वात्सल्य रस (Vatsalya ras ki paribhasha):

इसका स्थायी भाव वात्सल्यता (अनुराग) होता है माता का पुत्र के प्रति प्रेम, बड़ों का बच्चों के प्रति प्रेम, गुरुओं का शिष्य के प्रति प्रेम, बड़े भाई का छोटे भाई के प्रति प्रेम आदि का भाव स्नेह कहलाता है यही स्नेह का भाव परिपुष्ट होकर वात्सल्य रस कहलाता है।
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वात्सल्यता वात्सल्य रस का स्थायी भाव है। माता-पिता का अपने पुत्रादि पर जो नैसर्गिक स्नेह होता है, उसे ‘वात्सल्य’ कहते हैं। मैकडुगल आदि मनस्तत्त्वविदों ने वात्सल्य को प्रधान, मौलिक भावों में परिगणित किया है, व्यावहारिक अनुभव भी यह बताता है कि अपत्य-स्नेह दाम्पत्य रस से थोड़ी ही कम प्रभविष्णुतावाला मनोभाव है।
  • संस्कृत के प्राचीन आचार्यों ने देवादिविषयक रति को केवल ‘भाव’ ठहराया है तथा वात्सल्य को इसी प्रकार की ‘रति’ माना है, जो स्थायी भाव के तुल्य, उनकी दृष्टि में चवर्णीय नहीं है।
  • सोमेश्वर भक्ति एवं वात्सल्य को ‘रति’ के ही विशेष रूप मानते हैं - ‘स्नेहो भक्तिर्वात्सल्यमिति रतेरेव विशेष:’
  • लेकिन अपत्य-स्नेह की उत्कटता, आस्वादनीयता, पुरुषार्थोपयोगिता इत्यादि गुणों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि वात्सल्य एक स्वतंत्र प्रधान भाव है, जो स्थायी ही समझा जाना चाहिए।
  • भोज इत्यादि कतिपय आचार्यों ने इसकी सत्ता का प्राधान्य स्वीकार किया है।
  • विश्वनाथ ने प्रस्फुट चमत्कार के कारण वत्सल रस का स्वतंत्र अस्तित्व निरूपित कर ‘वत्सलता-स्नेह’ को इसका स्थायी भाव स्पष्ट रूप से माना है - ‘स्थायी वत्सलता-स्नेह: पुत्राथालम्बनं मतम्’।
हर्ष, गर्व, आवेग, अनिष्ट की आशंका इत्यादि वात्सल्य के व्यभिचारी भाव हैं। उदाहरण -
‘चलत देखि जसुमति सुख पावै।
ठुमुकि ठुमुकि पग धरनी रेंगत,
जननी देखि दिखावै’ 
इसमें केवल वात्सल्य भाव व्यंजित है, स्थायी का परिस्फुटन नहीं हुआ है।

वात्सल्य रस के अवयव:

  • स्थाई भाव : वत्सलता or  स्नेह।
  • आलंबन (विभाव) : पुत्र, शिशु, एवं शिष्य।
  • उद्दीपन (विभाव) : बालक की चेष्टाएँ, तुतलाना, हठ करना आदि तथा उसके रूप एवं उसकी वस्तुएँ ।
  • अनुभाव : स्नेह से बालक को गोद मे लेना, आलिंगन करना, सिर पर हाथ फेरना, थपथपाना आदि।
  • संचारी भाव : हर्ष, गर्व, मोह, चिंता, आवेश, शंका आदि।

वात्सल्य रस का उद्गम:

  • वात्सल्य शब्द वत्स से व्युत्पन्न और पुत्रादिविषयक रति का पर्याय है। 
  • इसका प्रयोग रस की अपेक्षा भाव के लिए अधिक उपयुक्त है, कदाचित इसीलिए प्राचीन आचार्यों ने ‘वात्सल्य रस’ न लिखकर ‘वत्सल रस’ लिखा और वत्सलता या वात्सल्य को उसका स्थायी भाव माना,

भोजराज के अनुसार वात्सल्य रस:

‘श्रृंगारवीर-करुणाद्भुतरौद्रहास्यवीभत्रावत्सलभयानकशान्तनाम्न:’।

विश्वनाथ के अनुसार वात्सल्य रस का लक्षण:

‘स्फुटं चमत्कारितया वत्सलं च रस विदु:।
स्थायी वत्सलतास्नेह: पुत्राद्यालम्बनं मतम्’ 
वात्सल्य स्नेह इसका स्थायी भाव होता है तथा पुत्रादि आलम्बन। आगे उसका विस्तार देते हुए कहते हैं - ‘बाल सुलभ चेष्टाओं के साथ-साथ उसकी विद्या, शौर्य, दया आदि विशेषताएँ उद्दीपन हैं। आलिंगन, अंगसंस्पर्श, शिर का चूमना, देखना, रोमांच, आनन्दाश्रु आदि अनुभव है। अनिष्ट की आशंका, हर्ष, गर्व आदि संचारी माने जाते हैं। इस रस का वर्ण पद्य-गर्भ की छवि जैसा और देवता, लोकमाता या जगदम्बा है’।

भोजराज ने ‘श्रृंगार’ को रसराज सिद्ध करने के प्रसंग में अन्य रसों की गणना करते हुए उनकी संख्या ‘वत्सल रस’ को मिलाकर दस बतायी है, जिससे स्पष्टतया ज्ञात होता है कि उनके समय तक वात्सल्य रस के उद्गम को भी मान्यता प्राप्त हो चुकी थी।

विश्वनाथ के ‘साहित्यदर्पण’ में जिस सांगोपांग रूप में इसका निरूपण हुआ है, उससे ज्ञात होता है कि काल-क्रम में इसको अधिकाधिक मान्यता एवं विकास प्राप्त होता गया। ऐसा प्रतीत होता है कि वात्सल्य रस का उदगम स्रोत दृश्य काव्य में न होकर श्रव्य काव्य में निहित है।

भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में ऐसा कोई सूत्र नहीं है, जिससे इसकी सिद्धि हो सके। आठ नाट्यशास्त्रों के साथ शान्त के मिलाने पर अधिक से अधिक नौ रसों को ही स्वीकृति उसमें मिलती है।
वात्सल्य रस का उद्गम भामह, दण्डी, उद्भट और रुद्रट जैसे आलंकारिकों द्वारा मान्य ‘ग्रेयस’ नामक अलंकार से वात्सल्य रस के उद्गम का कुछ सम्बन्ध सम्भव दिखाई देता है।
  • ‘प्रेय:प्रियतराख्यानम्’ कहकर दण्डी ने ‘प्रेयस्’ अलंकार को प्रीति भाव से सम्बद्ध बताया। 
  • उद्भट ने इसका जो उदाहरण दिया है, उसमें ‘सुतवाल्लभ्यान्निविशेषा स्पृहावती’, ‘मृगी की गोद में बैठे मृग-शावक का’ भावपूर्ण चित्र समाविष्ट है, जिससे ‘प्रेयस्’ के वात्सल्य भाव होने का आभास मिलने लगता है।
  • रुद्रट के ‘काव्यालंकार’ से इसकी पुष्टि होती है।
  • अभिनवगुप्त ने ‘अभिनवभारती’ में नौ रसों की चर्चा करने के उपरान्त अन्य रसों की सम्भावना का संक्षिप्त उल्लेख तथा अपनी ओर से उनका खण्डन करते हुए लिखा है कि, ‘बालस्य मातापित्रादौ स्नेहो भये विश्रान्त:’ अर्थात माता-पिता के प्रति बालक के स्नेह का अन्तर्भाव भय में हो जाता है। ‘वृद्धस्य पुत्रादावपि द्रष्टव्यम्’, अर्थात इसी प्रकार वृद्ध का पुत्रादि के प्रति स्नेह देखा जाना चाहिए।
  • अभिनवगुप्त से सहमति रखकर ही कदाचित् मम्मट ने ‘काव्यप्रकाश’ में लिखा है - ‘रतिर्देवादिविषया व्यभिचारी तथाऽञ्जित: भाव: प्रोक्त:’
  • मम्मट के रस निरूपण से पूर्व ‘तद्विशेषानाह’ की व्याख्या करते हुए ‘बालबोधनीटीकाकार ने जो टिप्पणी दी है, उससे पूर्वोक्त ‘प्रेयस्’ विषयक अनुभानाश्रित धारणा प्रत्यक्ष हो जाती है।  जिस रस का स्थायी भाव स्नेह हो, उसको प्रेयांस कहते हैं और इसी का नाम वात्सल्य है’। 
  • किसी की सम्मति है कि एक श्रृंगार रस ही रस है, किसी ने प्रेयांस, दान्त, उद्धत के साथ वर्णित नव रस को द्वादश रस माना है।
  • स्पष्टत: ही टीकाकार ने यहाँ भोजरात की मान्यता का सन्दर्भ देते हुए प्रेयांस को ही वात्सल्य बताया है, जिसका संकत ‘वत्सलप्रकृते:’ के रूप में ‘सरस्वतीकण्ठामरण’ में ही मिल जाता है। 
  • संस्कृत काव्यशास्त्र में वात्सल्य की स्थिति किस प्रकार एक अलंकार से बढ़ते-बढ़ते रस तक पहुँच गई, इसका कुछ आभास उपर्युक्त विवेचन से हो जाता है।

