प्रौढ़ शिक्षा - प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता, उपयोगिता और महत्व

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'प्रौढ़ शिक्षा' से मिलते जुलते शीर्षक इस प्रकार हैं-
  • प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता
  • प्रौढ़ शिक्षा : समय की जरूरत
  • प्रौढ़ शिक्षा की उपयोगिता
  • प्रौढ़ शिक्षा का महत्व
  • साक्षरता अभियान
PRAUD SHIKSHA

निबंध की रूपरेखा

  1. प्रस्तावना
  2. भारत में साक्षरता
  3. प्रौढ़ शिक्षा का अर्थ
  4. प्रौढ़ शिक्षा का उद्देश्य
  5. प्रौढ़ शिक्षा की तकनीक
  6. अनुदेशकों की भूमिका
  7. दूरदर्शन की भूमिका
  8. प्रौढ़ शिक्षा : राष्ट्रीय कर्तव्य
  9. प्रौढ़ शिक्षा : जन आन्दोलन
  10. उपसंहार

प्रौढ़ शिक्षा

प्रस्तावना

निरक्षरता किसी भी राष्ट्र का सबसे बड़ा अभिशाप है। शिक्षा केवल रोजगार के साधन ही सुलभ नहीं कराती अपितु व्यक्ति के बहुमखी विकास में भी सहायक होती है। शिक्षित व्यक्ति का मानसिक विकास तो होता ही है, साथ ही उसका सामाजिक आध्यात्मिक, नैतिक विकास भी होता है।

व्यक्तित्व को सम्पूर्णता प्रदान करने में शिक्षा की भूमिका एवं महत्व से सभी परिचित हैं। शिक्षित व्यक्ति का सोचने-विचारने का तरीका निश्चित रूप से बेहतर होता है और वह समाज एवं देश के प्रति अपने उत्तरदायित्व को अधिक तीव्रता से अनुभव करता है।

व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा परम आवश्यक है। यदि अतिशयोक्ति न मानी जाए तो कहा जा सकता है कि अशिक्षित व्यक्ति तो पशु तुल्य है। संस्कृत में एक लोकोक्ति है-"साहित्य, संस्कृति, कलाविहीन व्यक्ति सींग और पूँछ से रहित पशु है।"

भारत में साक्षरता

भारतवर्ष में निरक्षरता का प्रतिशत चिन्ताजनक स्तर पर है। स्वतन्त्रता के 70वर्षों के उपरान्त भी हम अल्प मात्रा में ही लोगों को शिक्षा दे पाए हैं। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में साक्षरता का प्रतिशत मात्र 65.38 है। निरक्षर लोगों में भी अधिकांश 15 से 35 वर्ष की आयु वाले लोग हैं। मोटे तौर पर इस वर्ग के अशिक्षित लोगों की संख्या 10 करोड़ से अधिक है।

प्रौढ़ शिक्षा का अर्थ

प्रौढ़ शिक्षा का अभिप्राय 15 से 35 वर्ष की आयु वाले इन्हीं लोगों को साक्षर बनाना है। उन्हें इतना शिक्षित करना है कि वे लिख-पढ़ सकें, हस्ताक्षर कर लें और सामान्य हिसाब-किताब कर लें। किसी विशेष विषय में उन्हें निष्णात कर पाना न तो सम्भव है और न ही कोई उपयोगिता है, अतः प्रौढ़ शिक्षा में साक्षरता पर ही विशेष बल दिया जाता है।

प्रौढ़ शिक्षा का उद्देश्य

प्रौढ़ शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य 15 से 35 आयु वर्ग के पुरुषों एवं महिलाओं में चेतना एवं जागति उत्पन्न करना है जिससे वे शिक्षा के महत्व को समझ सकें और उनका शोषण बन्द हो जाए। अशिक्षितों का शोषण अभी भी ग्रामीण सूदखोर एवं महाजन कर रहे हैं।

उन्हें न तो सरकारी कानूनों की जानकारी है और न ही इस बात का पता है कि सरकार ने उनके कल्याण के लिए क्या-क्या योजनाएं चला रखी हैं। ग्रामीण बैंकों से किस प्रकार कर्ज मिलता है, इस सम्बन्ध में भी वे अनभिज्ञ हैं।

प्रौढ़ शिक्षा के लाभार्थियों को केवल अक्षर ज्ञान करा देना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उन्हें जन कल्याणकारी कार्यक्रमों यथा- परिवार नियोजन, वृक्षारोपण, पर्यावरण प्रदूषण, स्वास्थ्य एवं सफाई, कृषि के उन्नतिशील बीजों, उर्वरकों, सहकारी समितियों, ग्रामीण बैंकों आदि के बारे में भी जानकारी कराई जाती है, जिससे वे व्यावहारिक लाभ उठा सकें।

प्रौढ़ शिक्षा के द्वारा समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को लाभान्वित करके उसकी कार्यक्षमता में वृद्धि करके उसे देश का उपयोगी नागरिक बनाया जा सकता है।

