काका कालेलकर (Kaka Kalelkar) - जीवन-परिचय, रचनाएँ और भाषा शैली

काका कालेलकर का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, कवि परिचय एवं भाषा शैली और उनकी प्रमुख रचनाएँ एवं कृतियाँ। काका कालेलकर का जीवन परिचय एवं साहित्यिक परिचय नीचे दिया गया है।
Kaka Kalelkar

काका कालेलकर का जीवन-परिचय

काका कालेलकर का जन्म सन् 1885 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। मातृभाषा मराठी के अलावा हिन्दी, गुजराती, बँगला, अंग्रेजी आदि भाषाओं पर इनका अच्छा अधिकार था। जिन राष्ट्रीय नेताओं तथा महापुरुषों ने राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार कार्य में विशेष दिलचस्पी ली, उनकी प्रथम पंक्ति में काका कालेलकर का नाम आता है। उन्होंने राष्ट्रभाषा के प्रचार को राष्ट्रीय कार्यक्रम के अन्तर्गत माना।

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के सन् 1938 के अधिवेशन में भाषण करते हुए काका कालेलकर ने कहा था- हमारा राष्ट्रभाषा प्रचार एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है। हिन्दी के अलावा गुजराती में भी उन्होंने स्तुत्य कार्य किया है। उन्हें महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकूर और टंडनजी के निकट-संपर्क में आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वे दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे। सन् 1969 में उन्हें पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया। 21 अगस्त, 1981 को उनका स्वर्गवास हो गया।

साहित्यिक परिचय

काका साहब उच्चकोटि के विचारक तथा विद्वान् थे। भाषा के प्रचारक होने के साथ-साथ उन्होंने हिन्दी और गुजराती में मौलिक रचनाएँ भी की। सरल और ओजस्वी भाषा में विचारात्मक निबन्ध के अतिरिक्त पर्याप्त यात्रा-साहित्य भी लिखा। इनकी भाषा-शैली अत्यधिक सजीव और प्रभावपूर्ण है। उनकी दृष्टि बड़ी पैनी है, इसलिए उनकी लेखनी से प्रायः ऐसे सजीव चित्र बन पड़ते हैं, जो मौलिक होने के साथ-साथ नित्य नवीन दृष्टिकोण प्रदान करते हैं।

कालेलकर का साहित्य निबन्ध, संस्मरण जीवनी, यात्रावृत्त के रूप में उपलब्ध होता है। अध्येता होने के कारण प्रायः उनकी रचनाओं में प्राचीन भारत की झलक मिलती है। अहिन्दी भाषी क्षेत्र के लेखकों में काका साहब मँजे हुए लेखक थे। किसी भी सुन्दर दृश्य का वर्णन अथवा जटिल समस्या का सुगम विश्लेषण इनके लिए आनन्द का विषय था।

रचनाएँ

मराठी-भाषी काका साहब ने अपनी अधिकतर रचनाएँ गुजराती में लिखी हैं। 'संस्मरण', 'यात्रा', 'सर्वोदय', 'हिमालय', 'प्रवास', 'लोकमाता', 'उस पार के पड़ोसी', 'जीवन-लीला', 'बापू की झाँकियाँ', 'जीवन का काव्य' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

भाषा

काका कालेलकर की भाषा सरल, सुबोध तथा प्रवाहपूर्ण है। उन्होंने व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया है, जिसमें उर्द के प्रचलित शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। यत्र-तत्र वाक्य- रचना के दोष भी मिलते हैं। मुहावरों के प्रयोग के कारण इनकी भाषा में सजीवता आ गई है।

शैली

काका कालेलकर की शैली के प्रमुख तीन रूप मिलते हैं-
  1. वर्णनात्मक शैली
  2. विवेचनात्मक शैली
  3. आत्मकथात्मक शैली