वात्सल्य रस का स्थायी भाव (vatsalya ras ka sthayi bhav):

वात्सल्य के स्थायी सम्बन्ध में भी कहीं-कहीं भिन्न मत व्यक्त किया गया है:-
  • कवि कर्णपूर ने ‘ममकार’ को, ‘मन्दारमरन्दचम्पू’ के रचयिता ने कार्पण्य को इसका स्थायी भाव माना है। 
  • प्रारम्भ में वात्सल्य का अन्तर्भाव श्रृंगार के अन्तर्गत ही किया जाता रहा, क्योंकि वत्सलता रतिका ही एक विशिष्ट रूप है। 
  • सोमेश्वर ने रति के तीन भेद बताते हुए लिखा है - ‘स्नेह, भक्ति, वात्सल्य रति के ही विशेष रूप हैं। तुल्यों की अन्योन्य रति का नाम स्नेह, उत्तम में अनुत्तम की रति का नाम भक्ति और अनुत्तम में उत्तम रति का नाम वात्सल्य है’ (काव्यप्रकाश की काव्यादर्श टीका)। यहाँ स्नेह, भक्ति और वात्सल्य में भेद किया गया है। इससे वात्सल्य भक्ति की भावना का विलोम सिद्ध होता है। उत्तम और अनुत्तम शब्दों से कदाचित श्रेष्ठता का अर्थ न लेकर छोट-बड़े का अर्थ ही लिया गया प्रतीत होता है।


रीतिकाल में वात्सल्य रस:

  • केशवदास, चिन्तामणि, भिखारीदास आदि प्राय: सभी प्रमुख रीतिकालीन काव्याचार्यों ने वात्सल्य रस की उपेक्षा की है। 
  • उन्होंने इस विषय में ‘साहित्यदर्पण’ का उदाहरण सामने न रखकर नौ रसों की रूढ़ परम्परा का पालन किया है।
  • भारतेन्दु ने अवश्य अपने ‘नाटक’ नामक ग्रन्थ में अन्य रसों के साथ वात्सल्य को स्थान दिया है, पर उसका कारण भिन्न है। 
  • भारतेन्दु ने वात्सल्य के साथ दास्य, सख्य और माधुर्य की भी गणना की है, जिससे प्रकट हो जाता है कि उन्होंने इसकी अवतारणा गौड़ीय सम्प्रदाय के भक्तिशास्त्र के आधार पर की, जो उनके समय तक वैष्णव भक्ति के क्षेत्र में प्राय: सर्वमान्य हो चुका था। 
  • भक्तिशास्त्र के अनुसार भी वात्सल्य भाव ही सिद्ध होता है, क्योंकि रस तो भक्ति स्वयं ही है, जो उक्त चारों भावों के द्वारा भावित होता है।

सूरदास का वात्सल्य रस:

सूरदास द्वारा इस वात्सल्य भाव का इतना विस्तार किया गया कि ‘सूरसागर’ को दृष्टि में रखते हुए वात्सल्य को रस न मानना एक विडम्बना-सा प्रतीत होता है।
  • ‘हरिऔध’ ने मूलत: इसी आधार पर वात्सल्य को रस सिद्ध किया है। यही नहीं, उन्होंने वात्सल्य को वीभत्स, हास्य आदि अनेक रसों से तर्क सहित श्रेष्ठ सिद्ध किया है।
  • कृष्ण लीला के अन्तर्गत सूर का वात्सल्य वर्णन रसत्व प्राप्ति के लिए अपेक्षित सभी अंगों-पांगों को अपने में समाविष्ट किये है। 
दूसरे, भक्ति की दृष्टि से वात्सल्य सूर का अपना भाव नहीं है।
  • अतएव ‘सूरसागर’ में नन्द यशोदा तथा अन्य वयस्क गोपियों का बालकृष्ण के प्रति प्रेम, आकर्षण, खीझ, व्यंग्य, उपालम्भ आदि सब कुछ वात्सल्य रस की ही सामग्री है। 
  • कृष्ण का सौन्दर्य-वर्णन तथा बाल-क्रीड़ाओं का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण भी इसी के अन्तर्गत आता है।

