Devanagari Lipi - Font, Script

देवनागरी लिपि का जन्म और विकास

भारत में तीन लिपियों के लेख मिलते हैं- सिन्धु घाटी, खरोष्ठी लिपि तथा ब्राह्मी लिपि । सिन्धु घाटी की लिपि अभी तक पूर्णत: पढ़ी नहीं गयी है। खरोष्ठी लिपि के प्रमाणों में मुख्य रूप से शहबाज गढ़ी तथा मान-सेता में खरोष्ठी के शिलालेख मिले हैं। इन दोनों का ही सम्बन्ध देवनागरी से नहीं है।

ब्राह्मी लिपि (Brahmi Script)

तीसरी लिपि है- ब्राह्मी, 500 ई. पू. से 350 पू. में ब्राह्मी लिपि भारत में प्रायः सर्वत्र ही प्रयुक्त होती रही है। आगे चलकर इसकी दो धाराएँ हो गईं-उत्तरी और दक्षिणी । उत्तरी भारत की चार प्रमुख लिपियों में ही एक का नाम 'प्राचीन देवनागरी है। यह प्राचीन देवनागरी लिपि ब्राह्मी लिपि की उत्तरी धारा के एक रूप 'कुटिल-लिपि' से विकसित मानी जाती है। यह तो केवल ब्राह्मी की लिपियों का वर्णन है। ब्राह्मी तो इससे बहुत प्राचीन होनी चाहिए।

प्राचीन नागरी लिपि

ब्राह्मी लिपि की उत्तरी धारा की एक लिपि कुटिल लिपि से विकसित प्राचीन देवनागरी का प्रचार उत्तरी भारत में रहा है। इस लिपि का उद्भव 700 ई. के आसपास माना जाता है। आवागमन के कारण यह प्राचीन नागरी लिपि दक्षिण में भी गयी, जहाँ इसे, ‘नन्दि नागरी' के नाम से जाना जाता था। इसका एक अन्य नाम 'ग्रन्थम् लिपि' भी है। वैसे दक्षिण में इसका प्रचार सोलहवीं सदी तक मिलता है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश आदि के शिलालेख इसी प्राचीन नागरी में उत्कीर्ण मिलते हैं। नवीं से बारहवीं शताब्दी तक तो यही प्राचीन नागरी लिपि प्रचलन में थी। बारहवीं शताब्दी से वर्तमान नागरी लिपि या देव नागरी लिपि का प्रचार बढ़ा।

वर्तमान नागरी लिपि का उद्भव (Devanagari)

वर्तमान देवनागरी लिपि और नागरी लिपि एक ही है। इसकी प्राचीनता तथा इसके विकास के विषय में महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द्र ओझा ने 'भारतीय प्राचीन लिपि' नामक ग्रन्थ में लिखा है-
"दसवीं शताब्दी के उत्तरी भारत की नागरी लिपि में कुटिल लिपि के अ, आ, घ, प, य, ष और स के सिर के दो अंशों में विभक्त मिलते हैं, परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी की वर्तमान नागरी से मिलती-जुलती है और बारहवीं शताब्दी से वर्तमान नागरी बन गयी। बारहवीं शताब्दी से लगातार अब तक नागरी लिपि बहुधा एक ही रूप में चली आ रही है।"
ओझा के इस लेख से स्पष्ट है कि वर्तमान देवनागरी लिपि या नागरी लिपि का उद्भव 1200 ई. के लगभग हुआ, जबकि प्राचीन नागरी लिपि 800 ई. के बाद से 1200 तक रही है।

नागरी या देवनागरी लिपि का विकास

इस लिपि के अनेक प्रमाण 700 ई. के बाद से मिलने लगते हैं। यद्यपि है यह प्राचीन नागरी लिपि, फिर भी देवनागरी के विकास में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

इसका प्रथम प्रयोग गुजरात के राजा 'जय भट्ट' (800 ई. के लगभग) के एक शिलालेख में हुआ है। इसके बाद राष्ट्रकूट नरेशों के कुछ शिलालेखों से पता लगता है कि उसके राज्य में भी ‘नागरी लिपि' का प्रचार था। उधर दक्षिण में विजय नगर राज्य तथा कोंकण (बम्बई) में भी इसी लिपि का प्रयोग होता था। इस दक्षिणी प्रमाणों के आधार पर कुछ विद्वानों का मत है कि 'नागरी' का आरम्भ दक्षिण में हुआ है। इतना होने पर भी यह लिपि मुख्यत: उत्तर भारत की लिपि मानी जाती है।

गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश में जितने भी हस्तलेख, ताम्र पत्र व शिलालेख मिले हैं, वे अधिकतर नागरी लिपि में ही हैं। यह लिपि आजकल हिन्दी (उप बोलियों-बोलियों सहित), संस्कृत, मराठी और नेपाली के लिये प्रयुक्त होती है। महाराष्ट्र में इसे 'नागरी' न कहकर 'बाल बोध' कहते हैं। इसी बाल-बोध नागरी के अ, छ, झ, न और प्र (र) वर्ण अल्प देवनागरी ने भी अपना लिये हैं।

आरम्भ में देवनागरी के वर्षों पर शिरोरेखा नहीं लगाते थे। इसी प्रकार अ, घ, म, य, ष और 'स' के सिर दो भागों में बँटे हुए थे। बारहवीं शताब्दी से वर्तमान देवनागरी वर्गों का लेखन देखा जाये तो पता लगेगा कि इस लिपि को सुन्दर बनाने का प्रयास आज तक हो रहा है। इसीलिए आज यह सुन्दर लिपियों में मानी जाती है। छापाखाने ने तो इसके अनेक सुन्दर आकार बनाये हैं।

देव नागरी का प्रभाव

देवनागरी के स्वरूप पर आधुनिककाल की अनेक लिपियों का प्रभाव पड़ा है। मुख्यत: फारसी, बंगला, मराठी, गुजराती और अंग्रेजी लिपियों का प्रभाव अनेक रूपों में दिखाई देता है। फारसी का न केवल लेखन पर प्रभाव पड़ा है, वरन् उससे कुछ नई ध्वनियाँ भी हिन्दी में आ गईं। इन ध्वनियों के लेखन के लिये नागरी में वर्ण के नीचे बिन्दु लगाने री व्यवस्था की गयी जिससे अलगाव हो सके। यथा-क़, ख, ग, ज, फ़, ड, ढ़ आदि का लेखन फारसी के अलगाव के लिए ही है। यह बिन्दु फारसी लिपि की देन है। मिलाकर व घसीटकर लिखने की प्रथा भी फारसी के कारण नागरी में है।

बंगला लिपि

बंगला लिपि भी यद्यपि नागरी लिपि से विकसित मानी जाती है, पर इसके चौकोर लेखन का प्रभाव नागरी पर पड़ा है। गुजराती लिपि भी नागरी लिपि का एक रूप है पर, यह शिरो रेखा सहित लिखी जाती है। हिन्दी लेखन में भी कुछ लोग शिरो रेखा रहित देव नागरी का प्रयोग करते हैं। यह गुजराती प्रभाव है।

मराठी लिपि का प्रभाव

मराठी प्रभाव के कारण अ और झ के दूसरे रूप अ और झ भी नागरी में आ गये। अंग्रेजी लिपि का भी नागरी पर प्रभाव पड़ रहा है। इसी कारण अंग्रेजी 'ओ' के लिये 'आ' की मात्रा पर अर्ध चन्द्र जैसा चिह्न लगाते हैं, यथा-कॉलेज। अंग्रेजी के सभी विरामादि चिह्न (पूर्ण विराम के बिन्दु को छोड़कर) नागरी में आ गये हैं। अंग्रेजी के भाषा के वैज्ञानिक ध्वन्यात्मक चिह्न भी नागरी में आए हैं, जो भाषा-विज्ञान के ग्रन्थों में मिलते हैं।

