रस के प्रकार, रस का स्थायी भाव : रस और भाव

रस: रस का शाब्दिक अर्थ होता है- आनन्द। काव्य को पढ़ते या सुनते समय जो आनन्द मिलता है उसे रस कहते हैं। रस को काव्य की आत्मा माना जाता है।
"कविता कहानी या उपन्यास को पढ़ने से जिस आनंद की अनुभूति होती है उसे रस कहते हैं। रस काव्य की आत्मा है।"
आचार्य विश्वनाथ ने साहित्य-दर्पण में काव्य की परिभाषा देते हुए लिखा है-
'वाक्यं रसात्मकं काव्यं' अर्थात रसात्मक वाक्य काव्य है।
नाट्य शास्त्र के छठे पाठ में, भरत ने संस्कृत में लिखा है:-
"विभावानूभावा व्याभिचारी स़ैयोगीचारी निशपाथिहि" - अर्थात विभाव, अनुभव और व्याभिचारी के मिलन से रस का जन्म होता है। 
जिस प्रकार लोग स्वादिष्ट खाना, जो कि मसाले, चावल और अन्य चीज़ो का बना हो, जिस रस का अनुभव करते है और खुश होते है उसी प्रकार स्थायी भाव और अन्य भावों का अनुभव करके वे लोग हर्ष और संतोष से भर जाते है। इस भाव को तब 'नाट्य रस' कहा जाता है। कुछ लोगो की राय है कि रस और भाव की उठता उनके मिलन के साथ होती है। लेकिन यह बात सही नहीं है, क्योंकि रसो का जन्म भावो से होता है परंतु भावो का जन्म रसो से नहीं होता है। इसी कारण के लिये भावो को रसो का मूल माना जाता है। जिस प्रकार मसाले, सब्जी और गुड के साथ स्वाद या रस बनाया जा सके उसी प्रकार स्थाई भाव और अन्य भावों से रस बनाया जा सकता है और ऐसा कोई स्थाईभाव नहीं है जो रस की वृद्धि नहीं करता और इसी प्रकार स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव और व्याभिचारी भावों से रस की वृद्धि होती है।

रस के भाव:

रसों के आधार भाव हैं। भाव मन के विकारों को कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं- स्थायी भाव और संचारी भाव। यही काव्य के अंग कहलाते है।
भाव दर्शक को अर्थ देता है। उसे भाव इसिलिए कह्ते हैं क्योकि यह कविता का विषय, शारीरिक क्रिया और मानसिक भावनाओं दर्शको तक पहुँचाता है। भाव 'भविता' 'वसिता' और 'प्रक्रिता' जैसे शब्दों से निर्मित है जिसका अर्थ है होना ।

विभाव या निर्धारक तत्व: 

विभाव वजह या कारण या प्रेरणा होता है। उसे इसीलिए विभाव कहते हैं क्योंकि यह वचन शरीर, इशारों और मानसिक भावनाओं का विवरण करते हैं।
विभाव दो प्रकार का होता है:-
  1. आलंबन विभाव / मौलिक निर्धारक
  2. उद्दीपन विभाव / उत्तेजक निर्धारक
आलंबन विभाव: यह भाव की निर्माण का मुख्य कारण होता है। जब भाव एक आदमी या वस्तु या कर्म की वजह से आकार लेता है उसे आलम्भन विभाव कहते हैं।  उदाहरण: जब प्रिय मित्र को देखने के बाद आनन्द मिलता है। 

उद्दीपन विभाव: जब किसी वस्तु भावना को उत्तेजित करता हे जैसे गुण, कार्रवाई, सजावट, वातावरण आदि।

अनुभाव:

जिसका उद्भव वाक्य और अंगाभिनय से होता हे उसे अनुभाव कहते हैं। यह विभाव का परिणामी है | यह एक व्यक्ति द्वारा महसूस अभिव्यक्ति भावनात्मक भावनाएं हैं।

