हिन्दी साहित्य की विधाएँ - कविता, गद्य की विधाएँ - विधा

KAVITA KI VIDHAYE, HINDI GADYA KI VIDHAYE - HINDI SAHITYA

विधा

विधा का अर्थ है, किस्म, वर्ग या श्रेणी, अर्थात विविध प्रकार की रचनाओं को उनके गुण, धर्मों के आधार पर अलग करना। साहित्य में विधा शब्द का प्रयोग, एक वर्गकारक के रूप में किया जाता है। विधाएँ अस्पष्ट श्रेणियाँ हैं, इनकी कोई निश्चित सीमा रेखा नहीं होती; इनकी पहचान समय के साथ कुछ मान्यताओं के आधार पर निर्मित की जाती है।

विधाएँ कई तरह के हैं ; उदाहरण के लिए- साहित्य की विधाएँ, कविता की विधाएँ। साहित्य एवं भाषण में विधा शब्द का प्रयोग एक वर्गकारक के रूप में किया जाता है। किन्तु सामान्य रूप से यह किसी भी कला के लिये प्रयुक्त किया जा सकता है।

विधाओं की उपविधाएँ भी होती हैं। उदाहरण के लिये हम कहते हैं कि निबन्ध, गद्य की एक विधा है। विधाएँ अस्पष्ट श्रेणीयाँ हैं और इनकी कोई निश्चित सीमा-रेखा नहीं होती। ये समय के साथ कुछ मान्यताओं के आधार पर इनकी पहचान निर्मित हो जाती है।

हिन्दी साहित्य की विधाएँ

विधाओं में सृजनात्मक तथा विचारात्मक साहित्य दीर्घकाल से निरंतर विद्वानों द्वारा लिखा जा रहा है। प्रमुख साहित्यिक विधाएँ इस प्रकार हैं-

कुछ अन्य हिन्दी साहित्यिक विधाएँ

लघुकथा, प्रहसन (कामेडी), विज्ञान कथा, व्यंग्य, पुस्तक-समीक्षा या पर्यालोचन, साक्षात्कार
  • ललित कला की विधाएँ - चित्रकला (पेंटिंग), फोटोग्राफी।
  • चलचित्र की विधाएं - वॅस्टर्न।
  • कम्प्यूटर खेल की विधाएँ - क्रिया (ऐक्शन), सिमुलेशन, रणनीति (स्ट्रेटेजी), साहसिक यात्रा (ऐडवेंचर), क्रत्रिम बुद्धिमता(Artificial Inteligence) आदि।

संस्मरण एक विधा

संस्मरण को हम पूर्ण स्मृति भी कह सकते हैं। स्मृति का एक सिरा वर्तमान से जुड़ा होता है, तो दूसरा अतीत से; संस्मरण अतीत और वर्तमान का वह सेतु है, जो दोनों किनारे में संवाद स्थापित करता है।

हमारी जिंदगी में कई ऐसे पल होते हैं, जिसे समय की धूल ढ़ँक नहीं सकती है। वह वर्तमान में भी पूर्व की तरह तस्वीर बनकर आँखों के आगे झूलता रहता है, जिसे अंतिम साँस तक हम भूल नहीं पाते हैं। उससे एक संबंध सा बन जाता है। संबंध की यही आत्मीयता और स्मृति की परस्परता ही संस्मरण की रचना-प्रक्रिया का मूल आधार है।

यही कारण है कि रचना में महज सूचना नहीं होती, बल्कि एक जीवंत अस्तित्व होता है। यही वजह है कि संस्मरण, कल्पना कर नहीं लिखा जा सकता, क्योंकि संस्मरण आत्मीयता, प्रत्यक्षता, घटना के आधार पर तैयार होता है।

इसके साथ व्यक्ति का संबंध होता है, जो भराव या खालीपन पैदा करता है, हालांकि संस्मरण एक मिश्रित विधा है, जिसमें निबंध, कहानी, जीवनी, आत्मकथा आदि कई विशेषताएँ संश्लिष्ट हैं। कभी-कभी तो अच्छे ढ़ंग से लिखी कहानियाँ और संस्मरण में अंतर करना मुश्किल हो जाता है, जब कि दोनों अलग विधाएँ हैं।

Kavita ki vidhaye

केवल साहित्य ही नहीं समाज, संस्कृति, साहित्य, भाषा, व्यवसाय एवं अनुवाद से जुडे अधिकतर विधाओं के विकास में अनुवाद का ही योगदान महत्वपूर्ण रहा हैं। Hindi gadya ki vidhayeआज भी आधुनिकता और प्रौद्योगिकी के युग में भी अनुवाद यह भूमिका बखूबि निभा रहा हैं।