तुलसीदास का वात्सल्य रस:

तुलसी का ‘गीतावली’, ‘कृष्ण गीतावली’ तथा ‘कवितावली’ में ‘रामचरितमानस’ से श्रेष्ठतर वात्सल्य रस की कविता मिलती है।

आधुनिक काल में वात्सल्य रस:

  • हरिऔध’ के ‘प्रियप्रवास’ और मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत’ तथा ‘यशोधरा’ में नयी भूमिकाओं में वात्सल्य का उद्रेक प्राप्त होता है।
  • कदाचित किसी प्राचीन संस्कृत या हिन्दी के आचार्य ने वात्सल्य रस के भेदोपभेद करने की चेष्टा नहीं की है। 
  • कारण स्पष्ट है कि अधिकतर उसे रस ही नहीं माना गया है। 

वात्सल्य रस के भेद (Vatsalya Ras Ke Bhed / Prakar):

आनन्दप्रकाश दीक्षित ने अपने शोधग्रन्थ ‘काव्य में रस’ में वात्सल्य के निम्नलिखित भेद माने हैं:-
    1. गच्छत्प्रवास,
    2. प्रवासस्थित,
    3. प्रवासागत,
    4. करुण।
यह चारों उपभेद वियोग - वात्सल्य के हैं, जो स्वयं एक भेद है।
श्रृंगार की तरह वात्सल्य के भी संयोग और वियोग के आधार पर दो भेद किये गए हैं:-
    1. करुण वात्सल्य नामक विभेद करुण श्रृंगार के समानान्तर है। 
    2. प्रवास पर आधारित विभेद वात्सल्य रस के वियोगपक्ष में उतने उपयुक्त नहीं लगते, जितने विप्रलम्भ श्रृंगार में, क्योंकि एक विशेष अवस्था तक शिशु में प्रवाससामर्थ्य ही नहीं होती।

वात्सल्य रस के उदाहरण (Vatsalya Ras ke Udaharan):

बाल दसा सुख निरखि जसोदा, पुनि पुनि नन्द बुलवाति
अंचरा-तर लै ढ़ाकी सूर, प्रभु कौ दूध पियावति
उदाहरण - 2 - 
सन्देश देवकी सों कहिए
हौं तो धाम तिहारे सुत कि कृपा करत ही रहियो
तुक तौ टेव जानि तिहि है हौ तऊ, मोहि कहि आवै
प्रात उठत मेरे लाल लडैतहि माखन रोटी भावै

Vatsaly Ras
Vatsaly Ras

रस के प्रकार:- 

श्रृंगार रस हास्य रसरौद्र रसकरुण रसवीर रसअद्भुत रसवीभत्स रसभयानक रसशांत रसवात्सल्य रसभक्ति रस

हिन्दी व्याकरण:- 

भाषा वर्ण शब्द पदवाक्य संज्ञा सर्वनाम विशेषणक्रिया क्रिया विशेषण समुच्चय बोधक विस्मयादि बोधक वचन लिंग कारक पुरुष उपसर्गप्रत्यय संधिछन्द समास अलंकाररस श्रंगार रस विलोम शब्द पर्यायवाची शब्द अनेक शब्दों के लिए एक शब्द
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हास्य रस (Hasya Ras Ki Paribhasha):

हास्य रस: हास्य रस का स्थायी भाव हास है। ‘साहित्यदर्पण’ में कहा गया है - "बागादिवैकृतैश्चेतोविकासो हास इष्यते", अर्थात वाणी, रूप आदि के विकारों को देखकर चित्त का विकसित होना ‘हास’ कहा जाता है।

पण्डितराज का कथन है - 'जिसकी, वाणी एवं अंगों के विकारों को देखने आदि से, उत्पत्ति होती है और जिसका नाम खिल जाना है, उसे ‘हास’ कहते हैं।"

