संस्कृत में धातु रूप के अंतर्गत लट्, लङ्ग् लकार का प्रयोग तथा संज्ञा एवं सर्वनाम शब्द रूप के अनुरूप क्रिया के प्रथम, मध्यम एवं उत्तम पुरुषों का प्रयोग:

तिड्न्त प्रकरण (धातु रूप)

क्रिया वाचक प्रकृति को ही धातु (तिड्न्त ) कहते है। जैसे : भू, स्था, गम् , हस् आदि। संस्कृत में धातुओं की दस लकारे होती है।

संस्कृत की लकारे-

  1. लट् लकार (Present Tense)
  2. लोट् लकार (Imperative Mood)
  3. लङ्ग् लकार (Past Tense)
  4. विधिलिङ्ग् लकार (Potential Mood)
  5. लुट् लकार (First Future Tense or Periphrastic)
  6. लृट् लकार (Second Future Tense)
  7. लृङ्ग् लकार (Conditional Mood)
  8. आशीर्लिन्ग लकार (Benedictive Mood)
  9. लिट् लकार (Past Perfect Tense)
  10. लुङ्ग् लकार  (Perfect Tense)

धातु रूप के तीन पुरुष होते है -

  1. प्रथम पुरुष (Third Person)
  2. मध्यम पुरुष (Second Person)
  3. उत्तम पुरुष (First Person)

उत्तम पुरुष:

अस्मद् शब्द रूप उत्तम पुरुष में आते हैं ।

मध्यम पुरुष:

युस्मद् शब्द रूप मध्यम पुरुष में आते हैं ।

प्रथम पुरुष:

अन्य सभी रूप प्रथम पुरुष में आते हैं। 

प्रत्येक पुरुष के तीन वचन होते हैं -

  1. एकवचन (Singular Number)
  2. द्विवचन (Dual Number)
  3. वहुवचन (Plural Number)

सभी विभक्तियों (धातु रूपों ) को दो भागों में बांटा गया है-

  1. परस्मैपद 
  2. आत्मेनपद 
परस्मैपद के 9 रूप आत्मेनपद के 9 रूप मिलाकर प्रत्येक लकार में 18 रूप होते हैं। कुल 10 लकारें होती है। इस प्रकार कुल एक धातु की (10 *18) 180 विभक्तियाँ(धातु रूप) होती हैं। 

  • हमारे पाठ्यक्रम में अधिकतर परस्मैपद धातु रूप की 6 लकारों का अध्ययन किया जाता है। 


परस्मैपद पद की सभी लकारों की धातु रूप सरंचना:

१- लट् लकार (वर्तमान काल, Present Tense) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष ति  तस् (त:) अन्ति 
मध्यम पुरुष सि  थस् (थ:) थ 
उत्तम पुरुष मि  वस् (व:) मस् (म:)

२- लोट् लकार (अनुज्ञा, Imperative Mood) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष तु  ताम्  अन्तु 
मध्यम पुरुष हि  तम्  त 
उत्तम पुरुष आनि  आव  आम 

३- लङ्ग् लकार (भूतकाल, Past Tense) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष त्  ताम्  अन् 
मध्यम पुरुष स्  तम्  त 
उत्तम पुरुष अम्  व  म 

४- विधिलिङ्ग् लकार (चाहिए के अर्थ में, Potential Mood) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष यात्  याताम्  युस् 
मध्यम पुरुष यास्  यातम्  यात 
उत्तम पुरुष याम्  याव  याम 

५- लुट् लकार (First Future Tense or Periphrastic) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष ता  तारौ  तारस् 
मध्यम पुरुष तासि  तास्थस्  तास्थ
उत्तम पुरुष तास्मि  तास्वस्  तास्मस् 

६- लृट् लकार (भविष्यत्, Second Future Tense) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष स्यति  स्यतस् (स्यत:) स्यन्ति 
मध्यम पुरुष स्यसि स्यथस् (स्यथ:) स्यथ
उत्तम पुरुष स्यामि  स्याव: स्याम:

७- लृङ्ग् लकार (हेतुहेतुमद्भूत , Conditional Mood) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष स्यत्  स्यताम्  स्यन् 
मध्यम पुरुष स्यस्  स्यतम्  स्यत् 
उत्तम पुरुष स्यम स्याव स्याम

८- आशीर्लिन्ग लकार (आशीर्वाद देना, Benedictive Mood) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष यात्  यास्ताम्  यासुस् 
मध्यम पुरुष यास्  यास्तम्  यास्त 
उत्तम पुरुष यासम्  यास्व  यास्म 

९- लिट् लकार (Past Perfect Tense) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष अ  अतुस्  उस् 
मध्यम पुरुष थ  अथुस्  अ 
उत्तम पुरुष अ  व  म 

१०- लुङ्ग् लकार (Perfect Tense)

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष द्  ताम्  अन् 
मध्यम पुरुष स्  तम्  त 
उत्तम पुरुष अम्  व  म 


आत्मेनपद पद की सभी लकारों की धातु रूप सरंचना:

१- लट् लकार (वर्तमान काल, Present Tense) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष ते  आते  अन्ते 
मध्यम पुरुष से  आथे  ध्वे 
उत्तम पुरुष ए  वहे  महे 

२- लोट् लकार (अनुज्ञा, Imperative Mood) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष ताम्  आताम्  अन्ताम् 
मध्यम पुरुष स्व  आथाम्  ध्वम् 
उत्तम पुरुष ऐ  आवहै  आमहै 

३- लङ्ग् लकार (भूतकाल, Past Tense) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष त  ताम्  अन्त 
मध्यम पुरुष थास्  आथाम्  ध्वम् 
उत्तम पुरुष इ  वहि  महि 

४- विधिलिङ्ग् लकार (चाहिए के अर्थ में, Potential Mood) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष ईत ईयाताम्  ईरन् 
मध्यम पुरुष ईथास्  ईयाथाम्  ईध्वम् 
उत्तम पुरुष ईय  ईवहि  ईमहि 

५- लुट् लकार (First Future Tense or Periphrastic) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष ता  तारौ  तारस 
मध्यम पुरुष तासे  तासाथे  ताध्वे 
उत्तम पुरुष ताहे  तास्वहे  तास्महे 

६- लृट् लकार (भविष्यत्, Second Future Tense) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष स्यते  स्येते  स्यन्ते 
मध्यम पुरुष स्यसे  स्येथे  स्यध्वे 
उत्तम पुरुष स्ये  स्यावहे  स्यामहे 

७- लृङ्ग् लकार (हेतुहेतुमद्भूत , Conditional Mood) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष स्यत  स्येताम्  स्यन्त 
मध्यम पुरुष स्यथास्  स्येथाम्  स्यध्वम् 
उत्तम पुरुष स्ये  स्यावहि  स्यामहि 

८- आशीर्लिन्ग लकार (आशीर्वाद देना, Benedictive Mood) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष सीष्ट सियास्ताम्  सीरन्  
मध्यम पुरुष सीष्टास्  सीयस्थाम्  सीध्वम् 
उत्तम पुरुष सीय  सीवहि  सीमहि 

९- लिट् लकार (Past Perfect Tense) 