'निष्ठामूर्ति कस्तूरबा' में राष्ट्रमाता कस्तूरबा के जीवन की ऐसी अनेक झाँकियाँ दी गयी हैं, जो भारतीय नारी के गरिमामय रूप का सुन्दर चित्र प्रस्तुत करती हैं। इस पाठ में भारतीय संस्कृति के सफल अध्येता और राष्ट्रप्रेमी काका साहब की उपर्युक्त वर्णित अधिकांश साहित्यिक विशेषताओं के दर्शन भी होते हैं।

निष्ठामूर्ति कस्तूरबा

महात्मा गाँधी जैसे महान् पुरुष की सहधर्मचारिणी के तौर पर पूज्य कस्तूरबा के बारे में राष्ट्र को आदर मालूम होना स्वाभाविक है। राष्ट्र ने महात्माजी को 'बापूजी' के नाम से राष्ट्रपिता के स्थान पर कायम किया ही है। इसलिए कस्तूरबा भी 'बा' के एकाक्षरी नाम से राष्ट्रमाता बन सकी हैं।

किन्तु सिर्फ महात्माजी के साथ के सम्बन्ध के कारण ही नहीं, बल्कि अपने आंतरिक सद्गुणों और निष्ठा के कारण भी कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पायी हैं। चाहे दक्षिण अफ्रीका में हों या हिन्दुस्तान में, सरकार के खिलाफ लड़ाई के समय जब-जब चारित्र्य का तेज प्रकट करने का मौका आया, कस्तूरबा हमेशा इस दिव्य कसौटी से सफलतापूर्वक पार हुई हैं।

इससे भी विशेष बात यह है कि बड़ी तेजी से बदलते हुए आज के युग में भी आर्य सती स्त्री का जो आदर्श हिन्दुस्तान ने अपने हृदय में कायम रखा है, उस आदर्श की जीवित प्रतिमा के रूप में राष्ट्र पूज्य कस्तूरबा को पहचानता है। इस तरह की विविध लोकोत्तर योग्यता के कारण आज सारा राष्ट्र कस्तूरबा की पूजा करता है।

कस्तूरबा अनपढ़ थीं। हम यह भी कह सकते हैं कि उनका भाषा-ज्ञान सामान्य देहाती से अधिक नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में जाकर रहीं इसलिए, वह कुछ अंग्रेजी समझ सकती थीं और पच्चीस-तीस शब्द बोल भी लेती थीं। मिस्टर एण्डूज जैसे कोई विदेशी मेहमान घर पर आने पर उन शब्दों की पूँजी से वह अपना काम चला लेतीं। और कभी-कभी तो उनके उस संभाषण से विनोद भी पैदा हो जाता।

कस्तुरबा को गीता के ऊपर असाधारण श्रद्धा थी। पढ़ाने वाला कोई मिले तो वह भक्तिपूर्वक गीता पढने के लिए बैठ जातीं। किन्तु उनकी गाड़ी कभी भी बहुत आगे नहीं जा सकी। फिर भी आगाखाँ महल में कारावास के दरमियान उन्होंने बार-बार गीता के पाठ लेने की कोशिश चालू रखी थी।

उनकी निष्ठा का पात्र दूसरा ग्रन्थ था तुलसी-रामायण। बड़ी मुश्किल से दोपहर के समय उनको आधे घंटे की जो फुरसत मिलती थी, उसमें वह बड़े अक्षरों में छपी तुलसी रामायण के दोहे चश्मा चढ़ाकर पढ़ने बैठती थीं। उनका यह चित्र देखकर हमें बड़ा मजा आता। कस्तूरबा रामायण भी ठीक ढंग से कभी पढ़ न सकी। राष्ट्रीय संत तुलसीदास के द्वारा लिखा हुआ सती-सीता का वर्णन भले ही वह ठीक समझ न सकी हों, फिर भी प्रत्यक्ष सती-सीता तो बन ही सकीं।

दुनिया में दो अमोघ शक्तियाँ हैं- शब्द और कृति। इसमें कोई शक नहीं कि 'शब्दों' ने सारी पृथ्वी को हिला दिया है। किन्तु अन्तिम शक्ति तो 'कृति की है। महात्माजी ने इन दोनों शक्तियों की असाधारण उपासना की है। कस्तूरबा ने इन दोनों शक्तियों में से ही अधिक श्रेष्ठ शक्ति कृति की नम्रता के साथ उपासना करके संतोष माना और जीवनसिद्धि प्राप्त की।

दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने जब उन्हें जेल भेज दिया, कस्तूरबा ने अपना बचाव तक नहीं किया। न कोई सनसनाटी पैदा करनेवाला निवेदन प्रकट किया। 'मुझे तो वह कानून तोड़ना ही है, जो यह कहता है कि मैं महात्माजी की धर्मपत्नी नहीं हूँ।-इतना कहकर वह सीधे जेल में चली गयीं। जेल में उनकी तेजस्विता तोड़ने की कोशिशें वहाँ की सरकार ने बहुत की, किन्तु अन्त में सरकार की उस समय की जिद्द ही टूट गयी।

डॉक्टर ने जब इन्हें धर्म-विरुद्ध खुराक लेने की बात कही, तब भी उन्होंने धर्मनिष्ठा पर कोई व्याख्यान नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा-'मुझे अखाद्य खाना खाकर जीना नहीं है। फिर भले ही मुझे मौत - का सामना करना पड़े।'

कस्तूरबा की कसौटी केवल सरकार ने ही की हो, ऐसी बात नहीं है। खुद महात्माजी ने भी कई बार व्य उनसे कठोर और मर्मस्पर्शी बातें कहीं, तब भी उन्होंने हार कबूल नहीं की। पति का अनुसरण करना ही सती का कर्तव्य है, ऐसी उनकी निष्ठा होने के कारण मन में किसी भी प्रकार का संदेह लाए-बिना वह धर्म नो के मामलों में पति का अनुसरण करती रहीं।

कस्तूरबा के प्रथम दर्शन मुझे शान्ति-निकेतन में हुए। सन् 1915 के प्रारम्भ में जब महात्माजी वहाँ उपधारे, तब स्वागत का समारम्भ पूरा होते ही सब लोगों ने सोने की तैयारियाँ कीं। आँगन के बीच एक चबूतरा था। महात्माजी ने कहा, 'हम दोनों यहीं सोएँगे। अगल-बगल में बिस्तरे बिछाकर बापू और बा सो गए और हम सब लोग आँगन में आस-पास अपने बिस्तरे बिछाकर सो गए। उस दिन मुझे लगा, मानो हमें आध्यात्मिक माँ-बाप मिल गए हैं।

उनके आखिरी दर्शन मुझे उस समय हुए जब वह बिड़ला हाउस में गिरफ्तार की गयीं। महात्माजी को गिरफ्तार करने के लिए सरकार की ओर से कस्तूरबा को कहा गया, 'अगर आपकी इच्छा हो तो आप भी साथ में चल सकती हैं।' बा बोलीं, 'अगर आप गिरफ्तार करें तो मैं जाऊँगी। वरना आने की मेरी तैयारी नहीं है। महात्माजी जिस सभा में बोलने वाले थे, उस सभा में जाने का उन्होंने निश्चय किया था। पति के गिरफ्तार होने के बाद उनका काम आगे चलाने की जिम्मेदारी बा ने कई बार उठायी है। शाम के समय जब वह व्याख्यान के लिए निकल पड़ी, सरकारी अमलदारों ने आकर उनसे कहा, 'माताजी सरकार का कहना है कि आप घर पर ही रहें, सभा में जाने का कष्ट न उठाएँ। बा ने उस समय उन्हें न देशसेवा का महत्त्व समझाया और न उन्होंने उन्हें 'देशद्रोह करनेवाले तुम कुत्ते हो' कहकर उनकी निर्भर्त्सना ही की। उन्होंने एक ही वाक्य में सरकार की सूचना का जवाब दिया। 'सभा में जाने का मेरा निश्चय पक्का है, मैं जाऊँगी ही।