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता

देवनागरी लिपि में जहाँ वैज्ञानिक दृष्टि से अनेक त्रुटियाँ हैं, वहीं उसमें वैज्ञानिकता भी है। उपर्युक्त वैज्ञानिक त्रुटियों की ओर देखें तो उनमें एक त्रुटि ऐसी जो देवनागरी से अनिवार्य रूप से जुड़ी है। वह है, इसकी आक्षरिकता। पर यही आक्षरिकता देवनागरी लिपि का विशेष गुण है। क्योंकि इससे शब्दोच्चारण व लेखन में समानता बनी रहती है।
  • आक्षरिकता-वैज्ञानिक दृष्टि से आक्षरिकता उच्चारण व लेखन में एकता स्थापित करती है। अत: यह दुर्गण न होकर गुण है। उच्चारण में हम सामाजिक वर्ण का उच्चारण करते हैं, न कि स्वर और व्यंजन का अलग-अलग उच्चारण । यथा-‘रा' को हम ‘रा' ही बोलते हैं, न कि र् + अ।
  • पूर्ण ध्वनित्व-देवनागरी में 4-5 ही ध्वनियों के लिपि चिन्ह नहीं हैं। इसका कारण यह है कि इन ध्वनियों का उच्चारण ही संयुक्त ध्वनियों की तरह है। यथा-न्ह, ल्ह, म्ह आदि। अत: ध्वनियों की संख्या बढ़ाने की अपेक्षा उन्हें संयुक्त रूप से लिखना ही उचित समझा गया। कहा जा सकता है कि देव नागरी में सभी ध्वनियों के लिये चिन्ह हैं।
  • एक चिह्नता-देव नागरी में 3-4 लिपि चिन्हों को छोड़कर प्रायः सबके लिये एक ही चिन्ह है। जहाँ दो लिपि चिन्ह हैं, वह अन्य लिपियों का प्रभाव है।
  • मात्रा प्रयोग-देव नागरी लिपि पर सबसे बड़ा आरोप मात्राओं का है। इसमें मात्राएँ वर्ण के चारों ओर लिखी जाती हैं। वस्तुत: छोटी 'ई' की मात्रा को छोड़कर अन्य सभी मात्राएँ जिह्वा की स्थिति के अनुरूप, ऊपर-नीचे तथा सामने या आगे हैं। अतः ये भी वैज्ञानिक हैं।
  • भ्रामक चिन्ह-नागरी के तीन-चार लिपि चिन्ह स्वल्प-सा भ्रम पैदा करते हैं। वस्तुत: लिपि सीखने की वस्तु है। सीखने से उसमें कोई भ्रम नहीं रहता। कोई भी व्यक्ति 'भ्रम' को ‘भम्र' नहीं पढ़ लेता। हाँ 'ख' तथा आधा ण् अवश्य भ्रामक हैं। अब 'ख' का समाधान नीचे के हिस्सों को मिलाकर तथा 'ण' के स्थान र 'ण' का प्रयोग अपनाकर कर दिया गया है।
  • देवनागरी वर्गीकृत लिपि-देवनागरी लिपि होने से संसार में सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। इसमें पहले समस्त स्वर फिर समस्त व्यंजन हैं। इसमें भी उच्चारण व प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण पूर्ण वैज्ञानिक है।
  • ध्वनि और उच्चारण-देव नागरी लिपि के चिन्हों के नाम ध्वनि एवं उसके उच्चारण के अनुरूप होने से पूर्ण वैज्ञानिक हैं। फारसी में अलिफ से 'अ', बे से 'ब', पे से 'प' तथा अंग्रेजी में बी से 'ब', डब्ल्यू से 'व' आदि बनते हैं, पर देव नागरी में 'अ' से अ, 'ब' से 'ब' आदि ही लिखा व समझा जाता है। (8) एक चिन्ह-एक ध्वनि-देवनागरी में एक लिपि चिन्ह से एक ही ध्वनि बनती है, जो पूर्णत: वैज्ञानिक है। रोमन लिपि में आधे से अधिक ध्वनियाँ दो-दो या अधिक ध्वनियों से बनती हैं। BH से भ, CHH से छ आदि ऐसे ही उदाहरण हैं।
  • देवनागरी ही ऐसी लिपि है, जिसमें हस्व तथा दीर्घ स्वरों के लिए अलग-अलग लिपि चिन्ह हैं।
  • जैसा लिखा जाता है वैसा पढ़ा जाता है-देव नागरी लिपि में जिस स्वर को या मात्रा को जैसा लिखा जायेगा, वैसा ही सर्वदा बोला जायेगा, पर रोमन के PUT को पट और। BUT को बट बोला जाता है। ध्वनियाँ एक होने पर भी उच्चारण भिन्न है। 
  • फारसी में यही निर्णय नहीं है कि मात्राओं को क्या पढ़ा जाय। कोई ‘बुलन्द' पढ़ता है तो कोई ‘बलन्द'। अत: सु- पाठ्यता देवनागरी का सबसे बड़ा वैज्ञानिक गुण है। इसमें जो लिखा जाता है, वही पढ़ा जाता है। इस प्रकार देव नागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है।

