सुमित्रानन्दन पन्त - जीवन परिचय और रचनाएँ

Sumitranandan Pant

Q. सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन-परिचय प्रस्तुत करते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए।

सुमित्रानन्दन पन्त प्रकृति के सुकुमार कवि हैं। छायावादी काव्य की सम्पूर्ण कोमलता और कमनीयता इनके काव्य में साकार हो उठी है। प्रकृति के हरे-भरे वातावरण में बैठकर जब ये कल्पना लोक में खो जाते थे तो प्रकृति की सुन्दरता का सृजन स्वयं ही मूर्त हो उठता और मानवता के मंगलमय उन्नयन के स्वर गूंज उठते।
सुमित्रानन्दन पन्त जी ने स्वयं स्वीकार किया है कि "कविता करने की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति निरीक्षण से मिली जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि कूर्माचल प्रदेश को है।"

जीवन-परिचय

प्रकृति के अनुपम चितेरे कवि सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म हिमालय की गोद में बसे उत्तरांचल प्रदेश के कौसानी ग्राम में 20 मई सन् 1900 ई. को हुआ था। जन्म के कुछ घण्टों पश्चात् ही इनकी माता का निधन हो जाने के कारण इनका लालन-पालन इनकी दादी ने किया।

गाँव की पाठशाला और राजकीय हाईस्कूल अल्मोड़ा से शिक्षा प्राप्त करने के बाद काशी से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। अल्मोड़ा में पढ़ते समय ही इन्होंने अपना नाम गुसांई दत्त से बदलकर सुमित्रानन्दन रख लिया। इसके बाद जब ये इलाहाबाद के सेण्ट्रल म्योर कॉलेज से इण्टर कर रहे थे, तभी गांधी जी के आन्दोलन से प्रभावित होकर कॉलेज छोड़ बैठे और स्वाध्याय से ही अंग्रेजी, संस्कृत और बंगला को अध्ययन किया।

अपने कोमल स्वभाव के कारण सत्याग्रह में सम्मिलित नहीं हुए और साहित्य साधना में संलग्न हो गए। सन 1931 ई. में ये कालाकांकर आ गए। वहा मार्क्सवाद का अध्ययन किया और फिर प्रयाग आकर प्रगतिशील विचारों की पत्रिका 'रूपाभ' निकाली।

सन् 1942 ई. में 'भारत छोड़ो आन्दोलन' से प्रेरित होकर 'लोकायन' नामक सांस्कृतिक पीठ की योजना बनाई। उसे क्रियान्वित करने के लिए विश्व प्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर से सम्बन्ध स्थापित किया और भारत भ्रमण के लिए निकल पड़े। इसी भ्रमण में इनका श्री अरविन्द से परिचय हुआ और उनके दर्शन से प्रभावित होकर प्रयाग लौटकर अनेक काव्य संकलन प्रकाशित किए जिन पर 'अरविन्द दर्शन' का स्पष्ट प्रभाव झलकता है। यथा: 'स्वर्ण किरण', 'स्वर्ण धूलि', 'उत्तरा' आदि।

सन 1950 में आकाशवाणी से सम्बद्ध हुए और प्रयाग में रहकर स्वच्छन्द रूप से साहित्य स्रजन करने लगे। भारत सरकार ने इनको 'पद्म विभूषण' की उपाधि से अलंकृत किया। इन्हें 'लोकायतन' पर 'सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार' और 'चिदम्बरा' पर ज्ञानपीठ पुरूस्कार प्राप्त हुआ। 29 दिसम्बर, सन् 1977 ई. को इनका निधन हो गया।

