रीराम शर्मा (Shriram Sharma) का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, कवि परिचय एवं भाषा शैली और उनकी प्रमुख रचनाएँ एवं कृतियाँ। श्रीराम शर्मा का जीवन परिचय एवं साहित्यिक परिचय नीचे दिया गया है।
Shriram Sharma

श्रीराम शर्मा का जीवन परिचय

श्रीराम शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी में 23 मार्च, सन् 1892 को हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। श्रीशर्मा जी, शिकार साहित्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध लेखक थे। वास्तव में उनका लेखन इस दिशा में किया गया सर्वप्रथम, किन्तु सफल प्रयास है।

साहित्यिक परिचय

पत्रकारिता के क्षेत्र में शर्मा जी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने 'विशाल भारत' का कुशलतापूर्वक सम्पादन किया। साथ ही उन्होंने शिकार साहित्य, संस्मरण और जीवनी-लेखन की विधाओं में उल्लेखनीय कार्य किया।

'सन् बयालीस के संस्मरण' और 'सेवाग्राम की डायरी' आत्मकथा की शैली में लिखी हुई उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भाग लेते रहने के कारण इन कृतियों में तत्कालीन झलकियाँ अनायास आ गयी हैं। शिकार साहित्य से सम्बन्धित लेखों में घटना-विस्तार के साथ-साथ पशुओं के मनोविज्ञान का सम्यक् परिचय देते हुए इन्होंने उन्हें पर्याप्त रोचक बनाने में सफलता प्राप्त की है। उन्होंने ज्ञानवर्धक एवं विचारोत्तेजक लेख भी लिखे हैं, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं।

लम्बी बीमारी के बाद सन् 1967 ई० में उनका देहान्त हो गया।

रचनाएँ

शर्मा जी की शिकार-सम्बन्धी प्रकाशित रचनाओं में 'शिकार', 'प्राणों का सौदा', 'बोलती प्रतिमा', 'जंगल के जीव' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। शिकार की प्रायः सभी कहानियाँ रोमांचक एवं रोचक हैं।

भाषा

शर्मा जी की भाषा सहज, सरल प्रवाहपूर्ण तथा प्रभावपूर्ण तथा प्रभावशाली है। भाषा की दृष्टि से उन्हें प्रेमचन्द का निकटवर्ती माना जा सकता है। व्यावहारिकता उनकी भाषा का विशेष गुण है। उसमें उर्दू के प्रचलित शब्दों को अपनाया गया है। मुहावरों का भी प्रयोग किया गया है, जिससे भाषा में सजीवता आ गई है। वाक्य प्रायः छोटे-छोटे हैं। चित्रात्मकता का गुण भी इनकी भाषा में विद्यमान है।

शैली

शर्मा जी की कृतियों में निम्नलिखित शैलियों के दर्शन होते हैं-
  1. वर्णनात्मक शैली
  2. आत्मकथात्मकता शैली
  3. विवेचनात्मक शैली

प्रस्तुत लेख उनकी 'शिकार' पुस्तक से लिया गया है। इसमें लेखक ने बचपन की एक रोमांचकारी घटना का वर्णन किया है। वर्णन इतना सजीव है कि पाठक का कुतूहल आद्यन्त बना रहता है। बाल-प्रकृति और बाल-सुलभ चेष्टाओं का चित्रण विशेष रूप से दृष्टव्य है। भाषा की गतिशीलता से वे पाठक का ध्यान बरबस आकर्षित कर लेते हैं।

स्मृति

सन् 1908 ई० की बात है। दिसम्बर का आखीर या जनवरी का प्रारम्भ होगा। चिल्ला जाड़ा पड़ रहा था। दो-चार दिन पूर्व कुछ बूंदा-बाँदी हो गयी थी, इसलिए शीत की भयंकरता और भी बढ़ गयी थी। सायंकाल के साढ़े तीन या चार बजे होंगे। कई साथियों के साथ मैं झरबेरी के बेर तोड़-तोड़ कर खा रहा था कि गाँव के पास से एक आदमी ने जोर से पुकारा कि तुम्हारे भाई बुला रहे हैं, शीघ्र ही घर लौट आओ। मैं घर को चलने लगा। साथ में छोटा भाई भी था। भाई साहब की मार का डर था, इसलिए सहमा हुआ चला जाता था। समझ में नहीं आता था कि कौनसा कसूर बन पड़ा। डरते-डरते घर में घुसा। आशंका थी कि बेर खाने के अपराध में ही तो पेशी न हो। पर आँगन में भाई साहब को पत्र लिखते पाया। अब पिटने का भ्रम दूर हुआ। हमें देखकर भाई साहब ने कहा-'इन पत्रों को ले जाकर मक्खनपुर डाकखाने में डाल आओ। तेजी से जाना, जिससे शाम की डाक में ही चिट्ठियाँ निकल जाएँ। ये बड़ी जरूरी हैं।