देवनागरी के गुण व विशेषताएँ

डॉ. द्वारिका प्रसाद सक्सेना के अनुसार, देवनागरी पर्याप्त काल से भारतीय आर्य भाषाओं की लिपि रही है और आज भी हिन्दी, मराठी, नेपाली तथा समस्त हिन्दी बोलियों की यही लिपि है। भारत के संविधान ने जब से हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया है, तभी से देवनागरी को राष्ट्रीय लिपि का महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किया गया है। यह लिपि संस्कृत भाषा की भी एकमात्र लिपि है। सम्पूर्ण संस्कृत वाङ्मय इसी लिपि में लिखित मिलता है।

देवनागरी लिपि के गुण

देवनागरी में अनेक गुण हैं। इसके कारण उत्तर भारत की अधिकांश भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं। इसके गुण निम्नांकित हैं-

  • इसके स्वर तथा व्यंजन वैज्ञानिक रीति से क्रमबद्ध रूप में हैं। इसमें 14 स्वर तथा 33 व्यंजन प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त क्ष, त्र, ज्ञ संयुक्ताक्षर भी इसमें गिने जाते हैं। 
  • यह लचीली प्रकृति की है, इसलिए इसने फारसी की क़, ख, ग, ज, फ़ को अपना लिया है। अंग्रेजी की 'ओ' ध्वनि के लिए अर्ध चन्द्र का प्रयोग भी स्वीकार कर लिया है।
  • यह लिपि वर्णोच्चारणात्मक है, अर्थात् जिस वर्ण या अक्षर का जैसा उच्चारण होता है, वैसा ही लेखन होता है। क, ख, ग आदि जैसे बोले जाते हैं, वैसे ही लिखे जाते हैं। इसके विपरीत अंग्रेजी और फारसी में बोलते कुछ हैं और लिखते कुछ हैं। यथा-अंग्रेजी में बोलते व लिखते 'डब्ल्यू' हैं और मानते 'व' है। पारसी में बोलते ‘अलिफ' हैं, पर मानते 'अ' हैं।
  • इसका प्रत्येक वर्ण, उच्चारण, प्रयोग और लेखन में एक ही सा रहता है, जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। अंग्रेजी में 'G' से 'ज' तथा 'ग' दोनों बनते हैं। 'c' से स, क तथा च बनते हैं। देवनागरी में ऐसा कहीं नहीं है।
  • देवनागरी में स्वरों की मात्राएँ भी हैं। इससे उच्चारण और लेखनगत एकता बनी रहती है। हम बोलते ‘ती हैं, पर यदि उसे ‘त + ई' लिखें तो उसके उच्चारण में अन्तर पड़ेगा। अंग्रेजी में मात्राएँ न होने से स्वरों को ही व्यंजन के बाद लिखना पड़ता है जिससे उच्चारणगत अवैज्ञानिकता आती है।
  • इसमें संयुक्ताक्षरों को मिलाकर लिखने की अद्भुत विशेषता है। इससे भी उच्चारण व लेखनगत एकता बनी रहती है। लेख को देखकर ही बताया जा सकता है कि यह संयुक्ताक्षर है, पर अंग्रेजी में सारे संयुक्ताक्षर भी अलग-अलग लिखे जाते हैं, जिससे लेखन संयुक्तता की हानि होती है। अंग्रेजी में पंक्ति के लिये 'क्यू' शब्द है। इसे नागरी में लिखने पर देखते ही पता लग जाता है कि यह क् + य् + ऊ का संयुक्त रूप है पर अंग्रेजी में इसे लिखते हैं UF-uf-स्पष्ट ही ऐसा अन्तर नागरी में नहीं है।
  • देवनागरी लिपि में शब्द को भी लिखें तो वह उच्चारण के अनुरूप ही लिया जायेगा, पर यदि रोमन लिपि में हिन्दी शब्द को लिखें तो उसके अनेक उच्चारण होंगे, यथा- चालक को Chalak लिखने पर इसे चालक, चालाक, चलाक पढ़ा जा सकता है। इस प्रकार इसके तीन अर्थ हो जायेंगे।
  • इस लिपि में स्थान कम से कम घिरता है। इसके विपरीत अंग्रेजी शब्द में अनेक अनुच्चारित ध्वनियाँ भी लिखनी पड़ती हैं, जैसे Light में gh अनावश्यक रूप से लिखना पड़ता 
  • इस लिपि में प्राय: सभी ध्वनियाँ हैं, पर रोमन लिपि में दो-दो या अधिक ध्वनियों से भी अनेक ध्वनियाँ है, यथा-हिन्दी 'छ' के लिये 'Chh' तीन ध्वनियाँ हैं। अंग्रेजी में सभी महाप्राण ध्वनियाँ 'H' के संयोग से बनती हैं।
  • नागरी लिपि में जितना लिखा जायेगा, उतना ही बोला जायेगा। उधर रोम में अनावश्यक रूप से अनेक अनुच्चारित ध्वनियों का भी लेखन होता है। 'नॉलेज' में तीन व्यंजन हैं, पर लेखन में Knowledge के पाँच व्यंजन हैं।
  • नागरी की सभी ध्वनियों का उच्चारण सदा और सर्वत्र एक सा रहता है। 'राम' व 'काम' का उच्चारण कहीं नहीं बदलता है। पर अंग्रेजी की सारी ध्वनियों का उच्चारण अनिश्चित है। But तथा Put के लेखन में कोई अन्तर नहीं है, पर एक का उच्चारण 'बट' है तो दूसरे का ‘पुट'।
  • देव नागरी के स्वरों में ह्रस्वता तथा दीर्घता के लेखन में तनिक-सा अन्तर कर देने से उनकी लेखनगत एकता बनी रहती है। इ, ई, उ, ऊ, अ, आ में बिल्कुल साम्य है, पर रोमन लिपि में दो स्वरों को मिलाकर लिखने से दीर्घता प्रकट होती है, उधर दो स्वरों का भी निर्णय नहीं। यथा 'ई' के लिये ही ‘EA' लिखा जाता है।
  • देवनागरी लिपि आक्षरिक है, अर्थात् इसमें व्यंजन व स्वर का संयोग रहता है। रोमन आदि अनाक्षरिक हैं। अतः इनमें व्यंजन और स्वर का लेखन अलग-अलग होता है।