 रस का स्थायी भाव : Ras and Sthayi Bhav

Hindi me ras
रस का स्थायी भाव - ras ka sthayi bhav
स्थायी भाव: स्थायी भाव से रस का जन्म होता है। जो भावना स्थिर और सार्वभौम होती है उसे स्थायी भाव कहते हैं। रस का उत्पादन भाव के बिना नही हो सकता, इस प्रकार से स्थायी भाव रस के नाम मे मशहूर है। स्थायी भाव 9  होते है:-
  1. रति (प्रेम)
  2. उत्साह (ऊर्जा)
  3. शोक
  4. हास
  5. विस्मय
  6. भय
  7. जुगुप्सा
  8. क्रोध 
  9. निर्वेद
संचारी भाव: रस की वस्तु या विचार का नेतृत्व करते हे उसे संचारी भाव कहते हे।

सात्विक भाव: आश्रय की शरीर से उसके बिना किसी बाहरी प्रयत्न के स्वत: उत्पन्न होने वाली चेष्टाएँ सात्विक अनुभाव कहलाती है इसे 'अयत्नज भाव' भी कहते है.। सात्विक भाव 8 तरह के होते है। स्तम्भ, स्वेद, स्वरभंग, वेपथु (कम्पन), वैवर्ण्य, अश्रुपात, रोमांस व प्रलय ।


रस के प्रकार (Ras Ke Prakar)

रस के प्रकार: रस नौ हैं - वात्सल्य रस को दसवाँ एवं भक्ति रस को ग्यारहवाँ रस भी माना गया है। वत्सलता तथा भक्ति इनके स्थायी भाव हैं। विवेक साहनी द्वारा लिखित ग्रंथ "भक्ति रस- पहला रस या ग्यारहवाँ रस" में इस रस को स्थापित किया गया है।
  1. शृंगार रस
  2. हास्य रस
  3. करुण रस
  4. रौद्र रस
  5. वीर रस
  6. भयानक रस
  7. वीभत्स रस
  8. अद्भुत रस
  9. शांत रस - शांत रस  में भरत का योगदान था।
  10. वात्सल्य रस
  11. भक्ति रस 
इन 9 रस मे से 4 रस मौलिक रस है- वे हैं - श्रृंगार, रौद्र, वीर और वीभत्स। इन चार मौलिक रस से बाकी 9 रस का उद्भव हुआ है- श्रृंगार से हास्य का उद्भव, रौद्र से करुण का उत्भव, वीर से अद्भुत का उत्भव और वीभत्स से भयानक का उद्भव होता है । कुछ रंगों का भी उपयोग रस के वर्णन करने के लिए किया जाता है:-
  • शृंगार के लिए हरा रग
  • रौद्र के लिए लाल
  • वीर के लिए सुनहरा पीला
  • वीभत्स के लिए नीला
  • हास्य के लिए सफेद
  • करुण के लिए कोरा वस्त्र
  • भयानक के लिए काला
  • अद्भुत के लिए पीला
रंग की तरह हर रस के लिए एक एक देवता भी होता है:-
  • श्रृंगार के लिए विष्णु
  • हास्य के लिए शिवगण
  • रौद्र के लिए रुद्र
  • करुण के लिए यम
  • वीर के लिए इन्द्र
  • विभत्स के लिए महाकाल
  • भयानक के लिए कामदेव
  • अद्भुत के लिए ब्रह्मा


शृंगार रस


Sringar Ras
Sringar Ras
शृंगार (कामुक) का भाव रति (प्यार) नामक स्थायी मानोभाव से उत्पन्न होता है। इस दुनिया मे जो कुछ भी सुध और दीप्तिमान है उसे शृंगार कहा जाता है।
यह भाव पुरुष, स्त्री और उज्जवल युवों से संबंधित है। इसका मतलब यह है कि ये पुरुष और स्त्री के बीच प्यार और उसके परिणामो से संबंध रखता है। इस अवधि द्वारा एक बहुत गहरी समझ अवगत को कराया जाता है, श्रृंगार अवधि का मतलब है सौंदर्य। इसलिए श्रृंगार लहरी को सौंदर्य लहरी भी कहा जाता है। प्यार मनुष्य का सौंदर्य है और यही प्यार उसे एक अलग पहचान देती है और उसे सभी कृतियों में सर्वोच्च बनाती है। इस रस के दो कुर्सियां है; अर्थात: स्ंघ मे प्यार (संयोग श्रृंगार) और जुदाई मे प्यार (विप्रलम्भ श्रृंगार)।

