भारतीय आर्य भाषा परिवार - भारोपीय भाषा परिवार

भारतीय आर्य भाषा परिवार

भारत-यूरोपीय भाषा या भारोपीय भाषा - यह भाषा परिवार विश्व का एक अत्यंत विशाल भाषा परिवार है। यूरोपीय भाषा परिवार की भारतीय शाखा को भारतीय आर्य भाषा शाखा के नाम से भी जाना जाता है। इसका प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है। इसी से हिन्दी भाषा और अन्य भारतीय भाषाओं का विकास हुआ। वैदिक संस्कृत से आधुनिक युग की भारतीय तक आने में इसे निम्न चार चरणों में होकर गुजरना पड़ा।
  1. वैदिक संस्कृत (1500 ई.पूर्व से 800 ई.पू. तक) (जिसमें चार वेदों की रचना हुई)
  2. लौकिक संस्कृत (800 ई.पू. से 500 ई.पू. तक) (जिसमें रामायण, महाभारत आदि महाकाव्य लिखे गए।) 
  3. पालि और प्राकृत (500 ई.पू. से 500 ई. तक) (यह लौकिक संस्कृत का परिवर्तित रूप था। इसमें बौद्ध साहित्य की रचना हुई।) 
  4. अपभ्रंश (500 से 1000 ई. तक) प्राकृत परिवर्तित रूप। (देश में उस समय अपभ्रंश के शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्री आदि कई रूप प्रचलित थे।)
इस विकास क्रम से स्पष्ट है कि द्रविड़ परिवार की तमिल, तेलुगु, मलयालम तथा कन्नड़ को छोड़कर भारत की सभी भाषाओं का विकास अपभ्रंश से हुआ है।

हिन्दी तथा अन्य आधुनिक भारतीय आर्य-भाषाएँ

आधुनिक भारतीय आर्य-भाषाओं का विकास अपभ्रंश से हुआ है, जिसका प्रचलन एवं प्रयोग 500 से 1000 ई. के बीच हुआ करता था। देश में उस समय अपभ्रंश के शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्री आदि कई रूप प्रचलित थे। इन्हीं से विभिन्न आधुनिक भारतीय भाषाओं की धारा निकली है। अपभ्रंश पालि-प्राकृत से और पालि-प्राकृत वैदिक संस्कृत से विकसित है। आर्य परिवार की आधुनिक भारतीय भाषाओं में हिन्दी, पंजाबी, उर्दू, कश्मीरी, सिंधी, गुजराती, मराठी, बांग्ला, उडिया और असमिया प्रमुख हैं। संस्कृति से विकसित होने के कारण इन भाषाओं में न केवल संस्कृत के शब्द प्रचुर मात्रा में मिलते हैं, बल्कि व्याकरण के कई रूप भी इनमें लगभग समान हैं। यही कारण है कि भारतीय आर्य-परिवार की इन भाषाओं को परस्पर समझने या सीखने में कोई कठिनाई नहीं होती।

मुगलकाल में हिन्दी भाषा पर प्रभाव डालने वाली दो प्रमुख भाषाएँ अरबी और फारसी थीं जिन्होंने विशेषतः उर्दू के माध्यम से हिन्दी के शब्द भण्डार को अत्यधिक प्रभावित किया। इसी प्रकार आजकल हिन्दी के शब्द भण्डार तथा वाक्य रचना को गहराई से प्रभावित करने वाली दूसरी भाषा है अंग्रेजी। अंग्रेजी का प्रभाव मुख्यत: ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में अधिक महत्त्वपूर्ण है।


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