देवनागरी लिपि के दोष

देव नागरी लिपि में जहाँ अनेक गुण हैं, वहाँ उसमें दोष भी पर्याप्त मात्रा में हैं। ये । निनलिखित हैं-

  • यदि नागरी में मात्राओं का प्रयोग एक गुण है, तो वह लेखन की दृष्टि से दोष भी है। इसकी मात्राएँ सामने, ऊपर, नीचे व पहले अर्थात् चारों ओर लगती हैं। छोटी 'इ' की मात्रा पहले 'आ' व 'ई' की मात्रा सामने 'उ ऊ' की मात्राएँ नीचे, 'ए व ऐ' की मात्राएँ ऊपर तथा ‘ओ-औ' की मात्राएँ सामने और ऊपर लगती हैं।
  • इन मात्राओं में सर्वाधिक विवादास्पद मात्रा 'इ' की है, यह वर्ण से पहले लिखा जाती है पर इसका उच्चारण वर्ण के बाद होता है। नियमानसार 'ई' की मात्रा भी बाद में होना चाहिए। प्रत्यक्ष देखने में 'ि+ क = कि' है, जबकि यह 'क + 'ि' है।
  • इसमें कुछ ध्वनियाँ ऐसी हैं, जिनके दो या अधिक रूप हैं। यथा-दो या अधिक रूप वाले चिह्न हैं -दो चिह- झ - झ, ण, रा. अ प्र, तीन चिह्न - श-ष-स, सर्वाधिक विवाद र का है। इसके चार रूप हैं या चिह्न हैं- (राम) ,  र्र (= अर्क), ℷ  (प्रकाश), और, ट्र (ट्र) अर्थात् 'र' ऊपर-नीचे और बीच में विभिन्न रूपों में लिखा जाता है। यह एक भारी दोष है। ये चारों ही आवश्यक रूप से लिखे जा रहे हैं।
  • संयुक्त व्यंजनों के लेख में एकरूपता का अभाव भी नागरी लिपि में है। कुछ संयुक्ताक्षर एक अलग लिपि चिह्न ही रखते हैं, यथा-क्त, छ, क्ष, त्र, ज्ञ आदि। कुछ वर्ण में से पाई या खड़ी लकीर हटा दी जाती है और उसमें अगला वर्ण जोड़ दिया जाता है। यथा - गुप्त, ख्यात आदि, कुछ में हलन्त का चिह्न लगाकर अलग वर्ण लिख देते हैं। यथा-'प्राकट्य'। कुछ में ऊपर-नीचे लिखने की प्रथा है, यथा-भट्टा, बट्टा, भद्दा, गड्ढ़ा आदि। कुछ में यह पता ही नहीं चलता कि हल व्यंजन कौनसा है, यथा-'आम्र' में देखने में। 'म' पूरा व 'र' आधा लगता है, पर उल्टा अर्थात् 'म' आधा है और 'र' पूरा है।'य' का संयोग कुछ में बीच से मुड़कर ही हो जाता है, यथा-'प्राकट्य' आदि। 'क' में अगले मोड़ का नीचे का हिस्सा हटा दिया जाता है यथा-क्या।
  • इस लिपि के अक्षरात्मक होने से इसके ध्वनि शास्त्रीय अध्ययन में कठिनाई आती । है, यथा- कर्म में क + अ + र + म + अ ये पाँच ध्वनियाँ हैं, पर देखने में तीन ही दिखती हैं।
  • इसमें 'ख' का लेखन त्रुटिपूर्ण है। इसे र + व भी पढ़ा जा सकता है।'रवाना' को ‘खाना' पढ़ा जा सकता है, इसी प्रकार पुराण ‘ा' भी त्रुटिपूर्ण है। इसमें र में दो मात्रायें होने का आभास मिलता है। यदि इसे हल् रूप में लिखा जाये तो इसका रूप‘रा' होगा जो र + अ का भ्रम पैदा करता है।
  • इस लिपि में अखिल भारतीय बनने की क्षमता नहीं है, क्योंकि अन्य भाषाओं की कुछ ध्वनियों के लिए समानान्तर चिह्न नहीं हैं।
  • शिरो रेखा के कारण 'भ' लिखने में जरा सी असावधानी हो जाये तो यह 'म' बन जाता है। यही स्थिति 'ध' की भी है, 'घ' बन सकता है।
  • इसमें कुछ संयुक्त व्यंजन स्वतंत्र अक्षर बन गये हैं-यथा-क्ष, त्र, ज्ञ, द्य, श्रृ, चे आदि। इससे 'क्ष' और 'ज्ञ' के उच्चारण भी बदल गये हैं। 'क्ष' वस्तुतः क् + ष + अ = क्ष है। और 'ज्ञ' वस्तुत: ज् + व् + अ = ज्व है।
  • इसके कुछ अंक भी दो प्रकार के हैं-यथा- ५-4, ६-३, ६-८, ३-0 आदि।
इस प्रकार देवनागरी लिपि में अनेक दोष हैं।