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष ए  आते  इरे 
मध्यम पुरुष से  आथे  ध्वे 
उत्तम पुरुष ए  वहे  महे 

१०- लुङ्ग् लकार (Perfect Tense)

पुरुष

एकवचन

द्विवचन

वहुवचन

प्रथम पुरुष त  आताम्  अन्त 
मध्यम पुरुष थास्  आथम्  ध्वम् 
उत्तम पुरुष ए  वहि  महि 

धातुओं का वर्गीकरण (भेद): धातु-विभाग

संस्कृत की सभी धातुओं को 10 भागों में बांटा गया है। प्रत्येक भाग का नाम "गण"  (Conjugation) है। -
  1. भ्वादिगण
  2. अदादिगण
  3. ह्वादिगण (जुहोत्यादि)
  4. दिवादिगण 
  5. स्वादिगण
  6. तुदादिगण
  7. तनादिगण
  8.  रूधादिगण
  9. क्रयादिगण
  10. चुरादिगण

1- भ्वादिगण (प्रथम गण - First Conjugation)

     लट्, लोट्, लङ्ग्, विधिलिङ्ग् - इन चार लकारों में भ्वादिगी धातु के उत्तर में 'अ' होता है। 'अ' अंतिम वर्ण मे सदा युक्त होता है।
     लट्, लोट्, लङ्ग्, विधिलिङ्ग् लकार में निम्न धातुओं में भ्वादिगणीय परिवर्तन होते हैं -
  • दृश्  -  पश्य 
  • शद्  - शीय 
  • घ्रा   -  जिघ्र 
  • इष्   - इच्छ
  • दाण  - यच्छ 
  • ऋ   - ऋच्छ 
  • सद्  -  सीद् 
  • गम्  - गच्छ
  • ध्मा - धम् 
  • स्था - तिष्ठ 
  • सृ  - धौ 
  • पा  - पिव् 
  • यम - यच्छ 
  • म्ना  - मन

भ्वादिगण की प्रमुख धातुयें -

  1. भू-भव् (होना, to be )
  2. गम्-गच्छ (जाना, to  go )
  3. दृश् (देखना, to see )
  4. पा-पिव् (पीना, to drink )
  5. जि (जीतना, to win )
  6. घ्रा-जिघ्र (सूँघना, to  smell )
  7. पत् (गिरना, to fall )
  8. वस् (रहना/निवास करना, to dwell )
  9. वद् (बोलना, to speak )
  10. स्था-तिष्ठ (ठहरना/प्रतीक्षा करना, to stay / to wait )
  11. जि-जय् (जीतना, to conquer )
  12. क्रम्-क्राम् (चलना, to  pace )
  13. सद्-सीद् (दु:ख पाना, to be sad )
  14. ष्ठिव्-ष्ठीव् (थूकना, to spit )
  15. दाण-यच्छ (देना, to give )
  16. लभ् (प्राप्त करना, to obtain )
  17. वृत् (वर्तमान रहना, to be / to exist )
  18. सेव् (सेवा करना, to nurse/ to worship ) 
  19. स्वनज् (आलिङ्गन् करना, to embrace )
  20. धाव् (उभयपदी) (दौडना /साफ़ करना, to run / to clean )
  21. गुह् (उभयपदी ) (छिपाना, to hide )

2- अदादिगण (द्वतीय गण - Second Conjugation)

      अदादिगण में गण चिह्न कुछ भी नहीं रहता है। धातु का अत्यंक्षर विभक्ति से मिल जाता है। जैसे - 
  • अद् + ति = अत्ति। 
     लट् लकार के तीनों पुरुषों के एकवचन को, लोट् लकार के प्रथम पुरुष के एकवचन को और उत्तम पुरुष के तीनों वचनों को तथा लङ्ग् लकार के तीनों पुरुषों के एकवचन को छोड़कर शेष विभक्तियों में 'अस्' धातु के अकार का लोप हो जाता है। जैसे - 
  • अस्ति -> स्त: -> सन्ति
     विधिलिंग की सभी विभक्तियों में अकार का लोप हो जाता है। जैसे- 
  • स्यात् -> स्याताम् -> स्यु: 
     'अस्' धातु के लोट् लकार के मध्यमपुरुष एकवचन में एधि, हन् धातु के लोट् मध्यमपुरुष एकवचन में जहि और शास् धातु के लोट् मध्यमपुरुष एकवचन में शाधि रूप हो जाते है। 
     'अस्' धातु लट्, लोट्, लङ्ग्, और विधिलिङ्ग् को छोड़कर अन्य लकारों में 'भू' हो जाता है और 'भू' धातु के ही रूप होते है। 
     'हन्' धातु के लट्, लोट् और लङ्ग् लकार के प्रथम पुरुष वहुवचन में 'घ्नन्तु' हो जाता है। जैसे -
  • हन् + लट् + अन्ति = घ्नन्ति 
  • हन् + लोट् + अन्तु = घ्नन्तु 
  • हन् + लङ्ग् + अन् = अघ्नम्  
     ति, सि, मि, तु, आनि, आव, आम, ए, आवहै, द्, स्, और अम्  विभक्तियों में अदादिगणीय धातुओं के अन्त्य स्वर और आधा लघु स्वर का गुण होता है।

अदादिगण की प्रमुख धातुएं -

  1. अद् (भोजन करना, to eat )
  2. अस् (होना, to be )
  3. हन् (मारना, to kill )
  4. विद् (जानना, to know )
  5. या (जाना, to  go )
  6. रुद् (रोना, to weep )
  7. जागृ (जागना, to wake )
  8. इ (आना, to come )
  9. आस् (वैठना, to sit / stay )
  10. शी (सोना, to sleep )
  11. द्विष् (उभयपदी) (द्वेष करना, to  hate )
  12. ब्रू (उभयपदी) (बोलना, to speak )
  13. दुह् (दूहना, to milk ) उभयपदी

3- ह्वादिगण (जुहोत्यादि) (तृतीय गण - Third Conjugation)

  • ह्वादिगण में चिन्ह नहीं लगता। इसमें धातुओं के पहले अक्षर का द्वित्व हो जाता है। द्वित्व होने पर प्रथमाक्षर में यदि दीर्घ स्वर रहे तो वह ह्रस्व हो जाता है और वर्ग का दूसरा वर्ण अपने वर्ग के प्रथम  वर्ण में बदल जायेगा। चौथा वर्ण तीसरे वर्ण में बदल जायेगा। इसी तरह क-वर्ग, च-वर्ग में और हकार, च-वर्ग के तीसरे वर्ण में बदल जायेगा। 
  • लट्, लोट्, लङ्ग्, और विधिलिङ्ग् - इन चारों में ह्वादिगणीय धातु अभ्यस्त होते है और लिट् में अभ्यस्त धातु के पूर्व भाग के जो सब कार्य निर्दिष्ट हुए हैं, वे सब ही होते हैं। 
  • ति, सि, मि, अति, तु, आव, आम, ऐ, आवहै, द्, स्, अम् -  इनमें ह्वादिगणीय धातु के अन्त्य स्वर उपधा लघु स्वर का गुण हो जाता है।
  • सबल (Strong) विभक्तियों में धातु के अंतिम स्वर का गुण होता है। 
  • लट् और लोट् लकार के प्रथम पुरुष वहुवचन (Third Person Plural) (अन्ति और अन्तु) विभक्ति के नकार का लोप हो जाता है। 
  • 'भी'  धातु के रूप दुर्बल (Weak) विभक्तियों में विकल्प से ह्रस्व भी होते हैं। जैसे - विभित: और विभीत: दोनों।
  • लङ्ग् लकार के प्रथम पुरुष वहुवचन (Third Person Plural) में 'अन्' के स्थान पर 'उस्' होता है और धातु के अन्तिम स्वर का गुण हो जाता है। 