जाड़े के दिन थे ही, जिस पर हवा के प्रकोप से कँपकँपी लग रही थी। हवा मज्जा तक ठिठुरा रही थी, इसलिए हमने कानों को धोती से बाँधा। माँ ने भुंजाने के लिए थोड़े चने एक धोती में बाँध दिए। हम दोनों भाई अपना-अपना डंडा लेकर घर से निकल पड़े। उस समय उस बबूल के डंडे से जितना मोह था, उतना इस उमर में रायफल से नहीं। मेरा डंडा अनेक साँपों के लिए नारायण-वाहन हो चुका था। मक्खनपुर के स्कूल और गांव के बीच पड़ने वाले आम के पेड़ों से प्रतिवर्ष उससे आम झूरे जाते थे। इस कारण वह मूक डंडा सजीव-सा प्रतीत होता था। प्रसन्नवदन हम दोनों मक्खनपुर की ओर तेजी से बढ़ने लगे। चिट्ठियों को मैंने टोपी में रख लिया, क्योंकि कुर्ते में जेबें न थीं।

हम दोनों उछलते-कूदते, एक ही साँस में गाँव से चार फाग दूर उस कुएँ के पास आ गए, जिसमें एक अति भयंकर काला साँप पड़ा हुआ था। कुआँ कच्चा था और चौबीस हाथ (36 फुट) गहरा था। उसमें पानी न था। उसमें न जाने साँप कैसे गिर गया था? कारण कुछ भी हो, हमारा उसके कुएँ में होने का ज्ञान केवल दो महीने का था। बच्चे नटखट होते ही हैं। मक्खनपुर पढ़ने जाने वाली हमारी टोली पूरी वानर-टोली थी। एक दिन हम लोग स्कूल से लौट रहे थे कि हमको कुएँ में उझकने की सूझी। सबसे पहले उझकने वाला मैं ही था। कुएँ में झाँककर एक ढेला फेंका कि उसकी आवाज कैसी होती है। उसके सुनने के बाद अपनी बोली की प्रतिध्वनि सुनने की इच्छा थी, पर कुएँ में ज्यों ही ढेला गिरा त्यों ही एक फुसकार सुनायी पड़ी। कुएँ के किनारे खड़े हुए हम सब बालक पहले तो फुसकार से चकित हो गए जैसे किलोलें करता हुआ म्रगसमूह अति समीप के कुत्ते की भौंक से चकित हो जाता है। उसके उपरांत सभी ने उझक-उझक कर एक-एक ढेला फेंका, और कुएँ से आने वाली क्रोधपूर्ण फुसकार पर कहकहे लगाए।

गाँव से मक्खनपुर जाते और मक्खनपुर से लौटते समय प्रायः प्रतिदिन ही कुएँ में ढेले डाले जाते थे। मैं तो आगे भागकर आ जाता था और टोपी को एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ से ढेला फेंकता था। यह रोजाना की आदत हो गयी थी। साँप से फुसकार करवा लेना मैं उस समय बड़ा काम समझता था। इसलिए जैसे ही हम दोनों उस कुएँ की ओर से निकले, कुएँ में ढेला फेंककर फुसकार सुनने की प्रवृत्ति जाग्रत हो गयी। मैं कुएँ की ओर बढ़ा। छोटा भाई मेरे पीछे हो लिया जैसे बड़े म्रगशावक के पीछे छोटा म्रगशावक हो लेता है। कुएँ के किनारे से एक ढेला उठाया और उझककर एक हाथ से टोपी उतारते हुए साँप पर ढेला गिरा दिया, पर मुझ पर तो बिजली-सी गिर पड़ी। साँप ने फुसकार मारी या नहीं-ढेला उसे लगा या नहीं, यह बात अब तक स्मरण नहीं। टोपी के हाथ में लेते ही तीनों चिट्ठियाँ चक्कर काटती हुई कुँए में गिर रही थीं। अकस्मात् जैसे घास चरते हुए हिरनी की आत्मा गोली से हत होने पर निकल जाती है और वह तड़पता रह जाता है, उसी भाँति वे चिट्ठियाँ क्या टोपी से निकल गयीं, मेरी तो जान निकल गयी। उनके गिरते ही मैंने उनको पकड़ने के लिए एक झपट्टा भी मारा, ठीक वैसे जैसे घायल शेर शिकारी को पेड़ पर चढ़ते देख उस पर हमला करता है। पर वे तो पहुँच से बाहर हो चुकी थीं। उनको पकड़ने की घबराहट में मैं स्वयं झटके के कारण कुएँ में गिर गया होता।

