श्रृंगार रस क्या है ?

  • श्रृंगार रस को रसराज या रसपति कहा गया है। 
मुख्यत: संयोग तथा विप्रलंभ या वियोग के नाम से दो भागों में विभाजित किया जाता है, किंतु धनंजय आदि कुछ विद्वान् विप्रलंभ के पूर्वानुराग भेद को संयोग-विप्रलंभ-विरहित पूर्वावस्था मानकर अयोग की संज्ञा देते हैं तथा शेष विप्रयोग तथा संभोग नाम से दो भेद और करते हैं। संयोग की अनेक परिस्थितियों के आधार पर उसे अगणेय मानकर उसे केवल आश्रय भेद से नायकारब्ध, नायिकारब्ध अथवा उभयारब्ध, प्रकाशन के विचार से प्रच्छन्न तथा प्रकाश या स्पष्ट और गुप्त तथा प्रकाशनप्रकार के विचार से संक्षिप्त, संकीर्ण, संपन्नतर तथा समृद्धिमान नामक भेद किए जाते हैं तथा विप्रलंभ के पूर्वानुराग या अभिलाषहेतुक, मान या ईश्र्याहेतुक, प्रवास, विरह तथा करुण प्रिलंभ नामक भेद किए गए हैं। श्रृंगार रस के अंतर्गत नायिकालंकार, ऋतु तथा प्रकृति का भी वर्णन किया जाता है।

श्रंगार रस के अवयव (उपकरण):

  • स्थाई भाव - रति।
  • आलंबन (विभाव) - नायक और नायिका ।
  • उद्दीपन (विभाव) - आलंबन का सौदर्य, प्रकृति, रमणीक उपवन, वसंत-ऋतु, चांदनी, भ्रमर-गुंजन, पक्षियों का कूजन आदि।
  • अनुभाव -  अवलोकन, स्पर्श, आलिंगन, कटाक्ष, अश्रु आदि ।
  • संचारी भाव -  हर्ष, जड़ता, निर्वेद, अभिलाषा, चपलता,  आशा, स्मृति, रुदन, आवेग, उन्माद आदि।

श्रृंगार रस के उदाहरण:

दूलह श्रीरघुनाथ बने दुलही सिय सुंदर मंदिर माही ।
गावति गीत सबै मिलि सुन्दरि बेद  जुवा जुरि विप्र पढ़ाही।।
राम को रूप निहारित जानकि कंकन के नग की परछाही ।
यातें सबै भूलि गई कर टेकि रही, पल टारत नाहीं।।
                                        ---- तुलसीदास
स्पष्टीकरण: इस पद मे स्थाई भाव रति है, राम-आलंबन, सीता-आश्रय, नग मे पड़ने वाला राम का प्रतिबिम्ब उद्दीपन, उस प्रतिबिम्ब को देखना, हाथ टेकना अनुभाव,  तथा हर्ष एवं जड़ता संचारी भाव है। अत: इस पद में संयोग श्रृंगार है।
रे मन आज परीक्षा तेरी !
सब अपना सौभाग्य मानावें।
दरस परस नि:श्रेयस पावें।
उध्दारक चाहें तो आवें।
यही रहें यह चेरी !
                 ---- मैथिलीशरण गुप्त 
स्पष्टीकरण: इसमें स्थाई भाव रति है, यशोधरा-आलम्बन, उध्दारक गौतम के प्रति यह भाव कि 'वे चाहे आवें' उद्दीपन विभाव है, 'मन को समझाना और उद्बोधन' अनुभाव है, 'यशोधरा का प्रणय' मान है तथा मति, वितर्क और अमर्ष संचारी भाव है।  अत: इस छंद में विप्रलम्भ श्रृंगार है।  

श्रंगार रस दो प्रकार के होते है - 

  1. संयोग श्रंगार 
  2. वियोग श्रृंगार (विप्रलंभ श्रृंगार)

१- संयोग श्रृंगार - 

संयोगकाल में नायक और नायिका की पारस्परिक रति को संयोग श्रृंगार रस कहा जाता है। इसमें संयोग का अर्थ है सुख की प्राप्ति करना। 

संयोग श्रृंगार के उदाहरण -

बतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाय।
सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। -बिहारी लाल

२- वियोग श्रृंगार - 

एक दूसरे के प्रेम में अनुरक्त नायक एवं नायिका के मिलन  का अभाव 'विप्रलम्भ श्रंगार' होता है ।

वियोग श्रृंगार (विप्रलंभ श्रृंगार) के उदाहरण-

निसिदिन बरसत नयन हमारे,
सदा रहति पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे॥ -सूरदास