संयोग शृंगार

सुखद मौसम, माला, गहने, लोग, अच्छे घर, सुखों का आनंद, उद्यान के यातरें, सौंदर्य की बातें सुनने और देखने और आदि विभावों से सम्भोग श्रृंगार उत्पन्न होता है। आंखें, भौंहे आदि के निपुण आंदोलन द्वारा इस भाव का प्रतिनिधित्व किया जाता है। इसके भावनायें आलस्य, ऊग्रता और जुगुप्सा को छोडकर अन्य तीस भावनायें है। सम्भोग श्रृंगार को फिर से दो भागो में बांटां गया है, जो कि इस प्रकार है:
  1. संक्षिप्त
  2. संपन्न
संक्षिप्त श्रृंगार को सात्विक भाव और शर्म द्वारा दिखाया जाता है और जुदाई के बाद पुनर्मिलन और प्यार से भरी अभिव्यक्ती को सम्पन्न सम्भोग कहा जाता है।

संयोग श्रंगार का उदाहरण:-

मेरे तो गिरधर गोपाल दुसरो न कोई
जाके तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई।

विप्रलम्भ शृंगार

प्यार मे जुदाई के विविधताओं को निर्वेदा, ग्लानि, स्ंक, असूय, श्रमा, सिन्त, उत्सुक्ता, आवेग, भय, विषाद, अवसाद, निद्रा, सुप्ति, विबोध, व्यधि, उन्माद, अपस्मर, जडता, मोह, मरण आदि अन्य क्षणभंगुर भावनायों द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है। रास प्रकारण वीप्रलंभ को दो भागों में बांटा है;

अयोग्य (अभाव मे प्यार)

अपने प्रियतम से मिलने के पेहले, अभिनेत्रि कि दशा को अयोग्य विप्रलम्भ कहा जाता है। यहमुग्ध नायिकामे देखा जाता है, उदाहरण के लिये: शादि से पेहले पारवति का प्यार शिव जी के लिये और रुकमिणी का प्यार कृषण के लिये। अयोग्य विप्रलम्भ के मुख्य तौर पर दस तरिकों से दिखाया जा सकता है, जैसे कि:
  1. अभिलाषा
  2. सिन्त
  3. स्मृति
  4. गुणकध
  5. उद्वेग
  6. प्रलाप
  7. उन्माद
  8. समझवर
  9. जडता
  10. मरण

विप्रयोग (जुदाई मे प्यार)

विप्रयोग दो तरह के होते है: अभाव से उत्पन्न होने वाली जुदाई और असंतोष से उत्पन्न होने वाली जुदाई। अभाव से उत्पन्न होने वाली जुदाई को प्रवास कहा जाता है, यह प्रोषित्प्रिय नामक अभिनेत्रि मे देखा गया है। असंतोष से उत्पन्न होने वाली जुदाई, दो प्रेमी जो कि एक दूसरे को देखना नही चाहते या एक दूसरे को आलंगन नही करना चाहते, के बीच पैदा होता है। यह फिर से दो तरह का होता है:
  1. प्रणय माण
  2. ईर्ष माण

वियोग श्रंगार का उदाहरण:- 

हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी
तुम देखि सीता मृग नैनी।


हास्य रस


Hasy Ras
Hasy Ras
हास्य भाव का जन्म हास्य नामक स्थायी या प्रमुख मनोदषा से होती है। यह विक्रतप्रवेश, धृषटता, विक्रतालंकार, लौल्य, कुहाका, असतप्रलाप, व्यंगदर्शन, और दोसोधारण, आदि निर्धारकों द्वारा उतपन्न होता है। यह ओषथास्पंदन, नासस्पंदन, कापोलस्पंदन, दृष्टिव्याकोस, दृष्टाकुणचन, स्वेद, अस्यराग, पर्सव्याग्रह और आदि इशारों से दिखाया जात है। यह हास्य भाव दो तरह के होते हैं: जब कोई अपने आप से ह्ंसता है, तब आतमस्त कहलाता है और जब कोई दूसरों को हंसाता है तो परस्थ कहलाता है। हंसी के ६ प्रकार होते है:
  1. स्मिता
  2. हसिता
  3. विहसिता
  4. उपहसिता
  5. अपहसिता
  6. अतिहसिता
इन मे से स्मिता और हसिता उत्तम वर्ग के वर्ण है, विहसिता और उपहसिता मधयम वर्ग के वर्ण है, और अपहसिता और अतिहसिता नीचि वर्ग के वर्ण है।