आगाखाँ महल में खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं थी। हवा की दृष्टि से भी स्थान अच्छा था। महात्माजी का सहवास भी था। किन्तु कस्तूरबा के लिए यह विचार ही असह्य हुआ कि 'मैं कैद में हूँ। उन्होंने कई बार कहा- 'मुझे यहाँ का वैभव कतई नहीं चाहिए, मुझे तो सेवाग्राम की कुटिया ही पसन्द है।

सरकार ने उनके शरीर को कैद रखा, किन्तु उनकी आत्मा को वह कैद सहन नहीं हुई। जिस प्रकार पिंजंडे का पक्षी प्राणों का त्याग करके बन्धनमुक्त हो जाता है, उसी प्रकार कस्तूरबा ने सरकार की कैद में अपना शरीर छोड़ा और वह स्वतंत्र हुई। उनके इस मूक किन्तु तेजस्वी बलिदान के कारण अंग्रेजी साम्राज्य की नीच ढीली हुई और हिन्दुस्तान पर की उनकी हक्मत कमजोर हुई। कस्तूरबा ने अपनी कृतिनिष्ठा के द्वारा यह दिखा दिया कि शुद्ध और रोचक साहित्य के पहाड़ों की अपेक्षा कृति का एक कण अधिक मूल्यवान और आबदार होता है। शब्दशास्त्र में जो लोग निपुण होते हैं, उनको कर्तव्य-अकर्तव्य की हमेशा ही विचिकित्सा करनी पड़ती है। कृतिनिष्ठ लोगों को ऐसी दविधा कभी परेशान नहीं कर पाती। कस्तूरबा के सामने उनका कर्तव्य किसी दीए के समान स्पष्ट था। कभी कोई चर्चा शुरू हो जाती, तब 'मुझसे यही होगा' और 'यह नहीं होगा'-इन दो वाक्यों में ही अपना फैसला सुना देतीं।

आश्रम में कस्तूरबा हम लोगों के लिए माँ के समान थीं। सत्याग्रहाश्रम यानी तत्त्वनिष्ठ महात्माजी की संस्था थी। उग्रशासक मगनलाल भाई उसे चलाते थे। ऐसे स्थान पर अगर वात्सल्य की आर्द्रता हमें मिलती थी, तो वह कस्तूरबा से ही। कई बार बा आश्रम के नियमों को ताक पर रख देतीं। आश्रम के बच्चों को जब भूख लगती थी, जब उनकी दाद बा ही सुनती थीं। नियमनिष्ठ लोगों ने बा के खिलाफ कई बार शिकायतें करके देखीं। किन्तु महात्माजी को अंत में हार खाकर निर्णय देना पड़ा कि अपने नियम बा को लागू नहीं होते।

आश्रम में चाहे बड़े-बड़े नेता आएँ या मामूली कार्यकर्ता आएँ, उनके खाने-पीने की पूछताछ अत्यन्त प्रेम के साथ यदि किसी ने की हो, तो वह पूज्य कस्तूरबा ने ही। आलस्य ने तो उनको कभी छुआ तक नहीं। किसी प्राणघातक बीमारी से मुक्त होकर चंगी हुई हों और शरीर में जरा-सी शक्ति आयी हो कि तुरन्त बे आश्रम के रसोई में जाकर काम करने लग जातीं। ठेठ आखीर में उनके हाथ-पाँव थक गये थे, शरीर जीर्ण-शीर्ण हुआ था। मुँह में एक दाँत बचा नहीं था। आँखें निस्तेज हो गयी थीं। जब भी वह रसोई में जाती और जो काम बन सके, आस्थापूर्वक करतीं। मैं जब उनसे मिलने जाता और जब वह खाने के लिए मुझे कुछ देतीं, तब छोटे बच्चों की तरह हाथ फैलाने में मुझे असाधारण धन्यता का अनुभव होता था।

वह भले ही अशिक्षित रही हों, संस्था चलाने की जिम्मेदारी लेने की महत्वाकांक्षा भले ही उनमें कभी जागी नहीं हो, देश में क्या चल रहा है उसकी सूक्ष्म जानकारी वह प्रश्न पूछ-पूछ कर या अखबारों के ऊपर नजर डालकर प्राप्त कर ही लेती थीं।