रचनाएँ

इनकी प्रमुख रचनाओं का विवरण इस प्रकार है :
  • काव्य कृतियाँ - 'वीणा', 'ग्रन्थि', 'पल्लव', 'गुंजन', 'युगान्त', 'युगवाणी', 'ग्राम्या', 'स्वर्ण किरण', 'स्वर्ण धूलि', 'युगपथ' 'उत्तरा', 'वाणी', 'कला और बूढा चाँद', 'लोकायतन' (महाकाव्य), 'चिदम्बरा', 'परुषोत्तम राम', 'पतझर', 'गीत हंस', 'गीत पर्व', आदि।
इनमें से वीणा, ग्रन्थि, पल्लव और गंजन छायावादी कृतियाँ हैं जबकि युगान्त, युगवाणी, ग्राम्या प्रगतिवादी रचनाएँ हैं।
  • उपन्यास - 'हार'
  • कहानी संग्रह -'पाँच कहानियाँ।
इसके अतिरिक्त उमर खय्याम की रुबाइयों का हिन्दी अनुवाद 'मधु ज्वाल' में किया है और अनेक संग्रहों की भूमिकाएँ भी लिखी हैं, जो इनके आलोचक रूप को उजागर करती है। पन्त जी के काव्य का विकास तीन रूपों में हुआ - 'छायावादी कवि के रूप में', 'प्रगतिवादी कवि के रूप में' और 'अध्यात्मवादी कवि के रूप में'। इनका काव्य विकास 'वीणा' से प्रारम्भ होकर 'पल्लव' एवं 'गुंजन' में विकसित होता हुआ 'युगान्त' पर समाप्त हो जाता है।

सुमित्रानन्दन पन्त काव्य का दूसरा चरण प्रगतिवादी रचनाओं का है। इसके अन्तर्गत कवि के तीन संकलन हैं - युगान्त, युगवाणी और ग्राम्या। सुमित्रानन्दन पन्त जी की रचनाओं का अन्तिम चरण अरविन्द दर्शन एवं नवमानवतावाद से प्रभावित है। इसके अन्तर्गत कवि के निम्न संकलन लिए जा सकते हैं स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, उत्तरा, लोकायतन, चिदम्बरा, आदि।

हिन्दी साहित्य में स्थान

कविवर सुमित्रानन्दन पन्त आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक हैं। उनकी रचनाओं को पाठकों ने समादृत किया है। 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' से सम्मानित पन्त जी हिन्दी के महान कवियों में से एक हैं।

छायावाद और प्रगतिवाद दोनों ही काव्यधाराओं पर उन्होंने अपनी लेखनी चलाई है। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में हम कह सकते हैं "पन्त जी की मेधा-सक्रिय शक्ति देखकर आश्चर्य चकित होना पड़ता है। हमारे वर्तमान के निर्माताओं में उनका गौरव अद्वितीय है। एक ही व्यक्ति ने अपने अल्पकाल में साहित्य की गति को दो बार दो विभिन्न दिशाओं में मोड़ दिया हो-ऐसा दूसरा उदाहरण अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।"
हिन्दी काव्य में प्रकृति सुंदरी का सुकुमार चित्र अंकित कर उसके सहज सौन्दर्य के चतर चितेरे और कोमल भावनाओं के कवि के रूप में पन्त जी सदैव अमर रहेंगे।

Q. "पन्त प्रकृति के सुकुमार कवि है" इस कथन की उदाहरण सहित विवेचना कीजिए।

अथवा

"पन्त काव्य में प्रकृति के विविध रूप मिलत हैं" सादाहरण समाक्षा काजिए।

अथवा

"पन्त प्रकृति के कुशल चितेरे हैं" इस कथन की समीक्षा कीजिए।

अथवा

"पन्त की रचनाओं में प्रकृति के अनेक रूपों का वर्णन दिखाई देता है" स्वपठित कविताओं के आधार पर समीक्षा कीजिए।

सुमित्रानन्दन पन्त जी को प्रकृति का सुकुमार कवी कहा गया है। उनका जन्म प्रकृति की रम्य गॉड में हुआ। जिसके सौन्दर्य को उन्होंने भली-भाँति देखा परखा था। कविता करने की प्रेरणा भी उन्हें प्रकृति निरीक्षण से मिली थी। प्रकृति उनकी चिर सहचरी रही है। वे नारी सौन्दर्य की तुलना में प्रकृति सौन्दर्य को वरीयता देते हुए कहते हैं :
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया।
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूं लोचन?
पन्त की कविता में प्रकृति के विविध रूपों की मनोहर झांकी मिलती है। उनके प्रकृति चित्रण की विशेषताएँ अग्र शीर्षकों में बताई जा सकती हैं :

