सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' - जीवन परिचय और रचनाएँ

Sachidanand Hiranand Vatsyayan Agyeya

Q. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' का संक्षिप्त जीवन-परिचय प्रस्तुत करते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए।

हिन्दी में प्रयोगवाद के प्रवर्तक के रूप में सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय', चिरस्मरणीय कवि हैं। उन्होंने हिन्दी कविता को नए विषयनया शिल्प, नए उपमान एवं नवीन भाषा प्रदान की। 'तार सप्तक' के प्रकाशन से उन्होंने हिन्दी काव्य में प्रयोगवाद का सूत्रपात किया जिसका विकास कालान्तर में नई कविता के रूप में हुआ। अज्ञेय बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार थे। उन्होंने काव्य कृतियों के साथ कहानियां, उपन्यास, संस्मरण, निबन्ध आदि अनेक विधाओं में साहित्य रचना की।

जीवन-परिचय

अज्ञेय का जन्म मार्च सन् 1911 ई. में पंजाब के करतारपुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता हीरानन्द शास्त्री भारत के पुरातत्ववेत्ता थे। इनका बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास में बीता। इन्होंने लाहौर और मद्रास में शिक्षा ग्रहण की। बी.एससी. तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद अंग्रेजी, हिन्दी तथा संस्कृत का स्वाध्याय से अध्ययन किया।

क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में रहने के कारण इन्हें चार वर्ष कारावास में तथा दो वर्ष नजरबन्द रहना पड़ा। इसी बीच इन्होंने दो विवाह किए। कुछ समय तक अमरीका में भारतीय साहित्य और संस्कृत के अध्यापक रहे। ये फिर जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य तथा भाषा अनुशीलन विभाग के निदेशक रहे। अज्ञेय जी 'सैनिक, विशाल भारत, साप्ताहिक दिनमान, नया प्रतीक' नामक पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन से भी सम्बद्ध रहे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस साहित्यकार का निधन 4 अप्रैल 1987 ई. को हुआ।

रचनाएँ

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' जी ने गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई।
  • इनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं :- १. आँगन के पार द्वार, २. अरी ओ करुणा प्रभामय, ३. हरी घास पर क्षण भर, ४. इन्द्र धनु रौंदे हुए से, ५. बाबरा अहेरी, ६. इत्यलम्, ७. कितनी नावों में कितनी बार, ८. चिन्ता, ९. पूर्वा, १०. सुनहरे शैवाल, ११. पहले मैं सन्नाटे बुनता हूं, आदि।
  • अज्ञेय जी की कृति 'कितनी नावों में कितनी बार' को 1978 ई. में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ है।
इसके अतिरिक्त निबन्ध, समीक्षा, नाटक, कहानी, उपन्यास, आदि विविध गद्य विधाओं में भी उन्होंने उच्चकोटि की रचनाएं लिखी हैं।
  • इनके लिखे प्रमुख उपन्यास है- (१) शेखर एक जीवनी (दो भाग), २. अपने-अपने अजनबी, ३. नदी के द्वीप।
  • उनके दो निबन्ध संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। १. त्रिशंकु, २. आत्मनेपद।
  • इसके अतिरिक्त १. जयदोल, २. विपथगा, ३. परम्परा, ४. कोठरी की बात, ५. शरणार्थी उनके कहानी संग्रह हैं।
  • यात्रा वृत्तान्त के रूप में उनके दो संग्रह प्रकाशित हए हैं : १. अरे यायावर रहेगा याद २. एक बूंद सहसा उछली।
अज्ञेय जी ने कई ग्रन्थों एवं पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। सप्तकों की श्रृंखला में उन्होंने तार सप्तक, दूसरा सप्तक, तीसरा सप्तक एवं चौथा सप्तक का सम्पादन कर नए युग का सूत्रपात किया। 'नया प्रतीक' नामक पत्र का सम्पादन भी अज्ञेय जी ने किया। आगरा से प्रकाशित होने वाले सैनिक नामक दैनिक समाचार-पत्र के सम्पादकीय विभाग में भी वे रहे थे।