ह्वादिगण की प्रमुख धातुएं -

  1. हु (हवन करना, to sacrifice )
  2. भी (डरना, to be afraid )
  3. दा (देना, t give ) उभयपदी
  4. विज् - उभयपदी

4- दिवादिगण (चतुर्थ गण - Fourth Conjugation)

  • लट्, लोट्, लङ्ग्, और विधिलिङ्ग् - इनमे दिवादिगणीय धातुओं के उत्तर "" होता है। यही "" इस गण का चिन्ह है।
  • दिव्, सिव्, और ष्ठिव् धातुओं के इलावा इकार का दीर्घ हो जाता है। जैसे- दिव्यति-सीव्यति-ष्ठीव्यति इत्यादि। 

दिवादिगण की प्रमुख धातुएं -

  1. दिव् (क्रीडा करना, to play )
  2. सिव् (सीना, to sew )
  3. नृत् (नाचना, to dance )
  4. नश् (नाश होना, to perish / to be lost )
  5. जन् (उत्पन्न होना, to be born / to grow )
  6. विद् (रहना, to exist )
  7. शम् (शान्त होना, to be calm /to stop )

5- स्वादिगण (पञ्चम्  गण - Fifth Conjugation)

  • लट्, लोट्, लङ्ग्, और विधिलिङ्ग् - इनमें स्वादिगणीय धातु के आगे 'नु' का आगम होता है। यही 'नु' गणचिन्ह होता है।
  • ति, सि, मि, तु, आनि, आव, आम, ऐ, आवहै, आमहै, द्, स्, अम् - इन कई एक  सबल विभक्तियों में 'नु' के उकार का गुण 'नो' हो जाता है। 
  • यदि 'नु' का 'उ' दूसरे अक्षर से संयुक्त ना हो तो लोट लकार के मध्यम पुरुष एकवचन की विभक्ति 'हि' का लोप हो जाता है, परन्तु संयुक्त अक्षर  होने पर ऐसा नहीं होता है। जैसे - 
    • सुनु + हि = सुनु ('हि'  का लोप )
    • आप्नु + हि = आप्नुहि 
  • उत्तम पुरुष  के द्विवचन और वहुवचन में 'व' और 'म' दूर रहने से 'नु' के उकार का लोप भी होता है। जैसे -
    • सुनु + व: = सुन्व: / सुनव:
    • सुनु + म: = सुन्म: / सुनुम:

स्वादिगण की प्रमुख धातुएं -

  1. सु (स्नान करना, to bathe )
  2. श्रु (सुनना, to hear )
  3. आप् (प्राप्त करना, to obtain )

6- तुदादिगण (षष्ठं गण - Sixth Conjugation)

  • लट्, लोट्, लङ्ग्, और विधिलिङ्ग् - में धातुओं के साथ 'अ' जोड़ दिया जाता है। 
  • भ्वादिगण और तुदादिगण दोनों का गण  चिन्ह 'अ' होता है। इन दोनों में भेद इतना ही है कि भ्वादिगण में धातु के अंतिम स्वर और उपधा लघु स्वर का गुण होता है। 
  • तुदादिगण में गुण नहीं होता है। जैसे -
    • तुद् + अ = तुदति (तोदति गलत है )
  • मुच्, सिच्, क्रत्, विद्, लिप्, और लुप् धातुओं के उपधा में 'न्' जोड दिया जाता है। जैसे -
    • मुच् + अ + ति = मुञ्चति 
    • सिच् +अ + ति = सिञ्चति 

तुदादिगन की प्रमुख धातुएं -

  1. तुद् (पीडा देना, to oppress )
  2. स्प्रश (छूना, to touch )
  3. इष् (इच्छा करना, to wish )
  4. प्रच्छ् (पूछना, to ask )
  5. मृ (मरना , to die )
  6. मुच् (छोडना, to leave ) उभयपदी  

7- तनादिगण (सप्तम्  गण - Seventh Conjugation)

  • लट्, लोट्, लङ्ग्, और विधिलिङ्ग् - इनमें धातुओं के आगे 'उ' आता है और 'उ' अन्त्य वर्ण में मिल जाता है। 
  • ति, सि, मि, तु, आनि, आव, आम, ऐ, आवहै, आमहै, त्, स्, और अम् - इनके 

8- रूधादिगण (अष्टं गण - Eighth Conjugation)

9- क्रयादिगण (नवम् गण - Ninth Conjugation)

10- चुरादिगण (दशम् गण - Tenth Conjugation)

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महत्वपूर्ण शब्द रूपों की सूची - संस्कृत व्याकरण (सुबंत प्रकरण)

     "संस्कृत में सबसे बड़ी परेशानी शब्द रूपों को लेकर होती है। संस्कृत में करीब 2400 शब्द हैं जिनके रूप हमें याद करने होते हैं। अब जाहिर सी बात है कि इतने सारे शब्द रूप याद हो जाएं यह संभव नहीं है। या फिर वे विरले ही लोग हैं जिन्हें इतने शब्द रूप याद हो सकें।"     शब्द रूप में हम एक बात देखते हैं कि प्रथम और द्वितीय में तीनों वचनों में रूप कुछ कुछ अलग और कुछ कुछ समान होते हैं। लेकिन यहां हम इनकी बात बाद में करेंगे। पहले बात करेंगे तृतीय विभक्ति से लेकर सप्तमी विभक्ति तक। क्योंकि मैं जो यहां ट्रिक बताने जा रहा हूं उसमें इस टेबल का बड़ा योगदान है। आप इस टेबल को अगर एक बार ध्यान पूर्व पढऩे के बाद सीख गए तो आपको शब्द रूप बनाने में कभी कोई परेशानी नहीं होगी। क्योंकि यही टेबल मेरी सारी मेहनत का सार है।