वियोग श्रंगार की परिभाषा- 

  • भोजराज ने विप्रर्लभ-श्रृंगार की यह परिभाषा दी है-‘जहाँ रति नामक भाव प्रकर्ष को प्राप्त करे, लेकिन अभीष्ट को न पा सके, वहाँ विप्रर्लभ-श्रृंगार कहा जाता है’। 
  • भानुदत्त का कथन है-‘युवा और युवती की परस्पर मुदित पंचेन्द्रियों के पारस्परिक सम्बन्ध का अभाव अथवा अभीष्ट अप्राप्ति विप्रलम्भ है’।
  • साहित्यदर्पण में भोजराज की परिभाषा दुहराई गई है-‘यत्र तु रति: प्रकृष्टा नाभीष्टमुपैति विप्रलम्भोऽसौ। 
  • इन कथनों में अभीष्ट का अभिप्राय नायक या नायिका से है। 
  • उक्त आचार्यों ने अभीष्ट की अप्राप्ति ही विप्रलम्भ की निष्पत्ति के लिए आवश्यक मानी है। लेकिन पण्डितराज ने प्रेम की वर्तमानता को प्रधानता दी है। उनके अनुसार यदि नायक-नायिका में वियोगदशा में प्रेम हो तो, वहाँ विप्रलम्भ श्रृंगार होता है। उनका कथन है कि वियोग का अर्थ है यह ज्ञान की ‘मैं बिछुड़ा हूँ’, अर्थात् इस तर्कणा से वियोग में भी मानसिक संयोग सम्पन्न होने पर विप्रलम्भ नहीं माना जायेगा। स्वप्न-समागम होने पर वियोगी भी संयोग माना जाता है।

विभिन्न कवियों के विचार-

हिन्दी के आचार्यों में केशव तथा सोमनाथ ने ‘रसगंगाधर’ की परिभाषा अपनायी है तथा चिन्तामणि और भिखारीदास साहित्यदर्पण’ से प्रभावित हैं।

केशव-

‘बिछुरत प्रीतम की प्रीतिमा, होत जु रस तिहिं ठौर।
विप्रलम्भ तासों कहै, केसव कवि सिरमौर’।

सोमनाथ-

‘प्रीतम के बिछुरनि विषै जो रस उपजात आइ।
विप्रलम्भ सिंगार सो कहत सकल कविराइ’।

चिन्तामणि-

‘जहाँ मिलै नहिं नारि अरु पुरुष सु वरन् वियोग’।

भिखारी-

‘जहँ दम्पत्ति के मिलन बिन, होत बिथा विस्तार।
उपजात अन्तर भाव बहु, सो वियोग श्रृंगार’।

विप्रलम्भ के प्रकार-

  • विप्रलम्भ के कई प्रकार से भेद किये गए हैं। 
  • भोज ने ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ में पूर्वानुराग, मान, प्रवास एवं करुण, ये चार भेद कहे हैं। 
  • परवर्ती आचार्यों में विश्वनाथ ने इन्हीं भेदों का कथन किया है। 
  • लेकिन मम्मट ने विप्रलम्भ के पाँच प्रकार बताये हैं-अभिलाषहेतुक, विरसहेतुक, ईर्ष्याहेतुक, प्रवासहेतुक तथा शापहेतुक। 
  • भानुदत्त और पण्डितराज ने मम्मट के भेदों को ही स्वीकार किया है। 
  • हिन्दी के आचार्यों में केशव, देव, भिखारी इत्यादि ने ‘साहित्यदर्पण’ का ही अनुसरण किया है। 
  • नवीन विद्वानों में कन्हैयालाल पोद्दार ने ‘काव्यप्रकाश’ का तथा रामदहिन मिश्र ने ‘साहित्यदर्पण’ का वर्गीकरण स्वीकार किया है। 
  • ‘हरिऔध’ पूर्वानुराग, मान और प्रवास, तीन ही भेद स्वीकार करते हैं। 
  • मतिराम ने भी ‘रसराज’ में ये ही तीन भेद माने हैं।