देवनागरी लिपि के दोष-निराकरण या संशोधन या सुधार

आज के वैज्ञानिक युग में आवश्यकता तो इस बात की थी कि विज्ञान आगे बढ़कर लिपि चिन्हों की अवैज्ञानिकता को दूर करता, पर अंग्रेजी के टाइपराइटरों तथा अंग्रेजी भाषा की प्राथमिक स्थिति के कारण यह सम्भव नहीं हुआ। हाँ, यह अवश्य हुआ कि इसकी त्रुटियों को सुधारने एवं नये सुझावों के लिए अनेक सरकारी और गैर सरकारी प्रयत्न किये गये। इन प्रयत्नों में सफलता प्रायः ही हाथ नहीं लगी। आगे सुधारों के इतिहास पर प्रकाश डाला जा रहा है-
  • सर्वप्रथम महादेव गोविन्द रानाडे आदि महाराष्ट्रीय विद्वानों ने एक लिपि सुधार- समिति 'महाराष्ट्र साहित्य परिषद' की स्थापना की। इसने कुछ प्रस्ताव पारित किये। बाद में लोकमान्य तिलक ने 1904 से 1924 तक प्रयत्न करके 190 टाइपों का एक फॉण्ट(Font) बनाया। इसमें अनेक लिपि-चिन्ह छोड़ दिये गये। यह Font 'तिलक टाइप' (Tilak Type - Font) कहलाता है।
  • इसके बाद कुछ राष्ट्रीय नेताओं ने भी प्रयत्न किये। इनमें वीर सावरकर, महात्मा गॉधी, काका कालेलकर व विनोबा भावे का नाम आता है। काका काले कर ने सुझाव दिया कि 
    • 'अ' लिपि चिन्ह को छोड़कर इ, ई आदि सारे स्वर-लिपि चिन्ह हटा दिये जाएँ और उनके स्थान पर 'अ' में समस्त मात्राएँ लगा दी जाएँ। इसमें 14-15 लिपि चिन्ह हट जाने से छापाखाने को सुविधा होगी। ये हैं-आ, अि, आ, अ, अ, ओ, , ओ, औ, अं, अ:, अ आदि। 
    • संयुक्ताक्षरों के लिखने के प्रयोगों का भी सुझाव दिया। गाँधीजी और विनोबा भावे ने रचनाओं और पत्रिकाओं के लिए स्वीकार किया। गुजराती से इसी क्रम में शिरो रेखा' भी दी। आज हिन्दी को भी लोग शिरो रेखा रहित लिखते हैं, यथा- राम घर गया।
  • बाबू श्याम सुन्दर दास ने सुझाव दिया कि पाँचों अनुनासिक हल व्यंजनों के संयो के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग करना चाहिए। यथा-अङ्क = अंक, चिन्ता = चिंता, चञ्चल = चंचल आदि। आज हिन्दी में यह सुझाव पर्याप्त रूप से स्वीकृत हैं। इससे भी छापाखाने के सहायता मिली।
  • डॉ. गोरख प्रसाद का सुझाव था कि सभी मात्राएँ आगे दाहिनी ओर ही लगाई जाएँ-ऊपर, नीचे, पहले नहीं। यह प्रस्ताव किसी को मान्य नहीं हुआ।
