राजस्थानी भाषा - राजस्थानी हिन्दी

RAJASTHANI BHASHA KE BHED, UPBHED - HINDI

राजस्थानी भाषा

राजस्थानी भाषा या राजस्थानी हिन्दी- राजस्थानी हिन्दी सम्पूर्ण राजस्थान में, सिंध के कुछ प्रदेश में और मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में बोली जाती है। ब्रजभाषा के साहित्यिक रूप में प्रतिष्ठित होने से पूर्व राजस्थानी (डिंगल) में विपुल मात्रा में साहित्य लिखा गया था। ब्रजभाषा के प्रतिष्ठित होने पर ब्रजभाषा के समानान्तर भी राजस्थानी में साहित्य लिखा गया और आज जबकि ब्रजभाषा लुप्त होने लगी है, तब भी राजस्थानी में साहित्य लिखा जा रहा है। राजस्थानी हिन्दी में गद्य और पद्य दोनों में साहित्य लिखा जा रहा है। राजस्थानी हिन्दी में गद्य और पद्य दोनों में साहित्य रचना हुई। ढोला मारू रा दूहा, वेली क्रिसन रूक्मिणी री, बीसलदेव रास, वीरसतसई इसके प्रमुख ग्रन्थ हैं। मीरा, दादू आदि भक्तों एवं संतों का अधिकांश साहित्य भी राजस्थानी में ही लिखा गया है। गद्य की दृष्टि से इसमें वचनिकाओं और ख्यातों का बाहुल्य रहा है। राजस्थानी के प्राचीन रचनाकारों में सूर्यमल्ल मिश्रण, पृथ्वीराज राठौड़, चंद बरदाई आदि एवं आधुनिक साहित्यकारों में कुँवर चन्द्रसिंह, विजयदान, लक्ष्मी कुमारी चूण्डावत आदि प्रमुख हैं। राजस्थानी की लगभग 30 बोलियाँ और उपबोलियाँ पाई जाती है, जिनमें से मारवाड़ी, मेवाती, जयुपरी (ढूंढाड़ी), मालवी, मेवाड़ी आदि प्रमुख हैं।

राजस्थानी हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ

बी.एस. माली ने लिखा है कि भारतीय भाषा के तुलनात्मक तथा ऐतिहासिक विवेचन के सम्बन्ध में सबसे पहला ग्रंथ जॉन बीम ने लिखकर तीन खंडों में सन् 1872, 1875 और 1879 में प्रकाशित किया था; उसमें राजस्थानी का विचार नहीं हुआ और भूल से इसे हिन्दी के अन्तर्गत समझ लिया गया। इसके तीस-चालीस वर्ष बाद कर्नल जेम्स टॉड ने। राजस्थानी का अच्छा परिचय प्राप्त किया, परन्तु उन्होंने राजस्थानी भाषा पर कुछ नहीं लिखा। बीमज् के बाद रामकृष्ण गोपाल भंडारकर और रूडोल्फ ह्योर्नले ने भारतीय भाषाओं के इतिहास विषयक ग्रंथ लिखे परन्तु उनमें भी उन्होंने राजस्थानी की विशेष चर्चा नहीं की। केलॉग ने अपने हिन्दी व्याकरण में राजस्थानी बोलियों में से मारवाड़ी और मेवाड़ी और कहीं-कहीं जयपुरी का कुछ विचार किया। राजस्थानी बोलियों का प्रथम वर्णनात्मक दिग्दर्शन सन् 1907 और 1908 में सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने अपने आधुनिक भारतीय भाषा- विषयक विश्वकोष में किया। डॉ ग्रियर्सन ने ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया' की नौवीं जिल्द के दूसरे भाग में राजस्थानी की पाँच उपभाषाएँ बताई । पश्चिमी, मध्यपूर्वी, उत्तरी-पूर्वी, दक्षिणी-पूर्वी के दो भेद। इनके भी उपभेद डॉ. ग्रियर्सन ने बताए । इनकी खोज से राजस्थानी बोलियों के पारस्परिक सम्बन्ध तथा संयोग के विषय में कुछ स्पष्ट रूपरेखा सामने आई। 'पुरानी पश्चिमी राजस्थानी' (गुजराती और मारवाड़ी का पूर्वरूप) के ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर सन् 1914 से 1916 तक मूल्यवान गवेषणा सम्पूर्ण की। उससे राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति तथा विकास पर अभूतपूर्व प्रकाश पड़ा।

