नाटक - नाटक क्या होता है? और नाटक के अंग

natak kya hai, natak ke ang, pramukh natak

नाटक

इंद्रिय ग्राह्यता के आधार पर साहित्य के दो भेद माने जाते हैं-दृश्य और श्रव्य दृश्य काव्य को पुनः दो भेदों में विभक्त किया जाता है- रूपक तथा उपरूपक।

रूपक की परिभाषा देते हुए कहा गया है ‘तदूपारोपात तु रूपम् ।' वस्तु, नेता तथा रस के तारतम्य वैभिन्य और वैविध्य के आधार पर रूपक के निम्न दस भेद भारतीय आचार्यों ने स्वीकार किए हैं-नाटक, प्रकरण, भाषा, प्रहसन, डिम, व्यायोग, समवकार, वीथी, अंक और ईहामृग ।

परन्तु प्रायः नाटक को ही रूपक की संज्ञा भी दी जाती है। नाटक अर्थात् रूपक को तीनों लोकों के भावों का अनुकरण मानते हुए नाट्यशास्त्र में भरतमुनि लिखते हैं-
नाराभावोपसम्पन्नं नानावस्थान्तरात्मकम् ।
लोकवृत्तानुकरं नाट्यमेतन्मया कृतम्।।

नाटक में अभिनय


धनंजय ने अवस्था के अनुकरण' को नाटक कहा और उसमें आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक चार प्रकार के अभिनय की स्थिति मानी । विश्वनाथ ने कहा कि नाटक की कथा इतिहास प्रसिद्ध होनी चाहिए।

कथावस्तु मुख आदि पाँच संधियों, विलास, ऋद्धि, आदि गुणों तथा अनेक प्रकार के ऐश्वयों से पूर्ण हो, इसकी निबन्धता गौ की पूँछ के अग्रभाग के समान होनी चाहिए। अर्थात् बीज रूप में वर्णित कथा एक क्रम में पुष्पित होकर फल को प्राप्त कराये।

नायक, दिव्य धीरोदात्त तथा उच्च कुल का हो, सुख-दु:ख विषय वर्ण्य सामग्री विभिन्न रसों से सिक्त हो, श्रृंगार अथवा वीर रस में से कोई एक रस अंगी हो। इनमें पाँच से दस अंक हो।

नाटक के अंग 

भारतीय काव्यशास्त्र में वस्तु, नेता, रस को नाटक का आवश्यक अंग माना गया, परन्तु पाश्चात्य विद्वानों ने कथोपकथन, देशकाल, उद्देश्य और शैली को भी प्रर्याप्त महत्त्व दिया। अभिनेयता तो नाटक का आवश्यक तत्त्व है ही।

कथावस्तु 

 वस्तु से तात्पर्य नाटक की कथावस्तु से है। इस कथावस्तु के अधिकारी की दृष्टि से दो भेद किए जाते हैं-आधिकारिक कथा और प्रासंगिक कथा। प्रासंगिक कथा को भी पताका और प्रकरी दो भेदों में विभाजित किया जाता है। अभिनय की दृष्टि से कथाएँ दो प्रकार की होती है -दृश्य और श्रव्य। जो साधन सूच्य वस्तु की सूचना देते हैं उन्हें अर्थोपक्षेपक कहा जाता है, ये पाँच प्रकार के होते हैं-विषकम्भक, प्रवेशक, चूलिका, अंकास्य तथा अंकावतार । संवादों की द्राष्टि से कथा के तीन भेद होते है-सर्व, श्राव्य, अश्राव्य (स्वगत तथा आकाशभाषित) नियत श्राव्य। नियत श्राव्य के भी दो भेद होते हैं-अपवारित तथा जनान्तिक । लोकवृत्त की दृष्टि से कथावस्तु तीन प्रकार की होती है-प्रख्यात, उत्पाद्य और मिश्र।

कथावस्तु के विन्यास के तीन आधार स्वीकार किए गए हैं-कार्यावस्था, अर्थ प्रकृति तथा सन्धि। कार्यावस्थाएँ पाँच होती हैं-प्रारम्भ, प्रयन्त, प्राप्त्याशा, नियताप्ति ओर फलागम। पाश्चात्य विद्वानों ने भी नाटक की पाँच अवस्थाएँ ही स्वीकार की हैं। प्रारम्भ, विकास, चरमसीमा, उतार और अन्त । अर्थ प्रकृतियाँ भी पाँच ही हैं-बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य। कथावस्तु के अंगों को समन्वित करने वाली सन्धियाँ भी आचार्यों ने पाँच ही स्वीकार की हैं। ये हैं-मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श (अवमर्श) तथा निर्वहण।