आलम्बन रूप में प्रकृति चित्रण

पन्त ने प्रकृति को बड़े सूक्ष्म रूप में देखा है। उनकी कविताओं में प्रकृति के आलम्बन रूप की सुन्दर झाँकी देखने को मिलती है। उनकी बादल, गुंजन, परिवर्तन, एक तारा, नौका-विहार इसी प्रकार की कविताएँ हैं। यथा :
'पावस ऋतु थी पर्वत प्रदेश, पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश।।
मेखलाकार पर्वत अपार, अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़।
अवलोक रहा है बार-बार, नीचे जल में निज महाकार।

उद्दीपन रूप में प्रकृति

चित्रण किसी भाव के उद्दीपन के लिए जब प्रकृति को आधार बनाया जाता है, तब उद्दीपन रूप में प्रकृति चित्रण होता है। सुमित्रानन्दन पन्त के काव्य में अधिक तो नहीं, फिर भी इस प्रकार का चित्रण देखने को मिलता है, यथा :
'लहरें अधीर सरसी में तुमको, तकतीं उठ-उठकर।
सौरभ समीर रह जाता 'प्रेयसि'! ठण्डी साँसें भर।'

मानवीकरण के रूप में प्रक्रति चित्रण

प्रकृति पर चेतनता का आरोप मानवीकरण कहा जाता है। सुमित्रानन्दन पन्त जी प्रकृति में मानव-क्रिया, मानव-भावों आदि का तादाम्य प्रकृति के साथ स्थापित करते हैं। जड़ प्रकृति भी पन्त जी के लिए जड़ नहीं है, उसमें भी चेतना है। यथा :
'देखता हूँ जब उपवन
पियालों में फूलों के
प्रिये भर-भर अपना यौवन
पिलाता है मधुकर को।'

उपदेशक रूप में प्रकृति चित्रण

'पल-पल परिवर्तित प्रकृति वेश' मानव को कभी-कभी सुन्दर उपदेश देता है। कवि पन्त जी ने अनेक रचनाओं में प्रकृति को उपदेशक के रूप में चित्रित किया गया है, जैसे :
हँसमुख प्रसून सिखलाते, पल भर भी जो हँस पाओ,
अपने घर के सौरभ से, जग का आँगन भर जाओ।

मानव के प्रति सहानुभूति रूप में प्रकृति-चित्रण

प्रकृति ममतामयी होती है। मानव के दुःख से दुःखी होकर उससे सहानुभूति रखती है। मानव के कष्टों के साथ प्रकृति भी दुःखी हो जाती है। मानव प्रेम का चित्रण सुमित्रानन्दन पन्त की इन पंक्तियों में देखिए :
सुन्दर हैं विहग, सुमन सुन्दर
मानव तुम सबसे सुन्दरतम।

रहस्यात्मक रूप में प्रकृति चित्रण

ईश्वर का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने की प्रवृत्ति रहस्यवाद है। कवि सुमित्रानन्दन पन्त ने भी प्रकृति में किसी अव्यक्त ईश्वर को देखा है। ऐसे ईश्वर को, जो सारे संसार का नियामक है, उसका संचालन करता है। जैसे :
न जाने कौन, अये द्युतिमान!
जान मुझको अबोध, अज्ञान
सुझाते हो तुम पथ अनजान,
फूंक देते छिद्रों में गान