हिन्दी साहित्य में स्थान

ये प्रतिभा सम्पन्न समर्थ कवि हैं। अज्ञेय जी ने हिन्दी कविता का नव संस्कार किया है। उसे नई भाषा, नया रूप एवं नया उपमान विधान दिया है। भाषा को नया स्वरूप देने के साथ-साथ अज्ञेय ने उसका संस्कार किया है। प्रयोगवाद के प्रवर्तक के रूप में इनकी प्रतिभा साहित्य के क्षेत्र में सदैव स्मरणीय रहेगी। शिल्प के नूतन उपकरणों की ओर कवियों का ध्यान आकृष्ट करने वाले प्रयोगधर्मी कवि के रूप में हिन्दी साहित्य उनका चिर-ऋणी रहेगा। नई कविता की शिल्पगत आधुनिकता को सँवारने में सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय', का सर्वाधिक योगदान है। प्रयोगवाद के प्रवर्तक के रूप में वे हिन्दी साहित्य में सदैव स्मरण किए जाएंगे।

Q. अज्ञेय की कविता 'हिरोशिमा' के कथ्य पर प्रकाश डालिए।

अथवा

'हिरोशिमा' कविता का भाव अपने शब्दों में व्यक्त कीजिए।

प्रयोगवाद के प्रवर्तक कवि सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' एक प्रतिभा सम्पन्न मानवतावादी कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनकी कविताएं एक और भावना को उद्वेलित करती हैं, तो दूसरी ओर बुद्धि को भी झकझोर देती हैं। 'हिरोशिमा' नामक कविता अज्ञेय जी के काव्य संकलन 'सुनहले शैवाल' में संकलित है।

इस कविता में कवि ने अपने मानवतावादी दृष्टिकोण का परिचय देते हुए युद्ध को मानव के लिए अभिशाप बताया है। मानव जाति का अस्तित्व आज खतरे में है क्योंकि विश्व में परमाणु अस्त्रों का विनाशकारी जखीरा जमा है। द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका ने जापान के नगर हिरोशिमा और नागासाकी पर दो परमाणु बम गिराए थे जिन्होंने भीषण नरसंहार किया था। कवि ने यहाँ हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम की विभीषिका का चित्रण किया है :
एके दिन सहसा
सूरज निकला
अरे क्षितिज पर नहीं
नगर के चौक
धूप बरसी
पर अन्तरिक्ष से नहीं
फटी मिट्टी से।
यहां 'सूरज' परमाणु बम का प्रतीक है। इस बम से जो भयानक गर्मी एवं प्रकाश निकला वह सूरज जैसा ही था। जिसने भीषण जनसंहार किया। चारों ओर लाशें बिखरी पड़ी थीं। कुछ मनुष्य तो भाप बनकर इस तरह उड़ गए कि उनकी हड्डियां तक शेष नहीं बचीं। इस भीषण विनाश को देखकर ऐसा लगा जैसे काल रूपी सूर्य के रथ के पहियों के डण्डे टूटकर चारों ओर बिखर गए हों।

अजेय जी ने उस कारुणिक दशा का शब्द चित्र प्रस्तुत करते हुए कहा है कि विनाश के चिह्न उखड़ी हुई सडकों में बनी दरारों के रूप में देखे जा सकते थे। विडम्बना तो यह है कि यह सब प्रकृति का प्रकोप नहीं था अपितु मानव ने ही इस विनाशकारी अस्त्र का निर्माण किया था। मानव के बनाए हुए इस सूरज ने मानवता को कलंकित किया था :
मानव का रचा हुआ सूरज
मानव को भाप बना कर सोख गया।
पत्थर पर लिखी हुई यह जली हुई छाया
मानव की साखी हैं।
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' ने इस कविता के माध्यम से मानव जाति को यह चेतावनी दी है कि वह इस विनाश से सबक ले और परमाणु युद्ध के खतरों को समझकर ऐसे विनाशकारी अस्त्रों का निर्माण बन्द कर दे।

इस कविता का शिल्प विधान भी उच्चकोटि का है। कवि ने 'सूरज' का प्रयोग परमाणु बम के लिए करते हए प्रतीकात्मक शैली का उपयोग किया है। भाषा में लाक्षणिकता विद्यमान है। करुण रस की व्यंजना है। रूपक, उपमा एवं रूपकातिशयोक्ति अलंकार यहाँ प्रयुक्त किए गए हैं। खड़ी बोली में रचित यह कविता मुक्त छन्द विधान में प्रस्तुत की गई है। कविता का कथ्य एवं शिल्प बेजोड़ है, यह निःसंकोच कहा जा सकता है।

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