कुएँ की पाट पर बैठे हम रो रहे थे-छोटा भाई ढाढ़े मारकर और मैं चुपचाप आँखें डबडबाकर। पतीली में उफान आने से ढकना ऊपर उठ जाता है और पानी बाहर टपक जाता है। निराशा, पिटने के भय और उद्वेग से रोने का उफान आता था। पलकों के ढकने भीतरी भावों को रोकने का प्रयत्न करते थे, पर कपोलों पर आँसू ढलक ही जाते थे। माँ की गोद की याद आती थी। जी चाहता था कि माँ आकर छाती से लगा ले और लाड़-प्यार करके कह दे कि कोई बात नहीं, चिट्ठियाँ फिर लिख ली जाएँगी। तबीयत करती थी। कि कुएँ में बहुत-सी मिट्टी डाल दी जाए और घर जाकर कह दिया जाएं कि चिट्ठी डाल आए, पर उस समय झूठ बोलना मैं जानता ही न था। घर लौटकर सच बोलने से रुई की भाँति धुनाई होती। मार के ख्याल से शरीर ही नहीं, मन भी काँप जाता था। सच बोलकर पिटने के भावी भय और झूठ बोलकर चिट्ठियों के न पहुँचने की जिम्मेदारी के बोझ से दबा मैं बैठा सिसक रहा था। इसी सोच-विचार में पन्द्रह मिनट होने आए। देर हो रही थी और उधर दिन का बुढ़ापा बढ़ता जाता था। कहीं भाग जाने की तबीयत करती थी, पर पिटने का भय और जिम्मेदारी की दुधारी तलवार कलेजे पर फिर रही थी।

दृढ़ संकल्प से दुविधा की बेड़ियाँ कट जाती हैं। मेरी दुविधा भी दूर हो गयी। कुएँ में घुसकर चिट्ठियो को निकालने का निश्चय किया। कितना भयंकर निर्णय था। पर जो मरने को तैयार हो, उसे क्या? मूर्खता अथवा बुद्धिमत्ता से किसी काम को करने के लिए कोई मौत का मार्ग ही स्वीकार कर ले और वह भी जानः बूझकर, तो फिर वह अकेला संसार से भिड़ने को तैयार हो जाता है। और फल ? उसे फल की क्या चिन्ता फल तो किसी दूसरी शक्ति पर निर्भर है। उस समय चिट्ठियाँ निकालने के लिए मैं विषधर से भिड़ने को तैयार हो गया। पासा फेंक दिया था। मौत का आलिंगन हो अथवा साँप से बचकर दूसरा जन्म, इसकी कोई चिन्ता न थी। पर विश्वास यह था कि डंडे से साँप को पहले मार दूंगा, तब फिर चिट्ठियाँ उठा लूंगा। बस, इसी दृढ़ विश्वास के बूते पर मैंने कुएँ में घुसने की ठानी।