प्रतीक रूप में प्रकृति चित्रण

प्रकृति चित्रण में सौन्दर्य और सजीवता की सृष्टि के लिए प्रतीकों की योजना की जाती है। सुमित्रानन्दन पन्त जी के काव्य में इस प्रकार का प्रकृति-चित्रण पर्याप्त मात्रा में देखा जा सकता हैं। 'परिवर्तन' कविता की सजीवता नवीनता और मधुरता प्रतीको के कारण ही है। प्रकृति का सुन्दर युवती के रूप में एक प्रतीकात्मक चित्रण देखिए :
अभी तो मुकुट बँधा था माथ
हुए कल ही हल्दी के हाथ
खुले भी थे न लाज के बोल
खिले भी चुम्बन शून्य कपोल।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि पन्त काव्य में प्रकृति के विविध रूप उपलब्ध होते हैं। वे प्रकृति के सुकुमार कवि कहे जाते हैं।

Q. 'परिवर्तन' कविता के कथ्य एवं शिल्प पर प्रकाश डालिए।

अथवा

'परिवर्तन' कविता के काव्य सौष्ठव पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।

अथवा

'परिवर्तन' कविता के द्वारा कवि क्या संदेश देना चाहता है? स्पष्ट करें।

'परिवर्तन' पन्त जी द्वारा रचित एक लम्बी कविता है जो मूलतः 'पल्लव' नामक काव्य संकलन में संकलित है। 'परिवर्तन' कविता का मूल विषय दार्शनिक है किन्तु सुमित्रानन्दन पन्त जी ने इसे काव्य को सरलता से युक्त कर दिया है। 'परिवर्तन' कविता को समालोचकों ने एक "ग्रैण्ड महाकाव्य" तक कहा है। स्वयं पन्त जी इसे 'पल्लव' काल की प्रतिनिधि मानते हैं। इस कविता के काव्य सौन्दर्य का उद्घाटन निम्न शीर्षकों में किया जा सकता है :

परिवर्तन जीवन का शाश्वत सत्य

कवि ने परिवर्तन को जीवन का शाश्वत सत्य माना है। यहाँ सब कुछ परिवर्तनशील है। पृथ्वी का वह वैभव अब कहाँ चला गया। यहाँ सब कुछ मिथ्या है। संसार की अचिरता को देखकर हवा ठण्डी साँसें भरती है, आकाश ओस के आँसू गिराता है और समुद्र सिसकता है-
अचिरता देख जगत् की आप
शून्य भरता समीर निःश्वास,
डालता पातों पर चुपचाप
ओस के आंसू नीलाकाश,

परिवर्तन के कोमल एवं कठोर रूप

परिवर्तन के कोमल एवं कठोर दोनों रूपों का चित्रण इस कविता में किया गया है। यह परिवर्तन जब प्रलयकालीन ताण्डव नृत्य करता है तो संसार में उथल-पुथल मच जाती है। यह अत्यन्त निष्ठूर है तथा इस पर किसी की करुण पुकार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता-
अहे निष्ठुर परिवर्तन!
तुम्हारा ही ताण्डव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन
तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन!

विविध रसों का चित्रण

परिवर्तन कविता में विविध रसों का चित्रण कवि ने किया है। इसमें शृगार रस, करुण रस, रौद्र रस, भयानक रस आदि का सुन्दर चित्रण हुआ है। करुण रस का एक चित्र देखिए-
हाय रुक गया यहीं संसार
बना सिंदूर अंगार।
वातहत लतिका वह सुकुमार
पड़ी है छिन्नाधार।।

परिवर्तन की सर्वशक्तिमत्ता

परिवर्तन सर्वाधिक शक्तिशाली है। परिवर्तन को रोक पाने की क्षमता किसी में नहीं है। यह अत्याचारी शासक के समान नगर को जन शून्य कर देता है तथा चिरकाल में संचित कला कौशल एवं वैभव क्षण मात्र में नष्ट कर देता है-
तुम नृशंस नृप से जगती पर चढ़ अनियंत्रित,
हर लेते हो विभव कला कौशल चिरसंचित।।