राजस्थानी भाषा बोली के भेद या उपभेद - वर्गीकरण

‘राजस्थानी' नाम से ग्रियर्सन ने भौगोलिक संयोग और कुछ स्थूल विशिष्टताओं के कारण, जिन बोलियों को एकत्र गुंथ दिया, वे सचमुच दो पृथक् शाखाएँ र्थी; एक पूर्व की शाखा, जो पछांही हिन्दी से (बृजभाषा आदि से) ज्यादा सम्बन्ध रखती है, और दूसरी पश्चिम की शाखा, जिसका गुजराती से मौलिक संयोग है।

ग्रियर्सन द्वारा बताई गई पाँच उपभाषाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण पश्चिमी उपभाषा है, जिसे साधारणतया 'मारवाड़ी' कहा जाता है। यह अपने अलग-अलग रूपों में मारवाड़, मेवाड़, पूर्वी सिंध, जैसलमेर, बीकानेर, दक्षिण पंजाब और पुरानी जयपुर स्टेट के उत्तरी- पश्चिमी हिस्से के शेखावाटी क्षेत्र में बोली जाती है। बाकी सभी उपभाषाओं के क्षेत्रफलों का योग करने पर भी अकेली मारवाड़ी का क्षेत्रफल उन सबसे अधिक है।

दूसरी, मध्य-पूर्वी उपभाषा दो मुख्य नामों से जानी जाती है-जयपुरी और हाड़ौती। इनके भी कई भेद हैं। जयपुरी बोली को इनका आदर्श माना जा सकता है। यद्यपि जयपुरी पूर्वी राजस्थान में बोली जाती है परन्तु फिर भी इसका गुजराती से घनिष्ट सम्बन्ध रहा है। मारवाड़ी में इसका पश्चिम स्थित सिंधी से अधिक सम्बन्ध है।

उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी में अलवर, भरतपुर और गुडगाँव की मेवाती तथा दिल्ली के दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम के अहीर प्रदेश की ‘अहीरवाटी' शामिल है। राजस्थानी के इस रूप में मध्य समूह की शुद्धतम प्रतिनिधि पश्चिमी हिन्दी से अधिक साम्य है। कुछ लोगों की तो यहाँ तक मान्यता है कि उत्तर-पूर्वी राजस्थानी कहलाने वाली उपभाषाएँ राजस्थानी की उपभाषाएँ न होकर हिन्दी की उपभाषाएँ कहने योग्य हैं। वास्तविकता यह है कि यह इन दोनों के बीच का एक समूह है। इसका विवेचन विशेष अहमियत नहीं रखता, फिर भी इसे राजस्थानी में रखना उचित है।

दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी की मुख्य उपभाषा ‘मालवी' है। यह मालवा एवं उसके आसपास के प्रदेशों में बोली जाती है। इसके पूर्व में बुन्देली और पश्चिम में गुजराती है। असलियत में यह इन दोनों के बीच की बोली है। इसीलिए इस पर राजस्थानी की छाप उतनी नहीं दिखाई पडती जितनी कि जयपुरी पर दिखाई पड़ती है। दक्षिणी पूर्वी राजस्थानी की दूसरी बोली ‘नीमाडी' है। उद्गम की दृष्टि से यह मालवी का ही एक रूप है। परन्तु यह एक ऐसे पर्वतीय प्रदेश की कई जातियों के मुँह से बोली जाती है जो कि मालवी के बाकी हिस्से से अलग सा पडता है। नीमाडी पर पड़ोस की 'भोली' और 'खानदेशी' का यहाँ तक असर पड़ा है कि वह एक अलग बोली बन जाती है। जिसकी अपनी निजी विशेषताएँ हैं।