छह वर्गों में आने वाले कुछ महत्वपूर्ण संज्ञा पदों के शब्द रूप इस प्रकार हैं -

  1. देव (देवता),
  2.  बालक ,
  3.  विश्वपा (विश्व के रक्षक),
  4.  पति (स्वामी),
  5.  सखि (सखा/मित्र),
  6.  सुधी (पंडित),
  7.  साधु ,
  8.  स्वयम्भू (ब्रह्म),
  9.  दातृ (दाता /दानी),
  10.  पितृ (पिता),
  11.  रै (धन /सोना),
  12.  गो (गौ / बैल / इन्द्रियाँ / किरण / सूर्य),
  13.  ग्लौ (चन्द्रमा/कपूर),
  14.  लता ,
  15.  ज़रा (बुढ़ापा),
  16.  मति (बुध्दि),
  17. नदी
  18.  श्री (लक्ष्मी, शोभा)
  19. स्त्री (woman)
  20. धेनु (गाय)
  21. वधू (स्त्री ,पतोहू ,wife )
  22. भू (पृथ्वी)
  23. मातृ (माता, mother )
  24. स्वसृ (sister )
  25. फल (fruit )
  26. वारि (जल, water)
  27. दधि (दही , curd )
  28. मधु (शहद, honey )
  29. अनादि (जिसकी आदि ना हो, without beginning )
  30. स्वादु (स्वादिष्ट , tasteful )
  31. धातृ ( धाता , creator )
  32. चकारांत - जलमुच् (मेघ , cloud )
  33. प्राच् (पूर्व दिशा )
  34. प्रत्यच् (पश्चिम दिशा )
  35. जकारान्त शब्द - बणिज् (व्यापारी , tradesman )
  36. सम्राज् (सम्राट , Emperor )
  37. तकरान्त् - भूमृत् (पहाड / राजा , mountain or king )
  38. 'अत् (शतृ )' प्रत्यांत शब्द धावत् (दौडता हुआ, running )
  39. 'मत्' प्रत्यायान्त शब्द - श्रीमत् ( धनवान् , wealthy )
  40. महत् (बडा , महान् , great )
  41. दकारान्त शब्द - सुह्रद् (दोस्त , friend )
  42. धकारान्त शब्द - वीरूध् (लता, creeper )
  43. 'अन्' भागान्त - लघिमन् (छोटापन , lowliness or lightness )
  44. आत्मन्  (आत्मा , soul )
  45. स्वन् (कुत्ता , dog )
  46. युवन् (जवान, young )
  47. मघवन् (इन्द्र)
  48. इन्  भागान्त् - गुणिन् (गुणी , meritorious )
  49. पथिन् (रास्ता , passage )
  50. हन् भागान्त पुल्लिङ्ग् - वृत्रहन् (Indra )
  51. पकारान्त 'अप्' शब्द (जल)
  52. भकारान्त शब्द - ककुभ् (दिशा / अर्जुन वृक्ष )
  53. शकारांत शब्द - विश् (वैश्य, vasishya )
  54. स्त्रीलिङ्ग शब्द - दिश्  (दिशा , direction )
  55. षकारान्त शब्द - द्विष् (शत्रु )
  56. वेधस् (ब्रह्मा )
  57. उशनस् (शुक्राचार्य , Shukra )
  58. दोस् (हाथ, Hand )
  59. विद्वस् (विद्वान , A Learned man )
  60. जग्मिवस् (चला गया / बीत गया , Gone or Past )
  61. इयस् भागान्त - लघीयस् (हल्का / छोटा , light or small )
  62. पुमस् (आदमी, Man )
  63. रकारान्त शब्द - गिर् (वाणी , words )
  64. वकारान्त शब्द - दिव् (आकाश , स्वर्ग , sky , heavan)
  65. सकारान्त शब्द - आशिस् (आशीर्वाद , blessing )
  66. हकारान्त शब्द - मधुलिह् (मधुमक्खी )
  67. उपानह् (जूता , shoes )
  68. व्यञ्जनान्त (हलन्त ) नपुन्सकलिङ्ग्   
  69. चकारान्त शब्द - प्राच् (पूर्व, east )
  70. उदच् (उत्तर , north )
  71. तिर्य्यच्  (पक्षी , bird )
  72. प्रत्यच् (पश्चिम , west )
  73. तकरान्त शब्द - भविष्यत् (future )
  74. अत् प्रत्यान्त् शब्द - गच्छत् (जाता हुआ , going )
  75. इच्छत् (चाहता हुआ , wishing )
  76. ददत् (देता हुआ ,giving )
  77. महत् (बड़ा , great )
  78. दकारांत शब्द - ह्रद् (ह्रदय, heart )
  79. अन् भागान्त शब्द - धामन्  (घर, house )
  80. कर्म्मन्  (काम , work )
  81. अहन्  (दिन, day )
  82. इन्  भागान्त  शब्द - स्थायिन् (टिकाऊ /स्थायी , permanent / durable )
  83. अस् भागान्त शब्द - पयस्  (पानी/दूध , water /milk )
  84. उस् भागान्त शब्द - धनुस् (धनुष , bow )

सर्वनाम (Pronoun ):-

सर्वनाम शब्द रूप के अनुसार पांच विभागों में विभक्त है। - १-सर्व्वादि , २- अन्यादि , ३- पूर्वादि , ४- इदमादि और ५- यदादि। सर्वनाम का सम्बोधन नहीं होता है। 
नोट :- सर्व, विश्व, उभय, एक, और एकतर इन शब्दों रूप एकसमान ही होते है।
  1. सर्व्वादि - सर्व (पुल्लिंग ) ( सभी , all ) -- 
  2. सर्व - क्लीवलिंग (नपुंसकलिंग )
  3. सर्व - स्त्रीलिंग 
  4. अन्यादि - अन्य, अन्यतर, इतर, क़तर, कतम, और एकतम आदि शब्दों के रूप सर्व्वादि के तुल्य हैं। केवल नपुंसकलिंग के प्रथमा तथा द्वतीया विभक्ति के एकवचन में - अन्यत् , अन्यतरत् , इतरत् , कतमत्  और एकतमत् ऐसा रूप होता है। 
  5. पूर्व्वादि - पूर्व, पर, अपर, अवर, अघर, दक्षिण, उत्तर, स्व इनके रूप एकसमान होते हैं। 
  6. पूर्व्व - पुल्लिंग 
  7. पूर्व्व - क्लीवलिंग (नपुंसकलिंग )
  8. इदमादि - इदम् , अस्मद् , युष्मद् , अदस् , शब्दो के रूप मे भेद होने के कारण अलग अलग लिखे जाते है। 
  9. इदम् - पुल्लिङ्ग् ( यह , this )
  10. इदम् - क्लीवलिंग (नपुंसकलिंग )
  11. इदम् - स्त्रीलिङ्ग 
  12. अस्मद् - सभी लिङ्गो में ( मै / हम लोग , I / We )
  13. युष्मद्  - सभी लिङ्गो में ( तू / तुम , You )
  14. अदस् - पुल्लिङ्ग् (वह , That )
  15. अदस् - क्लीवलिंग (वह , That )
  16. अदस् - स्त्रीलिङ्ग (वह , That )
  17. यदादि - यद् , तद् , एतद् , त्यद् , किम् - इन शब्दों का क्रमशः य: , स: , एष: , स्य: , क: होता है। और सर्व्वादि के तुल्य रूप होते हैं। नपुंसकलिंग में प्रथमा और द्वतीया के एकवचन में यत् , तत् , एतत् , त्यत् , किम् होता है। स्त्रीलिंग में इन शब्दों का रूप या , सा , एषा , स्या, का, होता है। 
  18. यद्  - पुल्लिंग (जो, Who )
  19. यद् - स्त्रीलिङ्ग (जो, Who )
  20. यद् - क्लीवलिंग (नपुंसकलिंग ) (जो, Who )
  21. तद् - पुल्लिङ्ग् (वह , That )
  22. तद् - स्त्रीलिङ्ग (वह , That )
  23. तद् - क्लीवलिंग (नपुंसकलिंग )  (वह , That )
  24. एतद् - पुल्लिङ्ग् (यह , This )
  25. एतद् - स्त्रीलिङ्ग (यह , This )
  26. एतद् - क्लीवलिंग  (नपुंसकलिंग ) (यह , This )
  27. किम् - पुल्लिङ्ग् (क्या , कौन , What , Who )
  28. किम् - स्त्रीलिङ्ग (क्या , कौन , What , Who )
  29. किम् - क्लीवलिंग (नपुंसकलिंग ) (क्या , कौन , What , Who )