प्रौढ़ शिक्षा की तकनीक

प्रौढ शिक्षा की विधि औपचारिक शिक्षा से नितान्त भिन्न है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों पर लोग शिक्षा प्राप्त करने हेतु आएं और यह तभी सम्भव है जब उन्हें वहाँ उपयोगी बातें बताई जाएं जो उनके दैनिक जीवन स्तर को सुधार सकें, उनकी आमदनी बढ़ा सकें।

वहाँ मनोरंजन की व्यवस्था भी होनी चाहिए। गीत, भजन, नृत्य आदि के द्वारा लोगों को इन केन्द्रों की ओर आकृष्ट किया जाता है। वहाँ उन्हें अक्षर ज्ञान कराने के साथ-साथ कला-कौशल, कुटीर उद्योग आदि का भी प्रशिक्षण दिया जाए, जिससे वे अपनी आमदनी बढ़ा सकें।

अनुदेशकों की भूमिका

वस्तुतः प्रौढ़ शिक्षा में अनुदेशकों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। उन्हें गहन प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है तथा उनको दिया जाने वाला वेतन, भत्ता, मानदेय भी आकर्षक होना चाहिए।

शैक्षणिक प्रक्रिया को मनोरंजक एवं रुचिकर बनाने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ उपकरणों, चार्टों एवं चित्रों का भी उपयोग करना चाहिए।

प्रौढ़ शिक्षा में दूरदर्शन की भूमिका

आज दूरदर्शन का नेटवर्क लगभग सम्पूर्ण भारत में कार्य कर रहा है। इस प्रभावी जनसंचार माध्यम का उपयोग प्रौढ़ शिक्षा के लिए किया जाना चाहिए। दूरदर्शन पर प्रौढ़ शिक्षा के एक सफल धारावाहिक का प्रसारण किया जा चुका है जो पर्याप्त लोकप्रिय रहा है। मेमोरी कार्ड या पेन ड्राइव द्वारा भी विशिष्ट कार्यक्रम तैयार करवाकर दिखाए जा सकते हैं।

प्रौढ़ शिक्षा : राष्ट्रीय कर्तव्य

प्रौढ़ शिक्षा को राष्ट्रीय कर्तव्य मानकर प्रत्येक पढ़े-लिखे व्यक्ति को निरक्षर लोगों को साक्षर बनाने में व्यक्तिगत योगदान करना चाहिए। सरकार प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रम ज़ोर सोर से चला रही है। आठवीं योजना में भी इस मद पर व्यय हेतु पर्याप्त धनराशि की व्यवस्था की गई थी।

किन्तु इस कार्यक्रम को प्रभावी रूप से लागू किए जाने की आवश्यकता है। सच तो यह है कि बहुत से प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र केवल कागजों पर चलते हैं, इस हेतु प्राप्त धन का दुरुपयोग किया जाता है। कालेजो एवं विश्वविद्यालयों को इस दिशा में ठोस कदम उठाना चाहिए।

राष्ट्रीय सेवा योजना एवं एन. सी. सी. के द्वारा प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए तथा कानून बनाकर ऐसा प्रावधान कर देना चाहिए कि स्नातक की उपाधि तभी प्राप्त होगी जब प्रत्येक विद्यार्थी कम से कम पाँच व्यक्तियों को साक्षर कर देगा।

अवकाश प्राप्त राजकीय कर्मचारियों एवं शिक्षकों की सेवाएं भी सरकार को लेनी चाहिए। शिक्षित बेरोजगारों को प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम में अधिक से अधिक लगाया जाए और मानदेय के रूप में उन्हें बेरोजगारी भत्ता दिया जाए।

प्रौढ़ शिक्षा : एक जन आन्दोलन

प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम को हमें जन आन्दोलन के रूप में विकसित करना चाहिए तथा स्वयं सेवी संगठनों को भी इस दिशा में ठोस प्रयत्न करना चाहिए। यद्यपि सरकार द्वारा किए गए प्रयासों से साक्षरता का प्रतिशत बढ़ा है तथापि अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

श्रमिकों को साक्षर बनाने का उत्तरदायित्व उनके नियोजकों पर डाल देने का कानून सरकार को बनाना चाहिए। केवल आँकड़ों में नहीं अपितु वास्तविक स्तर पर इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए हमे प्रयास करना होगा तभी हम देश की समस्याओं से छुटकारा पा सकेंगे।

उपसंहार

भारत की विशाल जनसंख्या को देखते हुए यह आवश्यक है कि यहाँ शिक्षित व्यक्तियों को प्रौढ शिक्षा में सक्रिय योगदान करना चाहिए। निरक्षरा को प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों तक लाना और उन्हें अक्षर ज्ञान कराना साधारण काम नहीं है। इस क्षेत्र में कार्य करने वाले कार्यकर्ता इसे बता सकते हैं कि यह टेढ़ी खीर है।

किन्तु हमें धैर्यपूर्वक इसे एक जनआंदोलन के रूप में इसे विकसित करना है और यह तभी संभव है जब प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति इस कार्यक्रम को अपने जीवन का ध्येय बना ले। निरक्षर को अक्षर ज्ञान करना एक पुण्य कार्य भी है जो हमारे इहलोक और परलोक दोनों को सुधारती है।

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