SANSMARAN - LEKHAK, PRAMUKH SANSMARAN

संस्मरण

स्मृ धातु से सम् उपसर्ग तथा ल्यूट प्रत्यय (अन्) लगाकर संस्मरण शब्द बनता है। इसका व्युत्पत्तिपरक अर्थ सम्यक् स्मरण है। किसी घटना, दृश्य, वस्तु या व्यक्ति का पूर्णरूपेण आत्मीय स्मरण संस्मरण कहलाता है।

यह आधुनिक काल में नवविकसित, सर्वाधिक विवादों से घिरी साहित्य-विधा है। यह विधा कभी तो जीवनी, रेखाचित्र, रिपोर्ताज और कभी निबन्ध के अन्तर्गत परिगणित की गई है। किन्तु उसकी विशाल परम्परा ने आज इस साहित्य रूप को स्वतंत्र अस्तित्व प्रदान किया है।

संस्मरण के उपकरण

इसके नियामक उपकरण पाँच हैं - भाव प्रवणता, चित्रोपमता, वैयक्तिकता, जीवन के खंड विशेष का वर्णन तथा सत्यात्मकता।

संस्मरण क्या है? संस्मरण लेखक व्यक्तिगत अनुभव को भावप्रवणता के साथ इस रूप में प्रस्तुत करता है कि उसका चित्र उपस्थित हो जाता है। यह अनुभव काल्पनिक न होकर सत्यकथा होता है। इसके विश्वसनीय होने पर संदेह नहीं किया जा सकता। इसके द्वारा व्यक्ति विशेष के जीवन या किसी घटना के महत्त्वपूर्ण पक्ष को उद्घाटित करना लेखन का उद्देश्य होता है।

संस्मरण और अन्य साहित्य विधाओं में तात्विक भेद होता हैं-

संस्मरण का अन्य साहित्य विधाओं से तात्विक भेद है।

जीवनी और संस्मरण में अंतर

जीवनी और संस्मरण में मूल अंतर यह है कि जीवनी के लिए आवश्यक नहीं है कि हम जिसकी जीवनी लिखें उससे हमारा व्यक्तिगत सम्पर्क हो, जबकि संस्मरण में वैयक्तिक सम्पर्क अनिवार्य है। साथ ही जीवनी लेखक अपने नायक के गुणों का ही चित्र प्रस्तुत करता है।

संस्मरण की सत्यात्मकता

संस्मरण की सत्यात्मकता, दोषों को भी ज्यों का त्यों चित्रित करने को बाध्य करती है। वैसे भी संस्मरण जीवनी के लिए सामग्री एकत्र करने वाले होते हैं। जीवनी संस्मरण के लिए सामग्री प्रस्तुत नहीं करती। संस्मरण तथा रेखाचित्र को भी एक समझने की भूल की जाती रही है।

संस्मरण और रेखाचित्र में अंतर

डॉ. नगेन्द्र ने लिखा है कि संस्मरण और रेखाचित्र में कोई मौलिक अंतर नहीं है। उन्होंने संस्मरण को रेखाचित्र का एक प्रकार माना है। ये दोनों पृथक् विधाओं के रूप में स्वीकृत हैं। रेखाचित्र लिखते समय रचनाकार अतिरंजना का आश्रय ले सकता है, जबकि संस्मरण में इसका अवकाश नहीं होता। संस्मरण केवल अतीत होता है, जबकि रेखाचित्र वर्तमान का भी हो सकता है और समर्थ लेखक भविष्य का भी चित्र प्रस्तुत कर सकता है। रेखाचित्र बाहरी विशेषताओं का निरूपण करता है किन्तु संस्मरण लेखक की दृष्टि आंतरिक विशेषताओं पर केन्द्रित रहती है। रेखाचित्र यदि चरित्रचित्र है तो संस्मरण चरित्र का दर्पण है जो नायक के अन्तर्बाहय चरित्र का विश्लेषण एवं संश्लेषण प्रस्तुत करता है। रेखाचित्र कल्पना प्रधान होता है तथा संस्मरण सत्यानुमोदित। रेखाचित्र में एक प्रकार की तटस्थता और निर्वैयक्तिकता का भाव होता है जबकि संस्मरण में ये दोनों ही बातें नहीं होतीं