वियोग श्रंगार या विप्रलंभ के तीन भेद-

धनंजय ने श्रृंगार के तीन भेद बताए हैं-
  1. आयोग, 
  2. विप्रयोग 
  3. सम्भोग। 
इनमें आयोग और विप्रयोग विप्रलम्भ के अन्तर्गत आते हैं। 
  • आयोग का अर्थ है, नहीं मिल पाना और 
  • विप्रयोग का अर्थ है, मिलकर अलग हो जाना।
लक्षण के अनुसार आयोग पूर्वानुग्रह के समकक्ष है। कभी-कभी विप्रयोग और विप्रलम्भ पर्याय जैसे भी समझे जाते हैं। 
मिलन अथवा समागम से पूर्व हृदय में जो अनुराग का आविर्भाव होता है, उसे पूर्वराग या पूर्वानुराग कहा जाता है। 
पूर्वराग या पूर्वानुराग के चार मार्ग या विधियाँ हैं- 
  1. प्रत्यक्ष दर्शन, 
  2. चित्र दर्शन, 
  3. श्रवण दर्शन 
  4. स्वप्न दर्शन
इनमें प्रियमूर्ति के भिन्न-भिन्न प्रकार से दर्शन होने का विधान है। पूर्वानुराग को नियोग भी कहते हैं। 
कविराज विश्वनाथ के अनुसार पूर्वानुराग तीन प्रकार का होता है-

  1. नीलीराग- जो बाहरी चमक-दमक तो अधिक न दिखाये, किन्तु हृदय से कभी दूर न हो।
  2. कुसुम्भराग- जो शोभित अधिक हो, किन्तु जाता रहे।
  3. मंजिष्ठाराग-  जो शोभित भी हो और साथ ही कभी नष्ट भी न हो।

प्रणयमान और ईर्ष्यामान-

प्रियापराधजनित कोप को मान कहते हैं। 
इसके भी दो भेद होते हैं-
  1. प्रणयमान
  2. ईर्ष्यामान। 

1- प्रणयमान-

दोनों के हृदय में भरपूर प्रेम होने पर भी जब प्रिय-प्रिया एक-दूसरे से कुपित हों, तब प्रणयमान होता है।
 इसका समाधान यह कहकर किया गया है कि प्रेम की गति कुटिल होती है, यद्यपि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा मान नायक-नायिका पारस्परिक अनुराण की पुष्टि हेतु करते हैं। यदि यह मान अनुनय-विनय समय तक न ठहर सके, तो इसे विप्रलम्भ श्रृंगार न समझकर ‘सम्भोगसंचारी’ नामक भाव मानना चाहिए। 

2- ईर्ष्यामान-

पति की अन्य नारी में आसक्ति देखने, अनुमान करने या किसी से सुन लेने पर स्त्रियों द्वारा किया गया मान ‘ईर्ष्यामान’ कहलाता है। 
निवृत्ति के अनुसार ईर्ष्यामान के भी तीन भेद कहे गये हैं-
  1. लघु मान, 
  2. मध्यम मान
  3. गुरु मान।

प्रवास-

नायक-नायिका में से एक का परदेश में होना प्रवास कहलाता है। यह प्रवास कार्यवश, शापवश अथवा भयवश, तीन कारणों से होता है। 
प्रवास-वियोग में नायिका के शरीर और वस्त्र में मलिनता, सिर में एक साधारण वेणी एवं नि:श्वास-उच्छवास, रोदन, भूमिपतन इत्यादि होते हैं। 
शापज (शापहेतुक) वियोग का प्रसिद्ध उदाहरण कालिदास का मेघदूत है, जिसमें कुबेर के शाप के कारण यक्ष अपनी पत्नी से वियुक्त हो गया है तथा मेघ को दूत बनाकर अपना मर्मद्रावक प्रणय सन्देश प्रिया के पास भेजता है।

करुण विप्रलम्भ श्रंगार -

  • नायक-नायिका में से एक के मर जाने पर दूसरा जो दुखी होता है, उसे करुण-विप्रलम्भ कहते हैं। 

        लेकिन विप्रलम्भ तभी माना जायेगा, जब परलोकगत व्यक्ति के इसी जन्म में इसी देह से पुन: मिलने की आशा बनी रहे। 