हास्य रस का उदाहरण:-

मातहिं पितहिं उरिन भये नीके।
गुरू ऋण रहा सोंच बड़ जी के।।


करुण रस

Karun Ras
Karun Ras
करुणा का भाव शोक नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। इसका उत्पादन अपनो और रिशतेदारों से जुदाई, धन की हानी, प्राण की हानी, कारावास, उडान, बदकिसमती, आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होति है। अश्रुपात, परिवेदना, मुखषोशना, वैवरन्य, स्वरभेद, निश्वास, और स्मृतिलोप, से इसका प्रतिनिधित्व होता है। निर्वेद, ग्लानि, उत्सुकता, आवेग, मोह, श्रमा, विषाद, दैन्य, व्याधि, जडता, उनमाद, अपस्मर त्रासा, आल्स्य, मरण आदि अन्य इसके श्रणभंगुर भावनाएं है। स्तम्भ, सिहरन, वैवरन्य, अश्रु और स्वरभेद इसके सात्विक भाव है। करुण रस प्रिय जन कि हत्या की दृष्टि, या अप्रिय शब्दो के सुनने से भी इसकी उठता होति है। इसका प्रतिनिधित्व ज़ोर ज़ोर से रोने, विलाप, फूट फूट के रोने और आदि द्वारा होता है।

करुण रस का उदाहरण:-

जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौ जड़ दैव जियावई मोही।।

रौद्र रस

Raudra Ras
Raudra Ras
रौद्र क्रोध नामक स्थायी भाव से आकार लिया है | और यह आमतौर पर राक्षसों दानवो और बुरे आदमियो मे उत्भव होता है |और य्ह निर्धारकों द्वारा उत्पन्न जैसे क्रोधकर्सन, अधिकशेप, अवमन, अन्र्तवचना आदि रौद्र तीन तरफ क है - बोल से रौद्र नेपध्य से रौद्र और अग से रौद्र।

रौद्र रस का उदाहरण:-

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा,
यह मत लछिमन के मन भावा।
संधानेहु प्रभु बिसिख कराला,
उठि ऊदथी उर अंतर ज्वाला।


वीर रस

Veer Ras
Veer Ras
वीर का भाव उत्साह नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। वीर का भाव बेहतर स्वभाव के लोग और उर्जावन उत्साह से विषेशता प्राप्त करती है। इसका उत्पादन असम्मोह, अध्यवसय, नाय, पराक्रम, श्क्ती, प्रताप और प्रभाव आदि अन्य :निर्धारक तत्वों द्वारा होति है। स्थैर्य, धैर्य, शौर्य, त्याग और वैसराद्य से इसका प्रतिनिधित्व होता है। धृर्ती, मति, गर्व, आवेग, ऊग्रता, अक्रोश, स्मृत और विबोध आदि अन्य इसके श्रणभंगुर भावनाएं है। येह तीन प्रकार के होते है:
  1. दानवीर- जो कोई भि दान देके या उपहार देके वीर बना हो, वोह् दानवीर कहलाता है। उदा:कर्ण।
  2. दयावीर- जो कोई भि हर क्षेत्र के लोगो कि ओर सहानुभूति कि भावना प्रकट करता हो, वोह दयावीर कहलाता है। उदा:युद्धिष्टिर।
  3. युद्यवीर-जो कोई भि साहसी, बहादुर हो और मृत्यु के भय से न दरता हो, युद्यवीर कहलाता है। उदा:अर्जुन।

वीर रस का उदाहरण:-

चमक उठी सन सत्तावन में वो तलवार पुरानी थी,
बुंदेलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।


भयानक रस

Bhayanak Ras
Bhayanak Ras
भयानक का भाव भय नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। इसका उत्पादन, क्रूर जानवर के भयानक आवाज़ो से, प्रेतवाधित घरों के दृषय से या अपनों कि मृत्यु कि खबर सुनने आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होता है। हाथ, पैर, आखों के कंपन द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। जडता, स्ंक, मोह, दैन्य, आवेग, कपलता, त्रासा, अप्सर्मा और मरण इसकी श्रणभंगुर भावनाएं है। इसके सात्विक भाव इस प्रकार है:
  1. स्तम्भ
  2. स्वेद
  3. रोमान्च
  4. स्वरभेद
  5. वेपथु
  6. वैवर्न्य
  7. प्रलय
यह तीन प्रकार के होते है: व्यज, अपराध और वित्रसितक, अर्थात भय जो छल, आतंक, या गलत कार्य करने से पैदा होता है।