भरतमुनि ने कहा है कि दूसरों की चेष्टा से अनुकरण से ‘हास’ उत्पन्न होता है, तथा यह स्मित, हास एवं अतिहसित के द्वारा व्यंजित होता है "स्मितहासातिहसितैरभिनेय:।" भरत ने त्रिविध हास का जो उल्लेख किया है, उसे ‘हास’ स्थायी के भेद नहीं समझना चाहिए।

केशवदास ने चार प्रकार के हास का उल्लेख किया है -

  1. मन्दहास,
  2. कलहास,
  3. अतिहास एवं
  4. परिहास

अन्य साहित्यशास्त्रियों ने छ: प्रकार का हास बताये है -

  1. स्मित
  2. हसित,
  3. विहसित
  4. उपहसित,
  5. अपहसित
  6. अतिहसित।

‘हरिऔध’ के अनुसार हास्य रस के भेद:-

स्मित हास्य रस: जब नेत्रों तथा कपोलों पर कुछ विकास हो तथा अधर आरंजित हों, तब स्मित होता है।
हसित हास्य रस: यदि नेत्रों एवं कपोलों के विकास के साथ दाँत भी दीख पड़ें तो हसित होता है।
विहसित हास्य रस: नेत्रों और कपोलों के विकास के साथ दाँत दिखाते हुए जब आरंजित मुख से कुछ मधुर शब्द भी निकलें, तब विहसित होता है,
उपहसित हास्य रस: विहसित के लक्षणों के साथ जब सिर और कन्धे कंपने लगें, नाक फूल जाए तथा चितवन तिरछी हो जाए, तब उपहसित होता है।
अतिहासित हास्य रस: आँसू टपकाते हुए उद्धत हास को उपहसित तथा आँसू बहाते हुए ताली देकर ऊँचे स्वर से ठहाका मारकर हँसने को 'अतिहसित’ कहते हैं। 
वास्तव में इन्हें हास स्थायी के भेद मानना युक्तिसंगत नहीं है। जैसा ‘हरिओध’ ने कहा है, सभी स्थायी भाव वासना स्वरूप हैं। अतएव अन्त:करण में उनका स्थान है, शरीर में नहीं। स्मितहसितादि शरीर से सम्बद्ध व्यापार है। अतएव ये हसन क्रिया के ही भेद हैं। अश्रु, हर्ष, कम्प, स्वेद, चपलता इत्यादि ‘हास’ स्थायी के साथ सहचार करने वाले व्यभिचारी भाव हैं।
 उदाहरण:
"मैं यह तोहीं मै लखी भगति अपूरब बाल।
लहि प्रसाद माला जु भौ तनु कदम्ब की माल।" 
प्रेमी द्वारा स्पर्श की हुई माल के धारण करने से नायिका के रोमांचित हो जाने पर नायिकाओं के प्रति सखी के इस विनोद में ‘हास’ भाव की व्यंजना है, हास स्थायी प्रस्फुटित नहीं है।

हास्य रस के अवयव:

  • स्थाई भाव - हास।
  • आलंबन (विभाव) - विकृत वेशभूषा, आकार एवं चेष्टाएँ।
  • उद्दीपन (विभाव) - आलम्बन की अनोखी आकृति, बातचीत, चेष्टाएँ आदि।
  • अनुभाव - आश्रय की मुस्कान, नेत्रों का मिचमिचाना एवं अट्टाहस।
  • संचारी भाव - हर्ष, आलस्य, निद्रा, चपलता, कम्पन, उत्सुकता आदि।



रसों में हास्य रस:

हास्य रस नव रसों के अन्तर्गत स्वभावत: सबसे अधिक सुखात्मक रस प्रतीत होता है, पर भरतमुनि  के ‘नाट्यशास्त्र’ के अनुसार यह चार उपरसों की कोटि में आता है। इसकी उत्पत्ति श्रृंगार रस से मानी गई है।इसको स्पष्ट करते हुए भरत ने आगे लिखा है कि वह श्रृंगार की अनुकृति है - "श्रृंगारानुकृतियाँ तु स हास्य इति संशित:।" यद्यपि हास्य श्रृंगार से उत्पन्न कहा गया है, पर उसका वर्ण श्रृंगार रस के ‘श्याम’ वर्ण के विपरीत ‘सित’ बताया गया है - "सितो हास्य: प्रकीर्तित:।" इसी प्रकार हास्य के देवता भी श्रृंगार के देवता विष्णु से भिन्न शैव ‘प्रथम’ अर्थात् शिवगण है। यथा - "हास्य प्रथमदेवत:।"