संख्यावाची शब्द (Numerals):-

एक शब्द एक वचनान्त है, पर कुछ के अर्थ में वह कभी कभी बहुवचन भी होता है। एक शब्द का रूप सर्व के समान होता है।
  1. एक (One ) - एकवचनान्त एक
  2. द्वि  (Two ) - नित्य द्विवचनान्त
  3. त्रि (Three ) - नित्य वहुवचनान्त शब्द
  4. चतुर (Four ) - नित्य वहुवचनान्त शब्द
  5. पञ्चन् (Five ) , षष्  (Six ) , अष्टन् (Eight )

महत्वपूर्ण पेज लिंक्स : -

सुबंत प्रकरण - संस्कृत में विभक्तियाँ और उनके नियम
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पद ( सार्थक शब्द ) क्या होते है ?

सार्थक शब्द वे होते है जो वाक्य मे प्रयोग करने पर खास अर्थ का बोध कराते है । तथा सार्थक शब्दो को ही पद कहा जाता है। उदाहरण के लिए-        राम : , गच्छति  → ये दोनों शब्द है ।
        राम : गच्छति । →  ये पद हुआ ।
इस उदाहरण मे दो पद हुए -- 'राम' और 'गच्छति' । 'राम:' सुबंत के अंतर्गत तथा 'गच्छति' तिङन्त के अंतर्गत आते है।
वैयाकरण में पतंजलि ने पदों का वर्गीकरण चार वर्गों में किया है -
चत्वारि पदजातानि नामाख्यातोपसर्गनिपाता: । 
अर्थात नाम , आख्यात , उपसर्ग , और निपात ये चार प्रकार के शब्द वर्ग है।

सार्थक शब्दों को दो वर्गों में बांटा  गया है। 

  1. सुबंत 
  2. तिङन्त

(क) सुबंत प्रकरण 

संज्ञा और संज्ञा सूचक शब्द सुबंत के अंतर्गत आते है । सुबंत प्रकरण को व्याकरण मे सात भागो मे बांटा गया है - नाम, संज्ञा पद, सर्वनाम पद, विशेषण पद, क्रिया विशेषण पद, उपसर्ग, निपात । ...और अधिक पढ़े।

(ख) तिड्न्त प्रकरण 

 क्रिया वाचक प्रकृति को ही धातु (तिड्न्त ) कहते है। जैसे : भू, स्था, गम् , हस् आदि। संस्कृत में धातुओं की दस लकारे होती है...और अधिक पढ़े।


अन्य महत्वपूर्ण प्रष्ठ:

पद  (सार्थक शब्द) -

  1. सुबंत प्रकरण 
  2. तिङन्त प्रकरण 

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सुबंत प्रकरण

संज्ञा और संज्ञा सूचक शब्द सुबंत के अंतर्गत आते है । सुबंत प्रकरण को व्याकरण मे सात भागो मे बांटा गया है - नाम, संज्ञा पद, सर्वनाम पद, विशेषण पद, क्रिया विशेषण पद, उपसर्ग, निपात ।

विभक्तियाँ कितनी होती है ?

प्रातिपदिक के उत्तर प्रथमा से लेकर सप्तमी तक सात विभक्तियाँ होती हैं:-

संस्कृत की विभक्तियाँ, कारक और उनका अर्थ:-

क्रम

कारक

प्रयोग

प्रथमा
कर्त्ता
ने
द्वतीया
कर्म
को
तृतीया
करण
से, के साथ, के जैसा
चतुर्थी
सम्प्रदान
के लिए,
पंचमी
अपादान
से, अलग होने के अर्थ में
षष्ठी
सम्बन्ध
का, की, के
सप्तमी
अधिकरण
में, पे, पर

प्रत्येक बिभक्ति के तीन वचन होते हैं :- 

  1. एकवचन
  2. द्विवचन
  3. बहुवचन

विभक्तियों के रूपों का पदक्रम :-

विभक्ति

एकवचन 

द्विवचन 

वहुवचन् 

प्रथमा
अ: आ: (जस् )
द्वतीया
अम् औट् आ: (शस् )
त्रतीया
आ (टा) भ्याम् भि: (भिस् )
चतुर्थी
ए (ङे ) भ्याम् भ्य: (भ्यस् )
पञ्चमी
अ: (ड़स् ) भ्याम् भ्य: (भ्यस् )
षष्ठी
अ: ओ: (ओस् ) आम्
सप्तमी
इ (डि.) ओ: (ओस् ) सु (सुप् )

याद रखने योग्य बातें -

  1. कोई शब्द जब इन विभक्तियों में होता है तब वह पद सुबन्त कहलाता है। 
  2. वाक्यों में केवल पदों का ही प्रयोग  है। पद पांच प्रकार के होते है। - १- विशेष्य, २- विशेषण ३-सर्वनाम ४-अव्यय ५-क्रिया। 
  3. किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान,  भाव, या  गुण के नाम को विशेष्य पद (संज्ञा) कहते है। जैसे - राम:, नदी, लता, क्रोध: आदि। 
  4. जो विशेष्य के गुण  को प्रकट करे वह विशेषण पद कहलाता है। जैसे - सुंदरी नारी , स्वच्छं जलं आदि। 
  5. जो संज्ञापदों की पुनरावृत्ति रोकता है  सर्वनाम पद कहलाता है। जैसे - अन्य , तद् , यद् , इदम् आदि। 
  6. अव्यय उन शब्दों को कहा जाता  है , जो लिंग- वचन , एवं विभक्तियों से सदा अप्रभावित रहता है। जैसे - यदा , कदा , एकदा, आदि। 
  7. गम् , गद् , स्था आदि शब्दो को धातु या क्रिया  कहते है ।

महत्वपूर्ण नोट :-

  • विशेष्य के लिङ्ग-वचन विभक्ति के अनुसार ही विशेषण पद का रूप होता है। 
  • सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति होती है इसलिए सम्बोधन का रूप प्रथमा के जैसा होता है। 
  • किसी-किसी सम्बोधन के एकवचन में कुछ अंतर पाया जाता है। अत: सम्बोधन का रूप अलग  कर दिया गया है। 
  • अव्यय भी सुबन्त होता है क्योकि उनमें सुप्  प्रत्यय लगता है , भले ही वह लुप्त रहता है। 
  • उपसर्ग और निपात दोनों अव्यय ही है। इनका सुप्  भी लुप्त रहता है। 

संस्कृत में शब्द रूप की दृष्टि से संज्ञा पद कितने होते है ?