महात्माजी जब जेल में थे, तब दो-तीन बार राजकीय परिषदों का या शिक्षण सम्मेलनों का अध्यक्ष स्थान कस्तूरबा को लेना पड़ा था। उनके अध्यक्षीय भाषण लिख देने का काम मुझे करना पड़ा था। मैंने उनसे कहा-'मैं अपनी ओर से एक भी दलील भाषण में नहीं लाऊँगा। आप जो बतावेंगी, मैं ठीक भाषा में लिख दूंगा। हाँ-ना कहकर वह अपने भाषण की दलीलें मुझे बता देतीं। उस समय उनकी वह शक्ति देखकर में चकित हो जाता था।

अध्यक्षीय भाषण किसी से लिखवा लेना आसान है। लेकिन परिषद् जब समाप्त होती है तब उसका उपसंहार करना हर एक को अपनी प्रत्युत्पन्नमति से करना पड़ता है। जब कस्तूरबा ने उपसंहार के भाषण किये उनकी भाषा बहुत ही आसान रहती थी किन्तु उपसंहार परिपूर्ण सिद्ध होता था। उनके इन भाषणों में परिस्थिति की समझ, भाषा की सावधानी और खानदान की महत्ता आदि गुण उत्कृष्टता से दिखायी देते थे।

आज के जमाने में स्त्री-जीवन सम्बन्ध के हमारे आदर्श हमने काफी बदल लिए हैं। आज कोई स्त्री अगर कस्तूरबा की तरह अशिक्षित रहे और किसी तरह महत्त्वाकांक्षा का उदय उसमें न दिखायी दे, तो हम उसका जीवन यशस्वी क्या कृतार्थ नहीं कहेंगे। ऐसी हालत में जब कस्तूरबा की मृत्यु हुई, पूरे देश ने स्वयं स्फूर्ति से उनका स्मारक बनाने का तय किया। और सहज इकट्ठी न हो पाए, इतनी बड़ी निधि इकट्ठी कर दिखायी। इस पर से यह सिद्ध होता है कि हमारा प्राचीन तेजस्वी आदर्श अब देशमान्य है। हमारी संस्कृति की जड़े आज भी काफी मजबूत हैं।

यह सब श्रेष्ठता या महत्ता कस्तूरबा में कहाँ से आयी? उनकी जीवन-साधना किस प्रकार की थी? शिक्षण द्वारा उन्होंने बाहर से कुछ नहीं लिया था। सचमुच उनमें तो आर्य आदर्श को शोभा देने वाले कौटुम्बिक सद्गुण ही थे। असाधारण मौका मिलते ही और उतनी ही असाधारण कसौटी आ पड़ते ही उन्होंने स्वभावसिद्ध कौटुम्बिक सद्गुण व्यापक किये और उनके जोरों हर समय जीवनसिद्धि हासिल की। सूक्ष्म प्रमाण में या छोटे पैमाने पर जो शुद्ध साधना की जाती है, उसका तेज इतना लोकोत्तरी होता है कि चाहे कितना ही बड़ा प्रसंग आ पड़े, या व्यापक प्रमाण में कसौटी हो, चारित्र्यवान् मनुष्य को अपनी शक्ति का सिर्फ गुणाकार ही करने का होता है।

सती कस्तूरबा सिर्फ अपने संस्कार बल के कारण पातिव्रत्य को, कुटुम्ब-वत्सलता को और तेजस्विता को चिपकाए रहीं और उसी के जोरों महात्माजी के महात्म्य के बराबरी में आ सकीं। आज हिन्दू, मुस्लिम, पारसी, सिख, बौद्ध, ईसाई आदि अनेक धर्मी लोगों का यह विशाल देश अत्यन्त निष्ठा के साथ कस्तूरबा की पूजा करता है और स्वातंत्र्य के पूर्व की शिवरात्रि के दिन उनका स्मरण करके सब लोग अपनी-अपनी तेजस्विता को अधिक तेजस्वी बनाते हैं।

- काका कालेलकर

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