युवा शक्ति में असंतोष : कारण और निवारण - निबंध, हिन्दी

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'युवा शक्ति में असंतोष के कारण और निवारण' से मिलते जुलते शीर्षक इस प्रकार हैं-
  • छात्र असंतोष
  • छात्र असंतोष : समस्या और समाधान
  • छात्र तथा अनुशासन
  • छात्र असंतोष : कारण एवं समाधान
  • छात्रों में अनुशासनहीनता
  • दिग्भ्रमित युवा शक्ति
YUVA SHAKTI ME ASANTOSH - KARAN AUR NIVARAN

निबंध की रूपरेखा

  1. प्रस्तावना
  2. युवा शक्ति की सामर्थ्य
  3. शक्ति के श्रोत छात्र
  4. युवाओं की उम्र की सीमा
  5. युवाओं का सर्वांगीण विकास
  6. आज के युवा
  7. छात्र असंतोष के कारण
  8. छात्र असंतोष दूर करने के उपाय

युवा शक्ति में असंतोष के कारण और निवारण

प्रस्तावना

युवा शक्ति किसी भी देश की वह ताकत है जो उसके भविष्य को बदल सकती है। युवाओं में भी अधिकतर संख्या छात्र-छात्राओं की है, क्योंकि वे इस अवस्था में अपने भावी जीवन के लिए विद्या रूपी शक्ति अर्जित करते हैं।

खेद का विषय है कि आज युवा शक्ति दिग्भ्रमित है, उसे अपना भविष्य असुरक्षित दिखाई दे रहा है और इसी कारण वह अनुशासन भंग करने पर आमादा दिखाई पड़ती है।

युवा शक्ति की सामर्थ्य

युवा शक्ति परिवार, समाज अथवा देश की रीढ़ होते हैं, युवावस्था मधुऋतु के समान है, यही साधना की सच्ची अवस्था है। इसी अवस्था में युवा वर्ग शक्ति संचित करता है, युवकों के पास चुनौतियों से जूझने का अक्षय कोश होता है, इनका संगठन अट्ट होता है।

युवा शक्ति की संवेदनशीलता निश्छल, निर्मल होती है जो स्वार्थों के ऊपर उठी होती है और विश्व को समर्पित होती है. इनमें भावनाएं भरी होती है जो पवित्र होती हैं। युवक प्रगति, परिवर्तन और क्रान्ति के दूत होते हैं।

शक्ति के श्रोत छात्र

छात्र किशोरावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ने वाले शक्ति-स्रोत होते हैं, उनके मन में उत्साह, प्रफुल्लता, काल्पनिकता और आदर्शवादिता का डेरा होता है, वे बहुत कुछ कर गुजरना चाहते हैं। यदि उनकी शक्ति को उचित दिशा निर्देश मिल गया तो वे समाज को नई शक्ति देने की क्षमता रखते हैं। देश को आकाश की ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं और विश्व को आदर्श रूप दे सकते हैं। यदि उनकी शक्ति को विपरीत दिशा मिली तो वे विध्वंसक बन बैठते है और अराजकता का साम्राज्य फैला सकते हैं।

युवाओं की उम्र की सीमा रेखाएं

युवाओं की उम्र की सीमा रेखाएं निर्धारित नहीं की जा सकतीं। उनका रूपाकार भी नहीं दर्शाया जा सकता, युवा की परिभाषा भी सरल सुगम नहीं। युवा में असीम साहस होता है, उफनता जोश होता है, उसकी आँखों में आत्मविश्वास झलकता है, उसकी हँसी बादलों की गर्जना को मात करती है। उसका लक्ष्य अचूक होता है और स्थितियों को वह अपने अनुकूल बना लेने की क्षमता रखता है। उसके लिए किसी कवि ने कहा है :
चलो तो प्रलय मचा दो तुम,
भूधर को भी सरका दो तुम।
इंगित पर वसुधा नाच उठे,
पानी में आग लगा दो तुम।।

युवाओं का सर्वांगीण विकास

युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिए उत्तम शिक्षा की नितान्त आवश्यकता होती है। यह कर्तव्य राज्य का है, राज्य ऐसी शिक्षा की व्यवस्था करे जिससे युवाओं को उनकी योग्यता एवं क्षमता के अनुरूप उन्नति का अवसर प्राप्त हो सके, पर राज्यों का नियन्त्रण इतना कठोर होता जा रहा है कि शिक्षा पर अन्तर्राष्ट्रीय नियन्त्रण की बात उठने लगी है।

पुनः आज की शिक्षा में दलगत राजनीति भी हावी होने लगी है, फलतः आज के छात्र एवं अध्यापक दलगत राजनीति से अलग नहीं रह सकते, यहाँ हमें इस तथ्य पर भी ध्यान देना होगा कि आज के युवा छात्र भेड़-बकरी नहीं जिन्हें कोई भी राजनीतिक गड़रिया जिधर चाहे उधर हाँक ले।

वे तो देश के भावी भाग्य विधाता हैं, इन्हें विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में उच्चकोटि की शिक्षा की आवश्यकता है। जहाँ वे उत्कृष्ट सैद्धान्तिक विश्लेषण कर सकें, चिन्तन-मनन और विचार-मन्थन में अपने को लीन कर सकें और बदलती स्थितियों के अनुरूप जीवन मूल्यों का सृजन कर सकें।