संस्कृत में शब्द रूप की दृष्टि से संज्ञा पद छह (6) प्रकार के होते हैं-
  1. अजन्त पुल्लिंग - देव, मुनि, भानु, पितृ आदि। 
  2. अजन्त स्त्रीलिंग - लता, मति, धेनु, मातृ  आदि। 
  3. अजन्त नपुंसकलिंग - फल, दधि, मधु, धातृ आदि। 
  4. हलन्त पुल्लिंग - मरुत् , राजन् , वेधस्  आदि। 
  5. हलन्त स्त्रीलिंग - सरित् , गिर् , दिश्  आदि। 
  6. हलन्त नपुंसकलिंग - जगत् , पयस्  आदि। 

छह वर्गों में आने वाले कुछ महत्वपूर्ण संज्ञा पदों के शब्द रूप इस प्रकार हैं -


  1. देव (देवता)
  2. बालक , 
  3. विश्वपा (विश्व के रक्षक), 
  4. पति (स्वामी), 
  5. सखि (सखा/मित्र), 
  6. सुधी (पंडित), 
  7. साधु , 
  8. स्वयम्भू (ब्रह्म), 
  9. दातृ (दाता /दानी), 
  10. पितृ (पिता), 
  11. रै (धन /सोना), 
  12. गो (गौ / बैल / इन्द्रियाँ / किरण / सूर्य), 
  13. ग्लौ (चन्द्रमा/कपूर), 
  14. लता , 
  15. ज़रा (बुढ़ापा), 
  16. मति (बुध्दि),
  17. नदी 
  18. श्री (लक्ष्मी, शोभा)
  19. स्त्री (woman)
  20. धेनु (गाय)
  21. वधू  (स्त्री , पतोहू ,wife )
  22. भू (पृथ्वी)
  23. ..............................पूर्ण लिस्ट देखने के लिए क्लिक करें ।

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उच्चारण स्थान तालिका uccharan sthan ki list

मुख के अंदर स्थान-स्थान पर हवा को दबाने से भिन्न-भिन्न वर्णों का उच्चारण होता है । मुख के अंदर पाँच विभाग हैं, जिनको स्थान कहते हैं । इन पाँच विभागों में से प्रत्येक विभाग में एक-एक स्वर उत्पन्न होता है, ये ही पाँच शुद्ध स्वर कहलाते हैं । स्वर उसको कहते हैं, जो एक ही आवाज में बहुत देर तक बोला जा सके ।

Pronunciation table of Sanskrit and Hindi alphabet -

स्थान 

स्वर 

व्यंजन 

अन्तस्थ 

उष्म 

1. कण्ठ 
अ, आ 
क, ख, ग, घ, ड़
-
ह, अ:
2. तालु 
इ, ई  
च, छ, ज, झ, ञ
श 
3. मूर्द्धा 
ऋ, ॠ 
ट, ठ, ड, ढ, ण
र 
4. दन्त
लृ 
त, थ, द, ध, न
ल 
5. ओष्ठ
उ, ऊ 
प, फ, ब, भ, म
-
-
6. नासिका
-
अं, ड्, ञ, ण, न्, म्
-
-
7. कण्ठतालु
ए, ऐ 
-
-
-
8. कण्ठोष्टय
ओ, औ 
-
-
-
9. दन्तोष्ठ्य
-
-
व 
-

हिंदी की ध्वनियाँ - hindi ki dhwaniya

हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है। एक तो ये जिस रूप में लिखी जाती है, बिल्कुल उसी तरह बोली जाती है, किन्तु अंग्रेज़ी में ऐसा नहीं है. उदाहरण के लिए, बी(B) यू(U) टी(T) का उच्चारण ‘बट’ है तो पी(P) यू(U) टी(T) का ‘पुट’ होता है, जबकि या तो दूसरे शब्द का उच्चारण ‘पट’ होना चाहिए या फिर पहले का ‘बुट’। एक ही स्वर कहीं ‘यु’, ‘यू’ या ‘उ’ है तो कहीं ‘अ’ है। इसी तरह अरबी लिपि में तीन स्वरों से तेरह स्वरों का काम लिया जाता है। हिंदी में ऐसा नहीं है। इसमें लेखन और उच्चारण में बहुत अधिक शुद्धता और समानता मौजूद है। अनुनासिक, अनुस्वार और विसर्ग चिह्नों के प्रयोग ने इसे और वैज्ञानिक बना दिया है। बीसवीं सदी में जब हिंदी ने यूरोपीय भाषाओं से तथा अरबी-फारसी से शब्द अपनाए तो इसके लिए नए चिह्न भी ग्रहण किए। जैसे ‘डॉक्टर’ शब्द अंग्रेज़ी से आया है, इसका पहला स्वर है- ‘ऑ’, चूंकि हिंदी में यह स्वर उपलब्ध नहीं था, यहाँ ‘आ’ तो था; ‘ऑ’ नहीं था, इसलिए हिंदी में अंग्रेज़ी से आए ऐसे शब्दों के उच्चारण के लिए ‘ऑ’ चिह्न को अपना लिया गया। इसी प्रकार अरबी-फारसी के कुछ शब्दों के सटीक उच्चारण के लिए हिंदी ने पाँच नई ध्वनियाँ अपनाई- क़, ख़, ग़, ज़ और फ़। जाहिर है, इससे हिंदी की शब्द-संपदा तो बढ़ी ही, इसमें भावों को और अधिक सूक्ष्मता तथा स्पष्टता से अभिव्यक्त करने की शक्ति भी आई।


हिंदी भाषा की वैज्ञानिकता की दूसरी विशेषता है- इसके शब्दों के उच्चारण की सटीकता। हिंदी भाषा की वर्णमाला में दो वर्ग हैं- स्वर और व्यंजन। इन दोनों वर्गों की ध्वनियों को इतने वैज्ञानिक तरीक़े से व्यवस्थित किया गया है कि इनके द्वारा किसी भी अभाषी व्यक्ति को हिंदी का पूरी सरलता के साथ शुद्ध उच्चारण करना सिखाया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि हम ‘उच्चारण के स्थान’ के आधार पर हिंदी की स्वर और व्यंजन ध्वनियों का बंटवारा करना चाहें, तो आसानी से किया जा सकता है। स्वर ध्वनियों के उच्चारण में किसी अन्य ध्वनि की सहायता नहीं ली जाती। वायु मुखगुहा से बिना किसी अवरोध के बाहर निकलती है, किन्तु व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरों की सहायता ली जाती है। व्यंजन वह ध्वनि है जिसके उच्चारण में भीतर से आने वाली वायु मुखगुहा में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में बाधित होती है। मुखगुहा के उन ‘लगभग अचल’ स्थानों को उच्चारण बिन्दु (articulation point) कहते हैं, जिनको ‘चल वस्तुएँ’ (Movable things) छूकर जब ध्वनि-मार्ग में बाधा डालती हैं तो ध्वनियों का उच्चारण होता है। मुखगुहा में ‘अचल उच्चारक’ मुख्यतः मुखगुहा की छत का कोई भाग होता है जबकि ‘चल उच्चारक’ मुख्यतः जिह्वा, नीचे वाला ओष्ठ, तथा श्वासद्वार (ग्लोटिस) होते हैं। यानी कुछ ध्वनियों का उच्चारण कंठ, तालु, मूर्द्धा, दंत तथा ओष्ठ से किया जाता है तो कुछ का मुख के अंगों जैसे कंठ+तालु, कंठ+ओष्ठ, दंत+ओष्ठ, और मुख+नाक से संयुक्त रूप से भी किया जाता है।