पात्र 

पात्र नाटक का दूसरा प्रमुख तत्त्व है और फल का अधिकारी पात्र नेता कहलाता है। दशरूपककार के अनुसार नेता को विनीत, मधुर, त्यागी, चतुर, प्रियवादी, लोकप्रिय, वाणी निपुण, उच्चवंश वाला, स्थिर स्वभावा वाला, युवा, बुद्धिमान, उत्साही, प्रज्ञ, कलाविज्ञ, शूर, दृढ़, तेजस्वी, शास्त्रज्ञ और धार्मिक होना चाहिए। नेता अर्थात् नायक को भरतमुनि ने चार प्रकार का माना है-धीरोदात्त, धीरललित, धीर प्रशांत और धीरोदात्त । नायिका भी स्वकीया, परकीया और सामान्य तीन प्रकार की होती है। अन्य पात्रों में पीठमर्द, प्रतिनायक, विदूषक, कंचुकी, प्रतिहार आदि होते हैं। नाटक के कथोपकथनों में प्राय: संक्षिप्तता, रसानुभूति क्षमता, सरलता, औचित्य, सजीवता तथा पात्रानुकूलता का होना अनिवार्य माना गया है। रस दृष्टि से भरतमुनि ने नाटक में शांतरस को छोड़ कर शेष सब रसों का प्रयोक्तव्य माना और श्रृंगार तथा वीर में से किसी एक रस को अंगी और शेष को अंग रूप में प्रयोक्तव्य माना।

नाटक का संकलन

पाश्चात्य विद्वानों ने नाटक में संकलनत्रय की स्थिति को भी अनिवार्य माना है। संकलनत्रय से तात्पर्य है-काल संकलन, स्थल संकलन और कार्य संकलन। भारतीय आचायों ने नाटक में कुछ विशेष प्रसंगों को शास्त्रीय अनुमति देने से इन्कार कर दिया। ये प्रसंग हैं- रंगमंच के लिए असुविधाजनक, जीवन के असामान्य, अरोचक एवं इतिवृत्तात्मक प्रसंग, आतंकप्रद, करुणाजनक अथवा त्रासद प्रसंग जगुप्साद्योतक प्रसंग तथा अश्लील अथवा भारतीय संस्कृति के विपरीत प्रसंग।

हिन्दी साहित्य में नाटकों का प्रारम्भ

हिन्दी साहित्य में नाटकों का प्रारम्भ भारतेन्दु के समय से स्वीकार किया जाता है। भारतेन्दु ने अपने पिता गोपालचंद्र गिरिधरदास कृत नहुष (1857) को हिन्दी का प्रथम नाटक स्वीकार किया है। उन्होंने स्वयं सत्रह मौलिक तथा अनूदित नाटकों की रचना की।

द्विवेदी युग में साहित्य अधिक प्रगति न कर सका। इस काल में रचित नाटकों का महत्त्व मात्र एतिहासिक है ।

छायावाद युग में प्रसाद ने नाटक साहित्य को एक नयी दिशा प्रदान की। इस पर ल में पारसी रंग-मंच के माध्यम से भी अनेक नाटक प्रकाश में आये।

छायावादोत्तर काल में नाट्य साहित्य की रचना पर्याप्त मात्रा में हुई। इस काल में प्रमुख नाटककार हैं- लक्ष्मीनारायण मिश्र, उपेन्द्रनाथ अश्क (अंजो दीदी), विष्णु प्रभाकर (डॉक्टर), जगदीशचंद्र माथुर (कोनार्क), लक्ष्मीनारायण लाल (सुन्दर रस, मादा कैक्टस), मोहन राकेश (आषाढ़ का एक दिन), हरिक्रष्ण प्रेमी, उदयशंकर भट्ट, विनोद रस्तोगी (नया हाथ), नरेश मेहता, सुरेन्द्र वर्मा, ज्ञानदेव अग्निहोत्री (शुतुरमुर्ग) मुद्रा राक्षस आदि।

(देखें सम्पूर्ण सूची - प्रमुख नाटक और नाटककार)

देखे अन्य हिन्दी साहित्य की विधाएँ

नाटकएकांकीउपन्यासकहानीआलोचनानिबन्धसंस्मरणरेखाचित्रआत्मकथाजीवनीडायरीयात्रा व्रत्तरिपोर्ताजकविता