आज के युवा

द्रोण और एकलव्य के देश का युवा आज निराश है। पत्थर को ठोकर मारकर जल निकाल लेने वाली युवा शक्ति आज पराजित मनोवृत्ति लिए हुए है। वह दिशाहीन है, टूट रही है, बिखर रही है, राजनीतिज्ञों की गिद्ध दृष्टि इस शक्ति को तोड़ने में लगी है। विद्यालयों में हिंसा ताण्डव नृत्य कर रही है, वहाँ खिड़कियाँ, दरवाजे, मेजें, कुर्सियाँ तोड़ना सामान्य घटना बन चुकी है। स्थानीय गुण्डे इन भोले-भाले छात्र युवाओं को गुमराह कर रहे हैं। ऐसे समय हमें श्री जयप्रकाश नारायण जी स्मरण हो जाते हैं जिन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति के लिए अहिंसक निर्दलीय, युवाशक्ति का आह्वान किया था।

छात्र असंतोष के कारण

  • शिक्षा के क्षेत्र में युवाशक्ति की गिरती स्थिति के अनेक कारण हैं यथा :
  • शिक्षा का व्यवसायीकरण।
  • सिफारिश एवं भाई भतीजावाद।
  • राष्ट्रीय चरित्र में गिरावट
  • शिक्षा का जीवन की समस्याओं से अलग होना।
  • रोजगारमूलक शिक्षा का अभाव।
  • आरक्षण की व्यवस्था के कारण सवर्णों में उत्पन्न निराशा।
  • प्रेरणा स्रोतो का एवं नैतिक शिक्षा का अभाव।
  • विकास के कार्यों से युवा शक्ति को दूर रखा जाना।
  • विद्यालयों में छात्र का उपस्थित होना पर कक्षाओं में नहीं 'कुन्जियों' पर आस्था।
  • प्राध्यापकों द्वारा विद्यालयों में खानापूर्ति करना तथा कोचिंग कक्षाएं चलाना।
  • गुरु-शिष्य परम्परा के गिरते मूल्य।
  • धनाढ्यों के बच्चों की उच्छृखलता।
  • अभिभावकों के पास युवाओं के लिए समय न होना।
  • सस्ते मनोरंजन के साधनों में वृद्धि।
  • अशासकीय विद्यालयों, महाविद्यालयों में अध्यापकों पर प्रबन्धकों का अनुचित दबाव।
  • रचनात्मक क्षमताओं के विकास के माध्यम न होना।

छात्र असंतोष को दूर करने के उपाय

  • आज आवश्यकता है युवा शक्ति को दिग्भ्रमित होने से बचाने की।
  • आज आवश्यकता है तिलक, राजा राममोहन राय, गांधी, नेहरू, दयानन्द सरस्वती एवं विवेकानन्द सरीखे प्रेरणा स्रोतों की जो युवा शक्ति की क्षमताओं को उचित प्रवाह दे सकें और उनका रचनात्मक उपयोग कर सकें।
  • आज आवश्यकता है नैतिक शिक्षा की जिसका बीजारोपण प्राथमिक शिक्षा के समय से ही किया जाए।
  • आज आवश्यकता है युवाओं को अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों को पहचानने की और तदनुरूप कार्य करने की।
  • आज आवश्यकता ह शिक्षण संस्थाओं को राजनीति से दूर रखने की, उनमें भाई भतीजावाद को समाप्त करने की।
  • और आवश्यकता है हड़तालें, घेराव एवं हिंसा समाप्त करने की।
छात्र असंतोष को दूर करने के लिए तथा दिग्भ्रमित युवाओं को पटरी पर लाने हेतु हमें शिक्षा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार करने होंगे। शिक्षा ऐसी हो जो उनमें नैतिक एवं मानवीय मूल्यों का संचार कर सके, उन्हें जीवन के लक्ष्य का बोध कराए तथा रोजगारपरक हो।

छात्रों को आज की गन्दी राजनीति से दूर भी रखना आवश्यक है। इस राजनीति के कारण वे अपने उद्देश्य से भटक जाते हैं, उनमें विकृत महत्वाकांक्षाएं जन्म ले लेती हैं जिसकी पूर्ति हेतु वे अनैतिक कार्यों में संलग्न हो जाते हैं।

उनके आक्रोश एवं विद्रोह को जन्म देने वाले कारणों पर प्रभावी अंकुश लगाकर ही हम छात्र असंतोष का निदान कर सकते हैं। वर्तमान पीढ़ी के छात्रों को रचनात्मक क्रिया-कलापों में संलग्न करके तथा उन्हें समाज सेवा के कार्यों में संलग्न करके भी बहुत कुछ किया जा सकता है।

आज यदि शिक्षा का सम्बन्ध मात्र परीक्षा से न जोड़ा जाए, यदि शिक्षा को रोजगारमूलक बनाया जाए, यदि अध्यापकों के स्तर को ऊँचा उठाया जाए तथा प्रबन्धकों, अध्यापकों एवं छात्रों के बीच सौहार्द एवं समन्वय स्थापित किया जाए, यदि शिक्षा में समान सुविधाएं दी जाएं, यदि युवाओं के मनोविज्ञान को समझकर तदनुरूप शिक्षा की व्यवस्था की जाए तथा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चेतना जाग्रत की जाए तो युवाशक्ति को गति मिल सकती है और वह सृजनात्मक कार्यों में लगाई जा सकती है।

आज युवाशक्ति के निर्माणात्मक सहयोग की नितान्त आवश्यकता है, देश के भाग्यविधाताओं से अपेक्षा है कि वे इस क्षेत्र में दूरदर्शिता से काम लें तथा युवाओं के प्रति स्नेह, संयम, सहानुभूति तथा प्रोत्साहन दर्शाएं।

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