हिंदी की सभी ध्वनियों का उनके उच्चारण स्थान के आधार पर वर्गीकरण-

कंठ्य ध्वनियाँ- kanth se bole jane bale varn

इस वर्ग की सभी ध्वनियों का उच्चारण कंठ से होता है। इस वर्ग की ध्वनियाँ हैं- अ, आ (स्वर); क, व, ग, घ, ङ (व्यंजन)।

तालव्य ध्वनियाँ- taalu se bole jane vale varn

जिस ध्वनियों के उच्चारण में जिह्वा का मध्य भाग तालु से स्पर्श करता है, उन्हें तालव्य कहते हैं। इ, ई (स्वर); च, छ, ज, झ, ञ, श, य (व्यंजन)।

मूर्द्धन्य ध्वनियाँ- moordha se bole jane vale varn

इसके अंतर्गत वे ध्वनियाँ रखी गई हैं, जिनका उच्चारण मुर्द्धा से होता है, जैसे- ट, ठ, ड, ढ, ण, ष (सभी व्यंजन ध्वनियाँ)।

दन्त्य ध्वनियाँ-  dant se bole jane vale varn

त, थ, द, ध, न, र, ल, स, क्ष (सभी व्यंजन ध्वनियाँ)।

ओष्ठ्य ध्वनियाँ- oshth se bole jane vale varn

जो ध्वनियाँ दोनों होंठों के स्पर्श से उत्पन्न होती है, उन्हें ओष्ठ्य कहते हैं। हिंदी में प, फ, ब, भ, म ध्वनियाँ ओष्ठ्य हैं।

अनुनासिक ध्वनियाँ- anunasik varn

इन ध्वनियों का उच्चारण मुंह और नाक दोनों के सहयोग से होता है। इनके उच्चारण के दौरान कुछ वायु नाक से निकलते हुए एक अनुगूंज-सी पैदा करती है। हिंदी की व्यंजन ध्वनियों का प्रत्येक वर्ग पाँच वर्णों का है, जो एक ही स्थान से उच्चारित होते हैं, जैसे- क, ख, ग, घ, ङ या च, छ, ज, झ, ञ या ट, ठ, ड, ढ, ण या त, थ, द, ध, न अथवा प, फ, ब, भ, म। इनके प्रत्येक वर्ग की अंतिम ध्वनि अर्थात ङ, ञ, ण, न और म अनुनासिक ध्वनि है। देवनागरी लिपि में अनुनासिकता को चन्द्रबिंदु (ँ) द्वारा व्यक्त किया जाता है। किंतु जब स्वर के ऊपर मात्रा हो तो चन्द्रबिन्दु के स्थान पर केवल बिंदु (ं) लगाया जाता है, जैसे – अँ, ऊँ, ऐं, ओं आदि। अनुस्वार भी इसी के अंतर्गत आते हैं

दन्त्योष्ठ्य ध्वनियाँ- dantoshth se bole jane vale varn

जिन व्यंजनों का उच्चारण दन्त और ओष्ठ की सहायता से होता है, उन्हें दन्त्योष्ठ्य व्यंजन ध्वनियाँ कहते हैं। जैसे – फ, व।

कंठ-तालव्य ध्वनियाँ- kanth talu se bole jane vale varn

इसमें वे दो स्वर ध्वनियाँ आती हैं, जिनका उच्चारण कंठ और तालु के सहयोग से होता है। जैसे- ए और ऐ

कंठोष्ठ्य ध्वनियाँ- kath oshth varn kaun hai

इन ध्वनियों का जन्म कंठ और ओष्ठों के सहयोग से होता है; जैसे ओ और औ

जिह्वामूलक ध्वनियाँ- jeehvamooliy varn kaun se hote hai

अरबी-फारसी से हिंदी में अपनाई गई तीन ध्वनियों का उच्चारण जिह्वा के बिलकुल पीछे के भाग (मूल) से होता है। ये हैं- क़, ख़ और ग़

वर्त्स्य ध्वनियाँ- varstya varn kaun se hai

इसके अंतर्गत अरबी-फारसी की ज़ और फ़ की ध्वनि आती है।

काकल्य- kaakaly varn kon se hai

जिन व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में मुखगुहा खुली रहती है और वायु बन्द कंठ को खोलकर झटके से बाहर निकल पड़ती है उसे काकल्य व्यंजन ध्वनियाँ कहते है। जैसे हिंदी में ‘ह’। यह ध्वनि हिंदी में स्वरों की तरह ही बिना किसी अवरोध के उच्चरित होती है। हिंदी में ‘ह’ महाप्राण अघोष ध्वनि है।

हिंदी की ध्वनियों का उनके उच्चारण प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण-

स्पर्श- sparsh varn kaun se hote hai

स्पर्श ध्वनियाँ वे ध्वनियाँ है, जिसके उच्चारण में मुख-विवर में कहीं न कहीं हवा को रोका जाता है और हवा बिना किसी घर्षण के मुँह से निकलती है। प, फ, ब, भ, य, द, ध, ट, ठ, ड, ढ, क, ख, ग, घ आदि के उच्चारण में हवा रुकती है। अतः इन्हें स्पर्श ध्वनियाँ कहते है। अंग्रेज़ी में इन्हें स्टाप या एक्सप्लोसिव ध्वनियाँ तथा हिंदी में स्फोट ध्वनियाँ भी कहते हैं।

स्पर्श संघर्ष- sparsh sanghrsh varn kaun se hai

जिन व्यंजनों के उच्चारण में जिह्वा तालु के स्पर्श के साथ-साथ कुछ घर्षण भी करती हुई आए तो ऐसी ध्वनियाँ स्पर्श संघर्षी ध्वनियाँ होती है। जैसे – च, छ, ज, झ।

संघर्षी- sangharshi dhwaniya kaun see hai

वह व्यंजन जिसके उच्चारण में वायु मार्ग संकुचित हो जाता है और वायु घर्षण करके निकलती है। जैसे – फ, ज, स

लुंठित- lunthit varn kaun se hai 

इन व्यंजनों के उच्चारण में जिह्वानोक में लुण्ठन या आलोड़न क्रिया होती है। हिंदी की ‘र’ ध्वनि प्रकम्पित या लुंठित वर्ग में आती है।

पार्श्विक- parshwik dhwani varn

हिंदी की ‘ल’ ध्वनि पार्श्विक ध्वनि है, किंतु जिह्वानोक के दोनों तरफ से हवा के बाहर निकलने का रास्ता है। दोनों तरफ (पार्श्वो) से हवा निकलने के कारण इन ध्वनियों को पार्श्विक ध्वनियाँ कहा जाता है।

उत्क्षिप्त- utkshipt varn

उत्क्षिप्त ध्वनियाँ वे ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में जिह्वानोक जिह्वाग्र को मोड़कर मूर्धा की ओर ले जाते है और फिर झटके के साथ जीभ को नीचे फेंका जाता है। हिंदी की ‘ड’, ‘ढ’ आदि ध्वनियाँ उत्क्षिप्त हैं।

नासिक्य- naasikya varn or dhwaniya

इन व्यंजनों के उच्चारण में कोमलतालु नीचे झुक जाती है। इस कारण श्वासवायु मुख के साथ-साथ नासारन्ध्र से बाहर निकलती है। इसीलिए व्यंजनों में अनुनासिकता आ जाती है। हिंदी में नासिक्य व्यंजन इस प्रकार है – म, म्ह, न, न्ह, ण, ङ।