डॉ. ग्रियर्सन का वर्गीकरण निम्नलिखित है-

क्रमांक राजस्थानी क्षेत्र बोली
1. पश्चिमी राजस्थानी जोधपुर की खड़ी राजस्थानी इटकी, थल्ठी, बीकानेरी, बागड़ी, शेखावाटी, मेवाड़ी, खैराड़ी, सिरोही की बोलियाँ, गोड़वाड़ी और देवड़ावाटी।
2. उत्तरी-पूर्वी राजस्थानी अहीरवाटी और मेवाती।
3. मध्य-पूर्वी राजस्थानी (ढूंढाड़ी) तोरावाटी, खड़ी जयपुरी, कार्टेडा, राजावाटी, अजमेरी, किसनगढी, चौरासी, नागरचाल, हाड़ौती।
4. दक्षिणी-पूर्वी राजस्थानी या मालवी इसके कई रूप भेद हैं जिनमें रांगड़ी और सोंडवाड़ी प्रमुख है।
5. दक्षिणी राजस्थानी नीमाड़ी।
डॉ. ग्रियर्सन ने 'भीली' और 'खानदेशी' को राजस्थानी से अलग माना है, परन्तु डॉ. सुनीति कुमार चाटुज्य ने व्याकरण की दृष्टि से भीली को राजस्थानी के अधीन रखना उचित माना है। भीली' बोलियों का गुजराती से काफी सादृश्य है, और ‘खानदेशी' बोलियाँ राजस्थानी अथवा गुजराती और मराठी इन दोनों के मिश्रण से उत्पन्न हुई हैं। संभव है कि ये प्राचीन मराठी के ऊपर राजस्थानी के गहरे प्रभाव का फल हो। यह प्रभाव दक्षिण में कोंकणी भाषा तक पहुँचा है- कोंकणी में ऐसी कुछ विशेषताएँ हैं जो राजस्थानी से मिलती हैं मराठी से नहीं। इस तरह राजस्थानी भाषा ने दक्षिण में कोंकणी तक को प्रभावित किया है। इसके अलावा पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमान्त प्रान्त, कश्मीर की गुजरी बोली और तमिलनाडु की सौराष्ट्री भी राजस्थानी के अन्तर्गत आती है।

डॉ. ग्रियर्सन द्वारा स्वीकृत इस वर्गीकरण की एल.पी. तेस्सितोरी ने ऐतिहासिक विचार एवं वैयाकरण दृष्टि से कुछ रद्दोबदल किया है। उनके अनुसार राजस्थान-मालवे की बोलियों को दो ही मुख्य भागों में विभाजित किया जाना चाहिए। ग्रियर्सन की पश्चिमी राजस्थानी और मध्य-पूर्वी राजस्थानी (ढूंढाड़ी) को एक साथ एक वर्ग में लेकर केवल उन्हें ही राजस्थानी' नाम देना ठीक होगा। तेस्सितोरी कहते हैं कि ग्रियर्सन को (1) को पश्चिमी राजस्थानी कहना चाहिए और (2) को पूर्वी राजस्थानी'। बाकी श्रेणियों की भाषाओं को या बोलियों को कितनी दूर तक हम ‘राजस्थानी' में शामिल कर सकते हैं, यह विचारणीय विषय है। अहीरवाटी, मेवाती, मालवी और नीमड़ी-ये पछांही हिन्दी से ज्यादा प्रभावित है या खास राजस्थानी से, इस विषय में निष्कर्षात्मक ढंग से कुछ नहीं कहा जा सकता। राजस्थान की बोलियों पर मध्य प्रदेश की बोली का गहरा प्रभाव बहुत प्राचीनकाल से पडता आया है।