भयानक रस का उदाहरण:-

लंका की सेना कपि के गर्जन रव से काँप गई।
हनुमान के भीषण दर्शन से विनाश ही भांप गई।
उस कंपित शंकित सेना पर कपि नाहर की मार पड़ी।
त्राहि- त्राहि शिव त्राहि- त्राहि शिव की सब ओर पुकार पड़ी।।


वीभत्स रस


Veebhats Ras
Veebhats Ras
वीभत्स का भाव जुगुप्सा नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। इसका उत्पादन, अप्रिय, दूषित, प्रतिकूल, आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होता है। सर्वङसम्हर, मुखविकुनन, उल्लेखन, निशिवन, उद्वेजन, आदि द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। आवेग, मोह, व्याधि इसकी श्रणभंगुर भावनाएं है। यह तीन प्रकार के होते है:
  1. शुद्ध
  2. उद्वेगि
  3. क्षोभना

वीभत्स रस का उदाहरण:-

कोउ अंतडिनी की पहिरि माल इतरात दिखावट।
कोउ चर्वी लै चोप सहित निज अंगनि लावत।।
कोउ मुंडनि लै मानि मोद कंदुक लौं डारत।
कोउ रूंडनि पै बैठि करेजौ फारि निकारत।।


अद्भुत रस

Adbhut Ras
Adbhut Ras
अद्भुत का भाव विस्मय नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। इसका उत्पादन दिव्यजनदरशन, ईप्सितावाप्ति, उपवनगमण्, देवाल, यगमण, सभादर्शण, विमणदर्शण, आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होता है। नयणविस्तार, अनिमेसप्रेक्षण, हर्ष, साधुवाद, दानप्रबन्ध, हाहाकार और बाहुवन्दना आदि द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। आवेग, अस्थिरता, हर्ष, उन्माद, धृति, जडता इसकी श्रणभंगुर भावनाएं है। स्तम्भ, स्वेद, रोमान्च, अश्रु और प्रलय इस्के सात्विक भाव है। यह भाव दो तरह के होते है:
  1. दिव्य
  2. आनन्दज

अद्भुत रस का उदाहरण:-

इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मति भ्रम मोरि कि आन बिसेखा।।
तन पुलकित मुख वचन न आवा नयन मूँदि चरनन सिुर नावा।।


शांत रस


Shaant Ras
Shaant Ras 
शांत का भाव शांति नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है और यह भाव हर उस चीज़ से हमे मुक्ति दिलाता है जो हमारि मणोदषा को परेशान करती है। इसका उत्पादन तत्त्वज्नान, वैर्ग्य, आशय शुद्धि निर्धारक तत्वों द्वारा होता है। याम, नियाम, अध्यात्माध्यान, धारण, उपासन, आदि द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। निर्वेद, स्मृति, धृति और मति इसकी श्रणभंगुर भावनाएं है। स्तम्भ और रोमान्च इस्के सात्विक भाव है। शात रस योगियो ने गिना हुआ है | शात रस सारे जीवियो को आनद देते है।

शांत रस का उदाहरण:-

मेरो मन अनत सुख पावे
जैसे उडी जहाज को पंछी फिर जहाज पे आवै।

वात्सल्य रस


Vatsaly Ras
Vatsaly Ras
जब काव्य में किसी की बाल लीलाओं या किसी के बचपन का वर्णन होता है तो वात्सल्य रस होता है।सूरदास ने जिन पदों में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया है उनमें वात्सल्य रस है।

वात्सल्य रस का उदाहरण:-

मैया मोरी दाऊ ने बहुत खिजायो।
मोसों कहत मोल की लीन्हो तू जसुमति कब जायो।

भक्ति रस


Bhakti Ras
Bhakti Ras
इसका स्थायी भाव देव रति है इस रस में ईश्वर कि अनुरक्ति और अनुराग का वर्णन होता है अर्थात इस रस में ईश्वर के प्रति प्रेम का वर्णन किया जाता है।

भक्ति रस के उदाहरण:-

अँसुवन जल सिंची-सिंची प्रेम-बेलि बोई
मीरा की लगन लागी, होनी हो सो होई


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