  • श्री निवास दास नामक काशी के एक विद्वान् का सुझाव था कि सभी महाप्राण ध्वनियों-ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, ध, फ, भ के चिन्हों को हटा देना चाहिए और इनके लिये अल्प प्राण ध्वनियों को देना कोई बिन्दु आदि चिन्ह लगा देना चाहिए। यह सुझाव अप्रयुक्त रहा।
  • डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने तो देव नागरी के स्थान पर रोमन लिपि को अपनाने का सुझाव दिया, जो किसी ने नहीं माना।
  • हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने एक लिपि सुधार समिति बनाई और उसने 5 अक्टूबर 1941 की बैठक में कुछ सुझाव रखे। ये सुझाव हैं-
    • उ, ऊ, ए, ऐ की मात्राओं, अनुस्वार तथा रेफ (र) को अक्षर के ठीक ऊपर या नीचे न रखकर थोड़ा-सा आगे रख कर लिखना चाहिए। यथा-'कु' न लिखकर ‘क' लिखना चाहिए। अन्य लेखन यों थे-क, क, , क' आदि। कर्म ऐसे लिखना था- ‘क’ म'।
    • 'इ' की मात्रा को भी पहले न लगाकर बाद में बड़ी 'ई' की मात्रा की तरह लगाया जाय। इनमें अन्तर के लिए खड़ी पाई को नीचे मोड़ा जाय। छोटी 'इ' की मात्रा को भीतर की ओर तथा बड़ी 'ई' की मात्रा को बाहर की ओर मोड़ा जाय। यथा- 'ि= 'ि   ी =  ी
    • संयुक्ताक्षरों में आधे अक्षर को आधार और पूरे अक्षर को पूरा लिखना चाहिए। यथा-प्रेम = पेम, भ्रम = भ्रम, त्रुटि = लुटि, श्रम = श्रम आदि।
    • काका कालेलकर के अनुसार इस समिति ने भी सुझाव दिया कि 'अ' में सभी मात्राएँ लगायी जाएँ।

इस समिति के बाद 1947 ई. में उत्तर प्रदेश सरकार ने आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में एक समिति बनाई। उसने निम्नांकित सुझाव दिये-

  • 'अ' की बारहखड़ी (अ आ, इ ई आदि) भ्रामक हैं।
  • छोटी 'इ' की मात्रा को वर्ण के आगे छोटे रूप में  ी अर्थात् बड़ी ई की मात्रा की पाई आधे रूप में लिखी जाय।
  • मात्राएँ तथा स्थान रखे जाएँ, पर उन्हें थोड़ा दाहिनी ओर हटाकर लिखा जाय।
  • अनुनासिक पंचम वर्ण (ङ, ज, ण, न, म) के संयुक्ताक्षरों में अनुस्वार का प्रयोग किया जाय।
  • द्विविध अर्थों में से निम्नांकित अ, झ, ध, भ, क्ष, त्र, ज्ञ, श्र, द्य आदि को हटाकर इसके स्थान पर क्रमश: अ, ध, भ, प्र, क्व, त्र, श्र, य को मान्यता दी जाये।
  • पाई जाने वाली (ग, घ, च, ज आदि) व्यंजनों को छोड़कर संयुक्तता में 'हल्’ चिन्ह लगाया जाय। यथा-झ्य, झ्य, द आदि।
  • 'ख' को नीचे की ओर मिलाकर लिखा जाय, यथा-'ख' = ख।
  • ('ल' को वर्णमाला में स्थान दिया जाय।