- छोटा भाई रोता था और उसके रोने का तात्पर्य था कि मेरी मौत मुझे नीचे बुला रही है, यद्यपि वह शब्दों से न कहता था। वास्तव में मौत सजीव और नग्न रूप में कुएँ में बैठी थी, पर उस नग्न मौत से मुठभेड़ के लिए मुझे भी नग्न होना पड़ा। छोटा भाई भी नंगा हुआ। एक धोती मेरी, एक छोटे भाई की, एक चने वाली, दो कानों से बँधी हुई धोतियाँ-पाँच धोतियाँ और कुछ रस्सी मिलाकर कुएँ की गहराई के लिए काफी हुई। हम लोगों ने धोतियाँ एक-दूसरी से बाँधी और खूब खींच-खींचकर आजमा लिया कि गाँठे कड़ी हैं या नहीं। अपनी ओर से कोई धोखे का काम नहीं रखा। धोती के एक सिरे पर डंडा बाँधा और उसे कुएँ में डाल दिया। दूसरे सिरे को डेंग (वह लकड़ी जिस पर चरस से पुर टिकता है) के चारों ओर एक चक्कर देकर और एक गाँठ लगाकर छोटे भाई को दे दिया। छोटा भाई केवल आठ वर्ष का था, इसलिए धोती को डेंग से कड़ी करके बाँध दिया और तब उसे खूब मजबूती से पकड़ने के लिए कहा। मैं कुएँ में धोती के सहारे घुसने लगा। छोटा भाई फिर रोने लगा। मैंने उसे आश्वासन दिलाया कि मैं कुएँ के नीचे पहुँचते ही साँप को मार दूंगा, और मेरा विश्वास भी ऐसा ही था। कारण यह था कि इससे पहले मैंने अनेक साँप मारे थे। इसलिए कुएँ में घुसते समय मुझे साँप का तनिक भी भय न था। उसको मारना मैं बाएँ हाथ का खेल समझता था। कुएँ के धरातल से जब चार-पाँच गज रहा हो, तब ध्यान से नीचे को देखा। अकल चकरा गयी। साँप फन फैलाए धरातल से एक हाथ ऊपर उठा हुआ लहरा रहा था। पूँछ और पूँछ के समीप का भाग पृथ्वी पर था, आधा अग्रभाग ऊपर उठा हुआ मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। नीचे डंडा बँधा था, मेरे उतने की गति से जो इधर-उधर हिलता था। उसी के कारण शायद मुझे उतरते देख साँप घातक चोट के आसन पर बैठा था। सपेरा जैसे बीन बजाकर साँप को खिलाता है और साँप क्रोधित हो फन फैलाकर खड़ा होता तथा पुंकार मारकर चोट करता है, ठीक उसी प्रकार साँप तैयार था। उसका प्रतिद्वंद्वी-मैं-उससे कुछ ही ऊपर धोती पकड़े लटक रहा था। धोती डेंग से बँधी होने के कारण कुएँ से बीचोंबीच लटक रही थी और मुझे कुएँ के धरातल की परिधि के बीचोंबीच उतरना था। इसके माने थे साँप से डेढ़-दो फुट-गज की नहीं-की दूरी पर पैर रखना; और इतनी दूरी पर साँप पैर रखते ही चोट करता। स्मरण रहे, कच्चे कुएँ का व्यास बहुत कम होता है। नीचे तो वह डेढ़-गज से अधिक होता ही नहीं। ऐसी दशा में कुएँ में मैं साँप से अधिक-से-अधिक चार फुट की दूरी पर रह सकता था, वह भी उस दशा में जब साँप मुझसे दूर रहने का प्रयत्न करता, पर उतरना तो था कुएँ के बीच में क्योंकि मेरा साधन बीचोंबीच लटक रहा था। ऊपर से लटककर तो साँप मारा नहीं जा सकता था। उतरना तो था ही। थकावट से ऊपर चढ़ भी नहीं सकता । था। अब तक अपने प्रतिद्वंद्वी को पीठ दिखाने का निश्चय नहीं किया था। यदि ऐसा करता