अल्पप्राण - महाप्राण, घोष - अघोष तालिका :- alppraan mahaapran, ghosh aghosh table

स्थान

अघोष 

घोष

अघोष 

घोष

अल्पप्राण

महाप्राण

अल्पप्राण

महाप्राण

अल्पप्राण

महाप्राण

अल्पप्राण

कण्ठ 
क 
 ख
ग 
ड़ 
-
-
तालु 
च  
छ 
ज 
श 
य  
मूर्द्धा 
ट 
ठ 
ढ़ 
ण 
ष 
र 
दन्त 
त 
थ 
द 
ध 
न 
स 
ल  
ओष्ठ
प 
फ 
ब 
भ 
म 
-
-
-
-
-
ं 
:
-
  • घोष या सघोष दोनों का एक ही अर्थ है।

वायु की शक्ति के आधार पर हिंदी की ध्वनियाँ का वर्गीकरण

अल्पप्राण- alppran kise kahate hai 


जिन ध्वनियों के उच्चारण में फेफड़ों से कम श्वास वायु बाहर निकलती है, उन्हें अल्पप्राण कहते है। हिंदी की प, ब, त, द, च, ज, क, ल, र, व, य आदि ध्वनियाँ अल्पप्राण है।

महाप्राण- mahaapraan kise kahate hai

जिन ध्वनियों के उच्चारण में फेफड़ों से अधिक श्वास वायु बाहर निकलती है, उन्हें महाप्राण कहते है। जैसे—ख, घ, फ, भ, थ, ध, छ, झ आदि महाप्राण है।

घोषत्व की दृष्टि से हिंदी की ध्वनियां

अघोष- aghosh varn

जिन ध्वनियों के उच्चारण में फेफड़ों से श्वास वायु स्वर-तंत्रियों से कंपन करती हुई नहीं निकलती अघोष कहलाती है। जैसे- क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स।

सघोष- saghosh / ghosh varn

जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास वायु स्वर-तंत्रियों में कंपन करती हुई निकलती है, उन्हें सघोष कहते है। जैसे – ग, घ, ङ, ञ, झ, म, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म तथा य, र, ल, व, ड, ढ ध्वनियाँ सघोष है।

हिंदी की ध्वनियों की कुछ अन्य विशेषताएँ -

दीर्घता – deerghata kyaa hai 

किसी ध्वनि के उच्चारण में लगने वाले समय को दीर्घता कहा जाता है। किसी भाषा मे दीर्घता का कोई सामान्य रूप नहीं होता। दीर्घता का अर्थ है किसी ध्वनि का अविभाज्य रूप में लंबा होना। हिंदी व अंग्रेज़ी में जहाँ ह्रस्व व दीर्घ दो वर्ग मिलते है, वहीं संस्कृत में ह्रस्व, दीर्घ व प्लुत तीन मात्राओं की चर्चा की गई है।

बलाघात- balaghaat kya hota hai

ध्वनि के उच्चारण में प्रयुक्त बल की मात्रा को बलाघात कहते है। बलाघात युक्त ध्वनि के उच्चारण के लिए अधिक प्राणशक्ति अर्थात् फेफड़ो से निकलने वाली वायु का उपयोग करना पड़ता है। बलाघात की एकाधिक सापेक्षिक मात्राएँ मिलती है- 

  1. पूर्ण बलाघात 
  2. दुर्बल बलाघात।

लगभग सभी भाषाओं में वाक्य बलाघात का प्रयोग होता है। साधारणतः संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण और क्रिया विशेषण बलाघात युक्त होते है और अव्यय तथा परसर्ग बलाघात वहन नहीं करते है। अंग्रेज़ी में शब्द बलाघात और वाक्य बलाघात दोनों मिलते हैं। हिंदी में बलाघात का महत्व शब्द की दृष्टि से नहीं अपितु वाक्य की दृष्टि से होता है। यथा – यह मोहन नहीं राम है। यहाँ विरोध के लिए राम पर बल दिया जाता है। हिंदी में बल परिवर्तन से शब्द का अर्थ तो नहीं बदलता पर उच्चारण की स्वाभाविकता प्रभावित हो जाती है।

अनुतान – anutaan kyaa hai / aaroh - avaroh 

स्वन-यंत्र में उत्पन्न घोष के आरोह-अवरोह के क्रम को अनुतान कहते है। अन्य शब्दों में स्वर-तंत्रियों के कंपन से उत्पन्न होने वाले सुर का उतार चढ़ाव ही अनुतान है। साधारणतः मानव की सुर-तन्त्रियाँ 42 आवृत्ति प्रति सेकेण्ड की न्यूनतम सीमा से लेकर 2400 की अधिकतम सीमा के मध्य कम्पित होती है। कंपन की मात्रा व्यक्ति की आयु व लिंग पर भी निर्भर करती है। सुर-तन्त्रियाँ जितनी पतली व लचीली होंगी कंपन उतना ही अधिक होगा तथा मोटी व लम्बी सुर तन्त्रियों के कंपन की मात्रा कम होंगी। यह कंपन यदि वाक्य के स्तर पर घटता-बढ़ता है तो उसे अनुतान कहा जाता है और जब शब्द के स्तर पर घटित होता है तब उसे तान कहते हैं। अनुतान की दृष्टि से सम्पूर्ण वाक्य को ही एक इकाई के रूप में लिया जाता है, पृथ्क्-पृथ्क् ध्वनियों को नहीं। सुर के अनेक स्तर हो सकते है, परन्तु अधिकांश भाषाओं में उसके तीन स्तर माने जाते हैं – 
  1. उच्च, 
  2. मध्य 
  3. निम्न
उदाहरण के लिए हिंदी में निम्नलिखित वाक्य अलग-अलग सुर-स्तरों में बोलने पर अलग-अलग अर्थ देता है:-
  1. वह आ रहा है। (सामान्य कथन), 
  2. वह आ रहा है? (प्रश्न), 
  3. वह आ रहा है ! (आश्चर्य)

विवृत्ति – vivrati kya hai / hindi varno me  sankraman kya ahi ?

ध्वनि क्रमों के मध्य उपस्थित व्यवधान को विवृत्ति कहा जाता है। वस्तुतः एक ध्वनि से दूसरी ध्वनि पर जाने की (अर्थात् उच्चारण की) दो विधियाँ हैं। अन्य शब्दों में संक्रमण दो प्रकार का होता है-
  1. जब एक ध्वनि के बाद दूसरी ध्वनि का उच्चारण अव्यवहृत रूप से किया जाता है, तो उसे सामान्य संक्रमण कहते हैं। इसी को आबद्ध संक्रमण कहा गया है। 
  2. जब एक ध्वनि के बाद दूसरी ध्वनि का उच्चारण क्रमिक न होकर कुछ व्यवधान के साथ किया जाता है, तब उसे मुक्त संक्रमण कहते हैं। मुक्त संक्रमण ही विवृत्ति है। 
हिंदी में विवृत्ति के उदाहरण हैं:-
  • तुम्हारे = तुम + हारे, हाथी = हाथ + ही।



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