इन सुझावों पर 1953 में विचार किया गया और कुछ संशोधन के साथ इसे स्वीकृत कर लिया गया

इन सुझावों में छोटी 'इ' की मात्रा को आगे लिखने तथा उसे छोटी करने का बड़ा विरोध हुआ। अत: इस सुझाव को भी छोड़ दिया गया। इसके अनुसार उत्तर प्रदेश में प्राथमिक कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकें भी छपीं, पर इन सुझावों पर जनता ने कोई अमल नहीं किया।
1953 में ही डॉ. राधा कृष्णन की अध्यक्षता में एक परिषद् की बैठक लखनऊ में हुई। इसने कुछ मिलते-जुलते सुझाव दिये। ये हैं-
  • छोटी 'इ' की मात्रा 'ि' के आगे लिखा जाय तथा उसकी पाई का आधार आधा कर दिया जाय। यथा- ी'।
  • ख, घ, भ, छ के निम्न चिन्ह स्वीकृत हुए-ख, ध, भ, छ।
  • संयुक्ताक्षरों के क्ष, त्र, श्र, क्त के वर्तमान चिन्हों को छोड़कर इनके स्थान पर क्व, र, श्र, क्र आदि लिखा जाय।
इस प्रकार देव नागरी लिपि में सुधार के लिए सन् 1953 तक बराबर प्रयत्न हुए और सुझाव भी दिये गये, पर इनमें 90% सुझावों पर व्यवहार नहीं हुआ। जन-शक्ति के समक्ष ये सुझाव अव्यावहारिक होकर अमान्य हो गये।

सुझावों से सहमति या विमति

जहाँ तक इन सुझावों के प्रयोग पर सहमति या असहमति का प्रश्न है, वहाँ तक कहा जा सकता है कि यह प्रश्न विशुद्ध वैज्ञानिक न होकर भावात्मक भी है। ऊपर जो सुझाव दिये गये थे वे छापाखाने एवं टाइपराइटर की सुविधा के लिए थे। इन सुधारों के सुझाव के समय यह ध्यान बिल्कुल नहीं रखा गया कि इस लिपि सुधार से भाषा की दुर्गति हो जायेगी। इसमें छापेखाने की छपाई में शुद्धता भले ही बनी रहे, पत्र लेखन में इतनी कठिनाइयाँ आतीं कि भाषा की शुद्धता को बनाये रखना ही कठिन काम था।
उदाहरणार्थ-'इ' की मात्रा को आगे लगाने का परिणाम यह होता है कि दोनों पा कालान्तर में एक हो जातीं, कोई भेद नहीं रहता, यह तो एक उदाहरण है। अन्य सुधारों में ऐसा ही होता है। इसीलिये जन सामान्य ने 90 प्रतिशत सुधारों को अमान्य कर दिया। अत: भी इन सुधार सुझावों से असहमत हैं।

नागरी लिपि का मानकीकरण

नागरी लिपि का प्रयोग हिन्दी में तो होता ही है, मराठी तथा नेपाल वाले भी इसका प्रयोग करते हैं। इसे मानक रूप देने की दिशा में कई व्यक्तियों तथा संस्थाओं ने काम किए हैं किन्तु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण काम केंद्रीय हिन्दी निदेशालय का है जिसने अखिल भारतीय स्तर पर विद्वानों से विचार करके सभी भारतीय भाषाओं की लिपि के रूप में उसमें कुछ नए चिह्न भी जोड़े हैं तथा उसे मानक रूप भी दिया है। जहाँ तक नागरी के मानकीकरण का सम्बन्ध है आगे दिए गए अक्षरों के दो-दो रूप हैं जिनमें से एक-एक अलग दिए गए। अक्षर अब मानक माने जाते हैं तथा काफी लोग इन्हीं का प्रयोग कर रहे हैं।