भी तो कुएं के धरातल पर उतरे बिना क्या मैं ऊपर चढ़ सकता था? धीरे-धीरे उतरने लगा। एक-एक इंच ज्यों-ज्यों मैं नीचे उतरता जाता था, त्यों-त्यों मेरी एकाग्रचित्तता बढ़ती जाती थी। मुझे एक सूझ सूझी। दोनों हाथों से धोती पकड़े हुए मैंने अपने पैर कुएँ की बगल में लगा दिए। दीवार से पैर लगाते ही कुछ मिट्टी नीचे गिरी और सांप ने फूं करके उस पर मुँह मारा। मेरे पैर भी दीवार से हट गए, और मेरी टाँगें कमर से समकोण बनाती हुई लटकी रहीं, पर इससे साँप से दूरी और कुएँ की परिधि पर उतरने का ढंग मालूम हो गया।। तनिक झूलकर मैंने अपने पैर कुएँ की बगल में सटाए, और कुछ धक्के के साथ अपने प्रतिद्वंद्वी के सम्मुख कुएँ - की दूसरी ओर डेढ़ गज पर कुएँ से धरातल पर खड़ा हो गया। आँखें चार हुईं। शायद एक-दूसरे ने पहचाना। साँप को चक्षुःश्रवा कहते हैं। मैं स्वयं चक्षुःश्रवा हो रहा था। अन्य इन्द्रियों ने मानो सहानुभूति से अपनी = शक्ति आँखों को दे दी हो। साँप के फन की ओर मेरी आखें लगी हुई थीं कि वह कब किस ओर को = आक्रमण करता है, साँप ने मोहनी-सी डाल दी थी। शायद वह मेरे आक्रमण की प्रतीक्षा में था, पर जिस विचार और आशा को लेकर मैंने कुएं में घुसने की ठानी थी, वह तो आकाश-कुसुम था। मनुष्य का अनुमान - और भावी योजनाएँ कभी-कभी कितनी मिथ्या और उल्टी निकलती हैं। मुझे साँप का साक्षात् होते ही अपनी - योजना और आशा की असंभवता प्रतीत हो गयी। डंडा चलाने के लिए स्थान ही न था। लाठी या डंडा - चलाने के लिए काफी स्थान चाहिए, जिसमें वे घुमाए जा सकें। साँप को डंडे से दबाया जा सकता था, पर ऐसा करना मानो तोप के मुहरे पर खड़ा होना था। यदि फन या उसके समीप का भाग न दबा, तो फिर - वह पलटकर जरूर काटता और कन के पास दबाने की कोई संभावना भी होती, तो फिर उसके पास पड़ी हुई दो चिटिठयों को कैसे उठाता? दो चिट्ठियाँ उसके पास उससे सटी हुई पड़ी थीं और एक मेरी ओर थी। मैं तो चिठ्ठियाँ लेने ही उतरा था। हम दोनों अपने पैंतरों पर डटे थे। उस आसन पर खड़े-खड़े मुझे चार- पाँच मिनट हो गए। दोनों ओर मोरचे पड़े हुए थे, पर मेरा मोरचा कमजोर था। कहीं साँप मुझ पर झपट पड़ता तो मैं-यदि बहुत करता तो उसे पकड़कर कुचलकर मार देता, पर वह तो अचूक तरल विष मेरे शरीर में पहँचा ही देता और अपने साथ-साथ मुझे भी ले जाता। अब तक साँप ने वार न किया था, इसलिए मैंने भी उसे डंडे से दबाने का खयाल छोड़ दिया। ऐसा करना उचित भी न था। अब प्रश्न था कि चिट्ठियाँ कैसे उठायी जाएँ। बस, एक सूरत थी। डंडे से साँप की ओर से चिटियों को सरकाया जाए। यदि सॉप टूट पड़ा तो कोई चारा न था। कुर्ता था, और कोई कपड़ा न था, जिसे साँप के मुँह की ओर करके उसके फन को पकड़ लूँ। मारना या बिल्कुल छेड़खानी न करना-ये दो मार्ग थे। सो पहला मेरी शक्ति के बाहर था। बाध्य होकर दूसरे मार्ग का अवलम्बन करना पड़ा।