  • यदि प्रियमिलन की आशा सर्वथा नष्ट हो जाए, तो वहाँ स्थायी भाव शोक होने से करुण रस होगा, करुण-विप्रलम्भ-श्रृंगार नहीं। 
  • ‘रघुवंश’ में इन्दुमती के मर जाने पर महाराज अज का प्रसिद्ध विलाप करुण रस ही है, करुण-विप्रलम्भ-श्रृंगार नहीं। 
  • कादम्बरी में पुरण्डरीक के मर जाने पर महाश्वेता को करुण रस की ही अनुभूति हुई, लेकिन आकाशवाणी सुनने पर प्रियमिलन की आशा अंकुरित होने के बाद से ‘करुण-विप्रलम्भ’ माना जाता है। 
  • वैसी दशा में भी, जहाँ प्रिय से मिलने की आशा नष्ट हो गई है, लेकिन प्रिय जीवित है तथा मिलन की भौतिक सम्भावना सर्वथा विलुप्त नहीं हुई है, करुण-विप्रलम्भ माना जायेगा। 
  • सूरसागर’ में कृष्ण के ब्रज से चले जाने के उपरान्त गोपियों की वियोगानुभूति करुण-विप्रलम्भ ही है।
  • मम्मट के पंचविध विप्रलम्भ और विश्वनाथ के चतुर्विध विप्रलम्भ में कोई मौलिक भेद नहीं है। 
  • मम्मट का अभिलाषहेतुक वियोग ‘साहित्यदर्पण’ का पूर्वानुराग ही है, यद्यपि सामान्य काव्यानुरागियों में ‘पूर्वराग’ या ‘पूर्वानुराग’ शब्द अधिक लोकप्रिय हैं। 
  • ईर्ष्याहेतुक’ का सम्बन्ध मान से है। प्रवास एवं शाप, दोनों वर्गीकरणों में समान है। करुण-विप्रलम्भ प्रवासहेतुक वियोग के भीतर सन्निविष्ट किया जा सकता है। 
  • मम्मट का विरहहेतुक विप्रलम्भ अवश्य एक सुन्दर सूझ है। समीप रहने पर भी गुरुजनों की लज्जा आदि के कारण समागम न हो, तो वह विरहहेतुक वियोग माना जायेगा। इसके अत्यन्त मर्मस्पर्शी उदाहरण हैं-
        ‘देखै बनै न देखतै अनदेखै अकुलाहिं।
       इन दुखिया अँखियानुकौ सुखु सिरज्यौई नाहिं’।

काम दशाएँ-

वियोग से सम्बन्धित दस काम-दशाएँ भी मानी गई हैं-
  • अभिलाष, चिन्ता, स्मृति, गुणकथन, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद व्याधि, जड़ता और मृति या मरण। 
कितने ही लोग नौ काम-दशाएँ मानते हैं, मरण की नहीं। 
कितने मूर्च्छा को भी मिलाकर एकादश काम-दशाएँ स्वीकार करते हैं। 
  • प्रिय से तन से मिलन की इच्छा अभिलाष है; 
  • प्राप्ति के उपायों की खोज चिन्ता है; 
  • सुखदायी वस्तुएँ जब दु:खदायी बन जाएँ, तो उद्वेग है; 
  • चित्त के व्याकुल होने से अटपटी बातें करना प्रलाप है; 
  • जड़े-चेतन का विचार न रहना उन्माद है; 
  • दीर्घ नि:श्वास, पाण्डुता, दुर्बलता इत्यादि व्याधि हैं; 
  • अंगों तथा मन का चेष्टाशून्य होना जड़ता है। 
अन्य दशाओं के अभिप्राय स्वत: स्पष्ट हैं। इनमें चिन्ता, स्मरण, उन्माद, व्याधि, जड़ता और मरण संचारियों में भी वैसे ही गृहीत हैं। 
रस का विच्छेद होने से मरण का वर्णन प्राय: निषिद्ध ठहराया जाता है, लेकिन विश्वनाथ कहते हैं कि मरणतुल्य दशा तथा चित्त से आकांक्षित मरण का वर्णन ग्राह्य है और शीघ्र पुनर्जीवित होने की आशा हो, तो भी मरण का उल्लेख मान्य है। 

देव की सलाह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है-

‘मरनौ या विधि बरनिये जाते रस न नसाइ’। 

भारतेन्दु की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-

‘एहो प्रान प्यारे बिन दरस तिहारे भये,
मुये हूँ पै आँखें हैं खुली ही रह जाएँगी’।
‘मरण’ के गृहीत हो जाने से सम्पूर्ण व्यभिचारी भाव विप्रलम्भ या वियोग-श्रृंगार में चले आते हैं।



***********************************
*****************








रस के भेद विस्तार से !

मुख्य प्रष्ठ - रस : रस की परिभाषा, भेद और उदाहरण

रस के प्रकार -

श्रृंगार रस हास्य रसरौद्र रसकरुण रसवीर रसअद्भुत रसवीभत्स रसभयानक रसशांत रसवात्सल्य रसभक्ति रस

अन्य लेख पढ़ें:

हिन्दी व्याकरण -

भाषा वर्ण शब्द पदवाक्य संज्ञा सर्वनाम विशेषणक्रिया क्रिया विशेषण समुच्चय बोधक विस्मयादि बोधक वचन लिंग कारक पुरुष उपसर्गप्रत्यय संधिछन्द समास अलंकाररस श्रंगार रस विलोम शब्द पर्यायवाची शब्द अनेक शब्दों के लिए एक शब्द
Subject Wise Study : ➭ Click Here