प्रो. नरोत्तम स्वामी राजस्थानी की निम्नलिखित मात्र चार बोलियाँ ही मानते हैं-

  • पश्चिमी राजस्थानी या मारवाड़ी-उदयपुर, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर और शेखावाटी क्षेत्र ।
  • पूर्वी राजस्थानी या ढूंढाड़ी-जयपुर और हाडौती इलाका
  • उत्तरी राजस्थानी-मेवाती और अहीरी बोलियाँ।।
  • दक्षिणी राजस्थानी या मालवी-मालवा और नीमाड़ की बोलियाँ।

डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने राजस्थान की पाँच बोलियों का जिक्र किया है, जिनमें परस्पर विशेष अन्तर नहीं हैं। मात्र अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाने की वजह से इनके अलग-अलग नाम पड़ गए हैं। 

  • ये पाँच बोलियाँ-मारवाड़ी, ढूंढाड़ी, मालवी, मेवाती और वागडी हैं। 
डॉ. मेनारिया ने वागड़ क्षेत्र डूंगरपुर-बाँसवाड़ा के आस-पास की बोली को अलग से एक बोली मानकर अपने वर्गीकरण में शामिल किया है। वागड़ी राजस्थानी की बोली है।

साररूप में राजस्थानी की उपभाषाएँ या बोलियाँ निम्नलिखित हैं-

1. मारवाड़ी

यह राजस्थानी हिन्दी की प्रमुख बोली है। मारवाड़ी का प्राचीन नाम 'मरुभाषा' है। आठवीं सदी के ग्रंथ 'कुवलयमाला' में भारत की 18 देश-भाषाओं में मरुदेश की भाषा का भी उल्लेख है। अबुल फजल ने अपनी पुस्तक 'आइने-अकबरी' में भारत की प्रमुख भाषाओं में मारवाड़ी को भी गिनाया है। विस्तार और साहित्य दोनों दृष्टियों से मारवाड़ी राजस्थानी की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण उपभाषा है। मारवाड़ी सदा से राजस्थानी की साहित्यिक भाषा रही है। मारवाड़ी की 13-14 उप बोलियाँ हैं। ये जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और सिरोही में प्रचलित रही हैं। यही नहीं अजमेर-मेरवाड़ा, किशनगढ़ और पालनपुर के कुछ भागों में, जयपुर के शेखावाटी इलाके में, सिंधु प्रांत के थोड़े अंश और पंजाब के दक्षिण में भी यह उपभाषा बोली जाती है। साहित्यिक मारवाड़ी का शुद्ध रूप जोधपुर और उसके आस-पास के भागों एवं शेखावाटी क्षेत्र में देखने को मिलता है। यह एक ओज-गुण विशिष्ट भाषा है। इसका साहित्य भी काफी बढ़ा-चढ़ा है। इसमें संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश के शब्द विशेष रूप से मिलते हैं। कुछ अरबी-फारसी के शब्द भी इसमें आत्मसात् हो गए हैं। मारवाड़ी की अपनी कई निजी विशेषताएँ हैं। जैसे छंदों में सोरठा और रागों में मांड जितनी अच्छी इस भाषा में रुचती-खिलती है अन्य में नहीं।
  • व्याकरणिक दृष्टि से मारवाड़ी में करण तथा अपादान कारक परसर्गों में हूं, ॐ आदि तथा सम्बन्ध कारक-चिन्हों में मैं, माई, माय आदि परसर्गों का प्रयोग होता है।
  • तुलना-सूचक शब्दों में ‘सँ’, ‘करताँ', का प्रयोग अधिक पाया जाता है।
  • सर्वनामों में रूप वैविध्य पाया जाता है। 
  • उत्तम पुरुष एकवचन (मैं) के लिए म्ह, मू, म्हें आदि सर्वनामों का प्रयोग मिलता है। 
  • इसी प्रकार 'यह' के लिए ओ, यो आदि सर्वनामों का प्रयोग मिलता है।