भावानुकूल भाषा का प्रयोग

परिवर्तन कविता में कवि ने प्रसंगानुकूल भाषा का प्रयोग करते हुए कहीं कोमल तो कहीं कठोर भाषा का प्रयोग किया है। भाषा में प्रतीकात्मकता एवं लाक्षणिकता का भी प्रयोग किया गया है यथा-
चार दिन सुखद चाँदनी रात।
और फिर अंधकार अज्ञात।।
'भाषा का कठोर रूप निम्न अवतरण में देखा जा सकता है।
अहे वासुकि सहस्र फन।
लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरंतर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर।।
अलंकार योजना
परिवर्तन कविता में अत्यन्त मनोहारी अलंकार योजना की गई है। इस कविता में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, रूपकातिशयोक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग किया गया है। कुछ उपमाएँ द्रष्टव्य हैं, यथा-
  • तुम नृशंस नृप से जगती पर चढ़ अनियंत्रित
  • इन्द्र धनु की सी छटा विशाल
  • शिशिर सा झर नयनों का नीर
रूपक अलंकार के कुछ उदाहरण देखिए-
  • हिमजल हास,
  • गालों के फल,
  • कचों के चिकने काले व्याल,
  • ओस के आंसू।
परिवर्तन कविता में कलात्मकता का पूर्ण समावेश है। कवि ने दर्शन की अभिव्यक्ति सरस ढंग से की है। जगत को नाशवान बताकर व्यक्ति को सचेत किया है कि वह अहंकार को त्याग दे और जीवन की वास्तविकता को समझकर संयत आचरण करे। निश्चय ही परिवर्तन पन्त जी की एक शिक्षाप्रद एवं उच्चकोटि की दार्शनिक कविता है।

Q. 'बापू के प्रति' कविता के भाव एवं विचार स्पष्ट कीजिए।

अथवा

पन्त जी ने गाँधी जी के महान व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति 'बापू के प्रति कविता में की है। स्पष्ट कीजिए।

कविवर सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित कविता 'बापू के प्रति' उनके काव्य संग्रह 'यगान्त' से ली गई है। इस रचना में उन्होंने युगपुरुष महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला है। महात्मा गाँधी को कवि ने एक ऐसा महान पुरुष बताया है जो एक पूर्ण मानव थे। गाँधी जी के सिद्धान्तों पर ही भावी संस्कृति का निर्माण होगा। वे भले ही शरीर से दुर्बल हड्डियों का ढाँचा मात्र थे तथापि उनमें उच्चकोटि का आत्मिक बल निहित था। कवि ने बापू के व्यक्तित्व का निरूपण करते हुए कहा है-
तुम माँसहीन, तुम रक्तहीन
हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीन,
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समासीन।
गाँधी जी ने सत्य, अहिंसा और प्रेम का जो मार्ग संसार को दिखाया उससे मानव जाति का कल्याण होगा, ऐसा कवि का विश्वास है।

हे बापू! संसार के अन्य लोग जहाँ अपना सुख प्राप्त करना ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं वहीं तुम सत्य की खोज को जीवन का लक्ष्य मानते रहे। बाकी लोग तो शरीर को प्रधानता देते हैं इसलिए वे मिट्टी के पु ले हैं किन्तु तुम आत्मा के प्रफुल्लित कमल हो।
सुख भोग खोजने आते सब,
आए तुम करने सत्य-खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन,
तुम आत्मा के, मन के मनोज!
संसार में जड़ता, हिंसा एवं प्रतिस्पर्धा के जो भाव व्याप्त थे तमने उन्हें समाप्त करने में अपना योगदान दिया और मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को समाप्त कर मानवता का कमल खिला दिया। तुमने यह दिखा दिया कि शारीरिक शक्ति पर मानसिक एवं आत्मिक शक्ति से विजय पाई जा सकती है। हे बापू! तुमने सर्वस्व त्याग कर जो मुक्ति प्राप्त की वह अद्वितीय है।