डंडे को लेकर ज्योंही मैंने साँप की दायीं ओर पड़ी हुई चिट्ठी की ओर बढ़ाया कि साँप का फन पीछे की ओर हुआ। धीरे-धीरे डंडा चिट्ठी की ओर बढ़ा और ज्यों ही चिट्ठी के पास पहुंचा कि फुकार के साथ काली बिजली तड़पी और डंडे पर गिरी। हृदय में कंप हुआ; और हाथों ने आज्ञा न मानी। डंडा छूट पड़ा। मैं तो न मालूम कितना ऊपर उछल गया। जानबूझ कर नहीं, यों ही बिदककर । उछलकर जो खड़ा हुआ, तो देखा डंडे के सिर पर तीन-चार स्थानों पर पीब-सा कुछ लगा हुआ है। वह विष था। साँप ने मानो अपनी शक्ति का सर्टिफिकेट सामने रख दिया था, पर मैं तो उसकी योग्यता का पहले ही से कायल था। उस सर्टिफिकेट की जरूरत न थी। साँप ने लगातार -' करके डंडे पर तीन-चार चोटें कीं। वह डंडा पहली बार ही इस भाँति अपमानित हुआ था, या शायद वह साँप का उपहास कर रहा था।

उधर ऊपर, फूं-' और मेरे उछलने और फिर वही धमाके से खड़े होने से छोटे भाई ने समझा कि मेरा कार्य समाप्त हो गया और बंधुत्व का नाता पूँ-' और धमाके में टूट गया। उसने खयाल किया कि साँप के काटने से मैं गिर गया। मेरे कष्ट और विरह के खयाल से उसके कोमल हृदय को धक्का लगा। भ्रातृ-स्नेह के ताने-बाने को चोट लगी। उसकी चीख निकल गयी।।

छोटे भाई की आशंका बेजा न थी, पर उस फूं और धमाके से मेरा साहस कुछ बढ़ गया। दुबारा फिर उसी प्रकार लिफाफे को उठाने की चेष्टा की। अब की बार साँप ने वार भी किया और डंडे से चिपट भी गया। डंडा हाथ से छूटा तो नहीं, पर झिझक, सहम अथवा आतंक से अपनी ओर खिंच गया और गुंजल्क मारता हुआ साँप का पिछला भाग मेरे हाथों से छू गया। उफ कितना ठंडा था! डंडे को मैंने एक ओर पटक दिया। यदि कहीं उसका दूसरा वार पहले होता, तो उछलकर मैं साँप पर गिरता और न बचता; लेकिन जब जीवन होता है, तब हजारों ढंग बचने के निकल आते हैं। वह दैवी कृपा थी। डंडे के मेरी ओर खिंच आने से मेरे और साँप के आसन बदल गए। मैंने तुरन्त ही लिफाफे और पोस्टकार्ड चुन लिए। चिट्ठियों को धोती के छोर से बाँध दिया और छोटे भाई ने उन्हें ऊपर खींच लिया।

डंडे को साँप के पास से उठाने में भी बड़ी कठिनाई पड़ी। साँप उससे खुलकर उस पर धरना देकर बैठा था। जीत तो मेरी हो चुकी थी पर अपना निशान गँवा चुका था। आगे हाथ बढ़ाता तो साँप हाथ पर वार करता, इसलिए कुएँ की बगल से एक मुट्ठी मिट्टी लेकर मैंने उसकी दायीं ओर फेंकी कि वह उस पर झपटा, और मैंने दूसरे हाथ से उसकी बायीं ओर से डंडा खींच लिया, पर बात-की बात में उसने दूसरी ओर भी वार किया। यदि बीच में डंडा न होता, तो पैर में उसके दाँत गड़ गए होते।

अब ऊपर चढ़ना कोई कठिन काम न था। केवल हाथों के सहारे, पैरों को बिना कहीं लगाए हुए 36 फुट। ऊपर चढ़ना मुझसे नहीं हो सकता। 15-20 फुट बिना पैरों के सहारे, केवल हाथों के बल चढ़ने की हिम्मत रखता है; कम ही, अधिक नहीं। पर उस ग्यारह वर्ष की अवस्था में मैं 36 फुट चढ़ा। बाहें भर गयी थीं।

छाती फूल गयी थी। धौंकनी चल रही थी। पर एक-एक इंच सरक-सरककर अपनी भुजाओं के बल मैं ऊपर य चढ़ आया। यदि हाथ छूट जाते तो क्या होता, इसका अनुमान करना कठिन है। ऊपर आकर, बेहाल होकर, थोड़ी देर तक पड़ा रहा। देह को झार-झूरकर धोती-कुर्ता पहना। फिर किशनपुर के लड़के को, जिसने ऊपर - चढ़ने की चेष्टा को देखा था, ताकीद करके कि वह कुएँ वाली घटना किसी से न कहे, हम लोग आगे बढ़े।

सन् 1915 ई० में मैट्रीक्युलेशन पास करने के उपरान्त यह घटना मैंने माँ को सुनायी। सजल नेत्रों से माँ ने मुझे गोद में ऐसे बैठा लिया जैसे चिड़िया अपने बच्चों को डैने के नीचे छिपा लेती है।

कितने अच्छे थे वे दिन! उस समय रायफल न थी, डंडा था और डंडे का शिकार कम से कम उस साँप का शिकार-रायफल के शिकार से कम रोचक और भयानक न था।

- श्रीराम शर्मा

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