संस्मरण और रिपोर्ताज में अंतर

रिपोर्ताज से भी संस्मरण भिन्न है। दोनों में ही वैयक्तिक सम्पर्क की प्रधानता होती है। संस्मरण में स्मृति का आश्रय अधिक रहता है जबकि रिपोर्ताज तो प्रत्यक्ष पर आधृत है। घटना विशेष के घटित होते ही रिपोर्ताज की रचना प्रक्रिया की उपयोगिता है। अतीत की घटना तो संस्मरण का ही रूप लेगी। इसी प्रकार रिपोर्ताज में रचनाकार का दृष्टिकोण तटस्थ रहता है। कभी-कभी वह उपदेशात्मक भी हो सकता है जबकि संस्मरण में इन दोनों की आवश्यकता नहीं है।

संस्मरण और निबन्ध में अंतर

निबन्ध तो मूलत: विचार-तर्क पद्धति से व्याख्यायित विधा है जबकि संस्मरण में तर्क पद्धति की अपेक्षा आत्मीयता तथा संवेदनात्मक स्वर की प्रमुखता होती है।

संस्मरण साहित्य

हिन्दी में संस्मरण साहित्य का प्रारम्भ द्विवेदी युग में सरस्वती के प्रकाश से स्वीकार किया जाता है। स्वयं आचार्य द्विवेदी ने अनुमोदन का अन्त (1905), सभ्यता की सभ्यता (1907), विज्ञानाचार्य बसु का विज्ञान मन्दिर (1978), आदि की रचना कर इस विधा की श्रीवृद्धि में योग दिया।

इस काल के अन्य संस्मरणकारों में रामकुमार खेमका (इधर-उधर की बातें, 1918), जगतबिहारी सेठ, जगन्नाथ खन्ना तथा भोलादत्त पाण्डेय (मेरी नई दुनिया सम्बन्धी राम कहानी, 1906) आदि प्रसिद्ध हैं।

छायावाद-युगीन संस्मरण 

छायावाद युग में सरस्वती, विशाल भारत, सुधा और माधुरी में कृपानाथ मिश्र, राम नारायण मिश्र, भगवानदीन दुबे, रामेश्वरी नेहरू, श्री मन्नारायण अग्रवाल के विभिन्न संस्मरण प्रकाशित हुए हैं।

इस काल के श्रेष्ठ संस्मरण लेखकों में पं. पद्मसिंह शर्मा अग्रगण्य हैं जिनके प्रतिनिधि संस्मरण पद्म पराग में संकलित हैं। इनके उत्तराधिकारियों में श्रीराम शर्मा का नाम सबसे पहले लिया जाता है। इनके पास विषय को शब्दों में मूर्त कर देने की वैसी ही क्षमता है तथा भाषा-शैली में वैसा ही नुकीलापन है जैसा पं. पद्मसिंह शर्मा में था।

छायावादोत्तर काल के संस्मरण

छायावादोत्तर काल की सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ महादेवी वर्मा की हैं। अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी, स्मारिका और मेरा परिवार की रचना द्वारा उन्होंने संस्मरण साहित्य के एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति की।
  • प्रकाशचन्द्र गुप्त (पुरानी स्मृतियाँ), 
  • राधिका रमण प्रसाद सिंह (मौलवी साहब, देवी बाबा), 
  • कन्हैया लाल मिश्र 'प्रभाकर' (जिन्दगी मुस्कुराई), 
  • देवेन्द्र सत्यार्थी (रेखाएँ बोल उठीं, क्या गोरी और साँवरी), 
  • जैनेन्द्र कुमार (ये और वे
आदि ने भी विभिन्न संस्मरणों में मामूली व्यक्तियों, अपने परिवारजनों और आत्मीयों, विद्वानों को जैसे मूर्त कर दिया।

इस युग के अन्य संस्मरण लेखक

  • चतुरसेन शास्त्री (वातायन), 
  • शान्ति प्रिय द्विवेदी (पथ चिह्न), 
  • कैलाश नाथ काटजू (मैं भूल नहीं सकता), 
  • इन्द्र विद्यावाचस्पति (मैं इनका ऋणी हूँ), 
  • विनोद शंकर व्यास (प्रसाद और उसके समकालीन), 
  • सम्पूर्णानन्द (कुछ स्मृतियाँ और स्फुट विचार), 
  • रायक्रष्ण दास (जवाहर भाई-उनकी आत्मीयता और सहदयता) 
कुन्तल गोयाल, डॉ. सहरगुलाल, पद्मिनी मेनन, लक्ष्मी नारायण सुधांशु के नाम भी उल्लेखनीय हैं।

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