हिंदी में नई साहित्यिक विधाओं के विकास में हिंदी अनुवाद की भूमिका किस प्रकार महत्व पूर्ण रही इसे हम केवल अनुवाद की भूमिका को ध्यान में रखते हुए निम्न रुप से देख सकते है। पाश्चात्य सहित्य के विकास के साथ ही हिंदी साहित्य की विधाओं का विकास भी होता गया।
Kavita ki vidhaye इसका एक कारण यह था की इस दौरान अधिकतर जगह अनुवाद की स्त्रोत भाषा अंग्रेजी थी। विश्व के किसी भी साहित्य का अनुवाद पहले अंग्रेजी में होता फिर अंग्रेजी के माध्यम से अन्य भाषा जैसे हिंदी अनुवाद होता था।

हिंदी साहित्य में न केवल पाश्चात्य साहित्य में विकसित साहित्यिक विधाओं का ही विकास हुवा बल्कि भारतीय भाषाओं के साहित्यक विधाओं का भी विकास अनुवाद के माध्यम से हिंदी की साहित्यिक विधाओं में दिखाई दिया । विशेष कर हम उन्हीं विधाओं पर अधिक विचार करेंगे जिसमें अनुवाद का महत्व अधिक रहा। Kavita ki vidhaye जिसमें मुख्य रुप से निम्न विधाओं को प्रमुख रुप से दिखा जाता हैंHindi gadya ki vidhaye।
१.नाटक २.उपन्यास ३.निबंध ४.कहानी ५.संस्मरण ६.आत्मकथा ७.जीवनी ८.समीक्षा ९.इंटरव्यूव साहित्य (साक्षात्कार) १०.यात्रा-साहित्य ११.डायरी-साहित्य १२.रेखाचित्र १३.एकांकी १४.पत्र-साहित्य १५.काव्य आदि।
साहित्यिक विधाओं के विकास पर बारिकी से अनुसंधान कीया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा की हिंदी साहित्य में इन नई साहित्यिक विधाओं के विकास में अनुवाद ने सबसे महत्व पूर्ण भूमिका निभाई हैं। परंतू आज भी अनुवाद को उसके कार्य के अनुसार हिंदी साहित्य में महत्व नहीं दिया जाता फिर भी अनुवाद अपना कार्य निरंतर रुप करता रहेगा। Kavita ki vidhaye

Hindi gadya ki vidhaye

नाटक बाबू रामकृष्ण वर्मा द्वारा ’वीरनार’,’कृष्णाकुमा’ और ’पद्मावत’ इन नाटकों का अनुवाद हुवा। बाबू गोपालराम ने ’ववी’, ’वभ्रुवाह’, ’देशदशा’, ’विद्या विनोद’ और रवींद्र बाबू के ’चित्रांगदा’ का अनुवाद किया, रुपनारायण पांण्डे ने गिरिश बाबू के ’पतिव्रता’ क्षीरोदप्रसाद विद्यावियोद के ’खानजहाँ’ दुर्गादास ताराबाई, इन नाटकों के अनुवाद प्रस्तुत किए।

अंग्रेजी नाटकों के अनुवाद भी इसी कालखंड मे निरंतर रुप से चल रहे थे। जिन में ’रोमियो जूलियट’ का ’प्रेमलिला’ नाम से अनुवाद हुवा। ’ऎज यू लाईक इट’ और ’वेनिस का बैक्पारी’, उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी के भाई मथुरा प्रसाद चौधरी ’ए मौकबेथ’ का ’साहसेंद्र साहस’ के नाम के अनुवाद किया।Hindi gadya ki vidhaye हैमलेट का अनुवाद ’जयंत’ के नाम से निकला जो वास्तव में मराठी अनुवाद से हिंदी मे अनूदित किया गया था, Hindi gadya ki vidhaye.

भारतेंदु हरिश्चंद्र के कालखंड में नाटकों का अधिक अनुवाद हिंदी में दिखाई देता है। विद्यासुंदर (संस्कृत “चौरपंचाशिका” के बंगला-संस्करण का अनुवाद), रत्नाअवली, धनंजय विजय (कांचन कवि कृत संस्कृत नाटक का), कर्पूरमंजरी (सट्टक, के संचन कवि-कृत नाटक का अनुवाद) अगर हिंदी नाटक में भारतेंदु हरिश्चंद्र के कालखंड में किन अनूदित नाटकों ने महत्व पूर्ण कार्य किया तो उसे हम निम्न रुप से देख सकते है। कुछ नाटकों के अनुवाद दो अनुवादकों ने भी किए है Hindi gadya ki vidhaye।