2. मेवाड़ी

मेवाड़ी दक्षिणी-पूर्व मेवाड़ के भाग को छोड़कर समस्त मेवाड़ और उसके आस-पास के कुछ क्षेत्रों में बोली जाती है। मेवाड़ी का शुद्ध रूप मेवाड़ के गाँवों में देखने को मिलता है। शहरों में इस पर हिन्दी, उर्दू का असर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इसी वजह से इसका मिठास जाता रहा है और यह अटपटी सी लगने लगी है। मेवाड़ी में रचित साहित्य मिलता है। इसकी साहित्यिक परम्परा भी प्राचीन दिखाई पड़ती है। चित्तौड़ के कीर्ति-स्तम्भ' की प्रशस्ति में लिखा है कि महाराणा कुम्भा (स. 1490-1525) ने चार नाटक लिखे, जिनमें मेवाड़ी का भी प्रयोग किया गया। मेवाड़ी में नाटक लिखने का यह सबसे पहला ऐतिहासिक उल्लेख है।

3. ढूंढाड़ी

भूतपूर्व जयपुर रियासत के शेखावाटी क्षेत्र को छोड़कर समस्त जयपुर रियासत क्षेत्र में ढूंढाड़ी बोली जाती है। इस पर गुजराती और मारवाड़ी का प्रभाव समान रूप से मिलता है। साहित्यिक भाषा में ब्रजभाषा की भी कुछ विशेषताएँ देखने को मिलती हैं। ढूंढाड़ी में प्रचुर साहित्य रचा गया है। संत दादू और उनके शिष्यों-प्रशिष्यों की रचनाओं में इस भाषा की झलक है। ढूंढाड़ी में गद्य और पद्य दोनों लिखे गए हैं। ईसाई धर्म-प्रचारकों ने बाइबिल आदि अपने धर्म-ग्रन्थों का अनुवाद ढूंढाड़ी में करके इस भाषा की बढ़ोतरी की।

4. हाड़ौती

ढूंढाड़ी का जो रूप कोटा-बूंदी में प्रचलित है, वह हाड़ौती नाम से जाना जाता है। पड़ोस के झालावाड़ और छबड़ा क्षेत्रों में भी हाड़ौती बोली जाती है। इसमें और ढूंढाड़ी में थोड़ा ही अन्तर है। परन्तु आज हाड़ौती राजस्थानी की स्वतन्त्र उपभाषा बन सामने आई है। ढूंढाड़ी और हाड़ौती में शब्दों की उच्चारण-शैली में थोड़ी भिन्नता है। हाड़ौती में कई ऐसे शब्द देखने को मिलते हैं जिनका सम्बन्ध किसी आर्य या सेमेटिक भाषा से स्थिर नहीं होता। उच्चारण शैली में भी कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो न तो संस्कृत और न ही अरबी-फारसी में मिलती है। इस इलाके पर हाड़ा राजपूतों का आधिपत्य रहा है। इसी वजह से इस उपभाषा का नाम हाड़ौती पड़ा है। डॉ. कन्हैयालाल शर्मा ने हाड़ौती भाषा और साहित्य पर विशिष्ट कार्य कर इसकी भाषागत् एवं साहित्यिक महत्ता को उजागर किया है।

5. मेवाती

मेओ जाती के निवास के कारण इस प्रदेश का नाम मेवात और बोली का नाम मेवाती रहा। मेवाती अलवर-भरतपुर के उत्तरी-पश्चिमी भाग और दिल्ली के दक्षिण में गुड़गाँव में बोली जाती है। इस भाषा के उत्तर में बांगडू, पश्चिम में मारवाड़ी और ढूंढाड़ी, दक्षिणी में डांगी और पूर्व में ब्रजभाषा का प्रचार है। इस पर ब्रजभाषा का प्रभाव बहुत अधिक देखने को मिलता है। इसमें ज्यादा साहित्य नहीं है। चरणदासी पंथ के जन्मदाता चरणदास और उनकी दो शिष्याएँ दयाबाई और सहजोबाई की रचनाएँ इसी भाषा में रची गई हैं परन्तु इस वक्त का साहित्य अब अपने मौलिक रूप में नहीं मिलता। मुद्रकों एवं प्रकाशकों के हाथों इसका रूप विकृत हो गया है।