कवि ने साम्राज्यवाद को कंस मानते हए बताया है कि उसने मानवता रूपी देवकी को बन्दी बना लिया था। परतन्त्रता के कारागार में ही तमने दिव्य शक्ति रूपी कृष्ण को अवतरित कर अंग्रेजी साम्राज्य को उखाड़ फेंका और असम्भव को भी सम्भव कर दिखाया ।
साम्राज्यवाद था कंस, वन्दिनी
मानवता, पशु-बलाक्रान्त,
श्रृंखला-दासता, प्रहरी बहु
निर्मम शासन-पद शक्ति-भ्रान्त,
तुमने गीता के उपदेश को अपने जीवन में बखूबी उतारकर यह दिखा दिया कि तुम वास्तव में मुक्त पुरुष हो। सत्य की जीत होती है, डरो मत-इस उपदेश को तमने अपने जीवन में सार्थक करके दिखा दिया। हे बापू! तुम्हें शत-शत प्रणाम है।

स्पष्ट है कि प्रस्तुत कविता में पन्त जी ने गाँधी जी के प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उन्हें एक महामानव के रूप में निरूपित किया है।

Q. पन्त की 'गीत विहग' कविता के काव्य सौन्दर्य पर प्रकाश डालिए।

अथवा

'गीत विहग' कविता का संदेश अपने शब्दों में लिखिए।

'गीत विहग' सुमित्रानन्दन पन्त जी की सुन्दर रचना है जो उनके काव्य संकलन 'उत्तरा' से ली गई है। इसमें कवि ने स्वयं को गीत सुनाने वाला ऐसा पक्षी माना है जो मानव जीवन की गरिमापूर्ण कहानी सुनाता है और उसे नवीनता एवं चेतना से युक्त गीत सुनाकर नई स्फूर्ति प्रदान करता है। जीवन के पतझड़ में मन की शाखा पर वसन्त के रूप में खिलकर नए पत्तों का संसार बसाने का काम भी गीत विहग ही करता है-
युग के खण्डहर पर डाल सुनहली छाया,
मैं नव प्रभात के नभ में उठ मुसकाता,
जीवन पतझर में जन मन की डालों पर
मैं नव मधु के ज्वाला पल्लव सुलगाता!
जब शिशिर से आक्रान्त सारा उपवन पतझड़ के कारण रोदन-सा करता प्रतीत होता है तब युग की कोयल बनकर कवि ही आशा का सन्देश देता है। नए पल्लव आते हैं और प्राणों में नई स्फूर्ति का संचार होता है। संसार के दुखी जनों को स्वप्नों की दुनिया में विचरण करना कवि ही सिखाता है-
जब शिशिर क्रान्त, वन-रोदन करता भू-मन,
युग पिक बन प्राणों का पावक बरसाता!
मिट्टी के पैरों से भव-क्लान्त जनों को
स्वप्नों के चरणों पर चलना सिखलाता,
मैं मानव जीवन में नवीन आशाओं और कामनाओं को उद्दीप्त करता हूँ। दुखी और संतप्त मानव को मेरे मधुर गीत सान्त्वना प्रदान करते हैं और उसे क्रान्ति के लिए प्रेरित करते हैं-
आदर्शों के मरु जल से दग्ध मृगों को
मैं स्वर्गगा स्मित अन्तर्पथ बतलाता,
जन जन को नव मानवता में जाग्रत कर
मैं मुक्त कण्ठ जीवन रण शंख बजाता!
कवि स्वयं को गीत विहग बताता हुआ कहता है कि मैं इस सांसारिक नाशवान घोंसले से उडकर चेतना रूपी आकाश में मुक्त विचरण करता हूँ तथा जीवन में फैले अंधकार को दूर कर आत्म चेतना के प्रकाश को फैलाता हूँ। मैं इस नवीन पृथ्वी को ही स्वर्ग बनाना चाहता हूँ-
मैं गीत विहग, निज मर्त्य नीड़ से उड़ कर
चेतना गगन में मन के पर फैलाता,
मैं अपने अन्तर का प्रकाश बरसा कर
जीवन के तम को स्वर्णिम कर नहलाता!
कवि गीत विहग बनकर दिव्य चेतना का संदेश सुनाने की कामना करता है और नया जीवन संगीत गाकर मानव के जीवन को प्रकाशवान, सुखी, मधुर एवं स्फूर्तिवान् बनाने की कामना करता है।

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