Kavita ki vidhaye - कविता क्या है

Kavita ki vidhaye

 मनुष्य अपने भावों, विचारों और व्यापारों को लिए "दूसरे के भावों", विचारों और व्यापारों के साथ कहीं मिलाता और कहीं लड़ाता हुआ अंत तक चला चलता है और इसी को जीना कहता है| जिस अनंत-रूपात्मक क्षेत्र में यह व्यवसाय चलता रहता है उसका नाम है जगत| जब तक कोई अपनी पृथक सत्ता की भावना को ऊपर किये इस क्षेत्र के नाना रूपों और व्यापारों को अपने योगक्षेम, हानि-लाभ, सुख-दुःख आदि से सम्बद्ध करके देखता रहता है तब तक उसका हृदय एक प्रकार से बद्ध रहता है| कविता की एक नहीं बल्कि की सारी विधाएं होती है जैसे- गीत, दोहा , भजन, गज़ल, इत्यादि विधाएं हैं।

कविता में  विधाएँ


  • सबसे पहले, कविता में कविता को एक कविता में एक  रेखा, वाक्यांश या वाक्य के रूप में परिभाषित किया जा सकता है यानि की काव्य के गुण या लय के साथ।
  • दूसरा एक मूल रूप से पहले का विस्तारित संस्करण है। 
  • पद्य को एक काव्य स्वर समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है या एक कविता में संपूर्ण छंद भी हो सकता है।
  • तीसरा, 'कविता' शब्द भी कविता के एक टुकड़े का एक अंश हो सकता है जिसे कविता का विनाशकारी आघात माना जाता है।
  • अंत में, कविता में कविता केवल एक ऐसी चीज है जो एक संवादी या अभियोगात्मक व्याख्या नहीं है।
  • अनेक विधाएं हैं- गीत, गजल, दोहा, भजन आदि।
  • अपने जीवन के अनुभव को हम गीत काव्य के रूप में व्यक्त करते है।
  • गज़ल उर्दू भाषी द्वारा अधिक रचा जाता है।
  • दो पद जिसमें होते हैं उसे दोहा कहते हैं और इसमें चरण भी दो होते हैं।

इन रूपों और व्यापारों के सामने जब कभी वह अपनी पृथक सत्ता की धारणा छुटकर -- अपने आप को बिल्कुल भूल कर -- विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त-हृदय हो जाता है| जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है| हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं| इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग का समकक्ष मानते हैं|

कविता क्या है? 

कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-सम्बन्धों के संकुचित मण्डल से ऊपर उठा कर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत की नाना गतियों के मार्मिक स्वरुप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है, इस भूमि पर पहुंचे हुए मनुष्य को कुछ काल के लिए अपना पता नहीं रहता| वह अपनी सत्ता को लोक-सत्ता में लीन किये रहता है| उसकी अनुभूति सबकी अनुभूति होती है या हो सकती है| इस अनुभूति-योग के अभ्यास के हमारे मनोविकार का परिष्कार तथा शेष सृष्टि के साथ हमारे रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा और निर्वाह होता है|

कैसे लिखे

जिस प्रकार जगत अनेक रूपात्मक है उसी प्रकार हमारा हृदय भी अनेक-भावात्मक है| इस अनेक भावों का व्यायाम और परिष्कार तभी समझा जा सकता है जब कि इन सबका प्रकृत सामंजस्य जगत के भिन्न-भिन्न रूपों, व्यापारों या तथ्यों के साथ हो जाय| इन्हीं भावों के सूत्र से मनुष्य-जाति जगत के साथ तादात्मय का अनुभव चिरकाल से करती चली आई है|

जिन रूपों और व्यापारों से मनुष्य आदिम युगों से ही परिचित है, जिन रूपों और व्यापारों को सामने पा कर वह नरजीवन के आरम्भ से ही लुब्ध और क्षुब्ध होता आ रहा है, उनका हमारे भावों के साथ मूल या सीधा सम्बन्ध है|

अतः काव्य के प्रयोजन के लिए हम उन्हें मूल रूप और मूल व्यापार कह सकते हैं| इस विशाल विश्व के प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष और गूढ़ से गूढ़ तथ्यों को भावों के विषय या आलम्बन बनाने के लिए इन्ही मूल रूपों में और व्यापारों में परिणत करना पड़ता है| जबतक वे इन मूल मार्मिक रूपों में नहीं लाये जाते तब तक उन पर काव्य दृष्टि नहीं पड़ती|

वन, पर्वत, नदी, नाले, निर्झर, कछार, पटपर, चट्टान, वृक्ष, लता, झाड़, फूस, शाखा, पशु, पक्षी, आकाश, मेघ, नक्षत्र, समुद्र इत्यादि ऐसे ही चिर-सहचर रूप हैं|

खेत, ढुर्री, हल, झोंपड़े, चौपाये इत्यादि भी कुछ कम पुराने नहीं हैं| इसी प्रकार पानी का बहना, सूखे पत्तों का झड़ना, बिजली का चमकना, घटा का घिरना, नदी का उमड़ना, मेह का बरसाना, कुहरे का छाना, डर से भागना, लोभ से लपकना, छीनना, झपटना, नदी या दलदल से बांह पकड़ कर निकालना, हाथ से खिलाना, आग में झोंकना, गला काटना ऐसे व्यापारों का भी मनुष्य जाति के भावों के साथ अत्यंत प्राचीन साह्चर्य्य है|
ऐसे आदि रूपों और व्यापारों में वंशानुगत वासना की दीर्घ-परंपरा के प्रभाव से, भावों के उद्बोधन की गहरी शक्ति संचित है; अतः इसके द्वारा जैसा रस-परिपाक संभव है वैसा कल-कारखाने, गोदाम, स्टेशन, एंजिन, हवाई जहाज ऐसी वस्तुओं तथा अनाथालय के लिए चेक काटना, सर्वस्वहरण के लिए जाली दस्तावेज़ बनाना, मोटर की चरखी घुमाना या एंजिन में कोयला झोंकना आदि व्यापारों द्वारा नहीं|

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