6. वागड़ी

वागड़ क्षेत्र की भाषा वागड़ी नाम से जानी जाती है। डूंगरपुर और बाँसवाड़ा के संयुक्त क्षेत्र का प्राचीन नाम ‘वागड़' है। इसी वजह से यहाँ की भाषा वागड़ी कहलाती है। यह मेवाड़ के दक्षिणी क्षेत्र और सूथ के उत्तरी भाग में बोली जाती हैं। वागड़ी पर गुजराती का बहुत अधिक प्रभाव हैं। इसके अन्दर 'च' और 'छ' का उच्चारण प्रायः ‘स' और 'स' का उच्चारण प्रायः 'ह' होता है। इसमें भी कुछ साहित्य रचा गया है जो अप्रकाशित हैं। नव लेखन की लहर इस उपभाषा में उठती दिखाई दे रही है।

7. मालवी

मालवी समस्त मालवा की भाषा है। दक्षिण-पूर्वी राजस्थानी से जुड़ा मध्य प्रदेश का क्षेत्र मालवा कहा जाता है। मालवा में प्रतापगढ़, रतलाम, इन्दौर, भोपाल, नीमच, ग्वालियर, उज्जैन, झालावाड़, पूर्वी चित्तौड़ आदि प्रदेश सम्मिलित हैं। बुन्देली और मारवाड़ी के मध्य की बोली होने के कारण यह इन दोनों से प्रभावित है। अपने समस्त क्षेत्र में इसका एक ही रूप देखने को मिलता है। इसमें मारवाड़ी और ढूंढाड़ी दोनों की विशेषताएँ देखने को मिलती हैं, कहीं-कहीं मराठी का असर भी झलकता है। यह एक बहुत ही मधुर और कोमल भाषा है। औरतों के मुँह यह बहुत अच्छी लगती है। मालवा के राजपूतों में इसका एक विशेष रूप प्रचलित है, जिसे 'रांगड़ी' कहा जाता है, परन्तु रांगडी इतनी मधुर और मीठी नहीं है जितनी कि मालवी है। मालवी में ज्यादा साहित्य नहीं लिखा गया। परन्त चन्द्रसखि, नटनागर आदि की रचनाओं में इसका बहुत सुन्दर रूप देखने को मिलता। है। प्राचीन पट्ट-परवानों में भी इसके मौलिक रूप पर अच्छा प्रकाश पड़ता है, इसमें काल को बताने के लिए 'हो', 'ही' के स्थान पर थो’, ‘थी' का प्रयोग होता है। जैसे-“एक मुंजी कै कनै थोड़ो माल थो। वणी नै हुदांई ओ डर लाग्यो रेतो थो के आखी दुनिया रा। चोर नै डाकू म्हाजन धन पर आँख्या लगायां थका है, नीं मालम कदी आई नै वो लूटी होगा" उदाहरण से स्पष्ट है कि 'स' की जगह 'ह', 'लेसी' की जगह लेगा' का प्रयोग इस उपभाषा में होता है।

उपरोक्त उपभाषाओं में रची-बसी राजस्थानी भाषा का समस्त राजस्थान में एकसार रूप था, मुहणोत नैणसी जालोर के निवासी, कविराजा बाँकीदास जोधपुर के रहने वाले, दयालदास ने अपनी ख्यात बीकानेर में बैठकर लिखी और कविराजा सूर्यमल्ल बूंदी के निवासी थे, परन्तु इनके लिखे गद्य में कोई खास फर्क नहीं था। राजस्थानी का एक रूप स्वरूप इनकी भाषाओं में मिलता है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि राजस्थानी एक भाषा है। यह बोलियों का एक समूह मात्र नहीं। जहाँ तक उपभाषाओं या बोलियों का प्रश्न है, हर भाषा में बोलियाँ या उपभाषाएँ हैं जो मिलकर भाषा को समृद्ध बनाती हैं। राजस्थानी की बोलियाँ राजस्थानी भाषा की समृद्धता की परिचायक हैं। राजस्थानी भाषा एक अपनी ही भाषा है।