हास्य रस का स्थायी भाव  (Hasy ras ka sthayi bhav):

हास्य रस का स्थायी भाव हास और विभाव आचार, व्यवहार, केशविन्यास, नाम तथा अर्थ आदि की विकृति है, जिसमें विकृतदेवालंकार ‘धाष्टर्य’ लौल्ह, कलह, असत्प्रलाप, व्यंग्यदर्शन, दोषोदाहरण आदि की गणना की गयी है। ओष्ठ-दंशन, नासा-कपोल स्पन्दन, आँखों के सिकुड़ने, स्वेद, पार्श्वग्रहण आदि अनुभावों के द्वारा इसके अभिनय का निर्देश किया गया है, तथा व्यभिचारी भाव आलस्य, अवहित्य (अपना भाव छिपाना), तन्द्रा, निन्द्रा, स्वप्न, प्रबोध, असूया (ईर्ष्या, निन्दा-मिश्रित) आदि माने गये हैं।
  • साहचर्य भाव से हास्य रस श्रृंगार, वीर और अद्भुत रस का पोषक है। शान्त के भी अनुकूल नहीं है। आधुनिक साहित्य में हास्य के जो रूप विकसित हुए हैं, उन पर बहुत कुछ यूरोपीय चिन्तन और साहित्य का प्रभाव है। वे सब न तो श्रृंगार से उद्भूत माने जा सकते हैं, और न ‘नाट्यशास्त्र’ की व्यवस्था के अनुसार सहचर रसों के पोषक ही कहे जा सकते हैं।
  • हास्य की उत्पत्ति के मूल कारण के सम्बन्ध में भी पर्याप्त मतभेद मिलता है। प्राचीन भारतीय आचार्यों ने उसे ‘राग’ से उत्पन्न माना है। पर फ़्रायड आदि आधुनिक मनोवैज्ञानिक उसके मूल में ‘द्वेष’ की भावना का प्रधान्य मानते हैं। यूरोपीय दार्शनिकों ने अन्य स्वतंत्र मत व्यक्त किए हैं। 
  • शारदातनय ने रजोगुण के अभाव और सत्त्व गुण के आविर्भाव से हास्य की सम्भावना बतायी है, और उसे प्रीति पर आधारित एक चित्त विकार के रूप में प्रस्तुत किया है। ".....स श्रृंगार इतीरित:। तस्मादेव रजोहीनात्समत्वाद्धास्यसम्भव:।"
  • अभिनवगुप्त  ने सभी रसों के आभास (रसाभास) से हास्य की उत्पत्ति मानी है - "तेन करुणाद्यावासेष्वपि हास्यत्वं सर्वेषु मन्तव्यम्।" इस प्रकार करुण, बीभत्स आदि रसों से भी विशेष परिस्थिति में हास्य की सृष्टि हो सकती है। ‘करुणोऽपि हास्य एवेति’ कहकर आचार्य ने इसे मान्यता भी दी है। विकृति के साथ-साथ अनौचित्य को भी इसीलिए उत्पादक कारण बताया गया है। अनौचित्य अनेक प्रकार का हो सकता है। अशिष्टता और वैपरीत्व भी उनकी सीमा में आते हैं।

हास्य रस के भेद: hasy ras ke bhed

हास्य रस के भेद कई आधारों से किये गये हैं। एक आधार है हास्य का आश्रय। जब कोई स्वयं हसे तो वह ‘आत्मस्य’ हास्य होगा, पर जब वह दूसरे को हँसाये तो उसे ‘परस्थ’ हास्य कहा जायेगा। कदाचित् ‘आत्मसमुत्थ’ और ‘परसमुत्थ’ भी इन्हीं को कहा जायेगा। ‘नाट्यशास्त्र’ में गद्यभाग में पहले शब्द युग्म का प्रयोग हुआ है और श्लोक में दूसरे का।
जगन्नाथ ने इन भेदों को स्वीकार तो किया है, पर व्याख्या स्वतंत्र रीति से की है। उनके अनुसार आत्मस्य हास्य सीधे विभावों से उत्पन्न होता है और परस्य हास्य हँसते हुए व्यक्ति या व्यक्तियों को देखने से उपजता है। इनके अतिरिक्त भाव के विकास का क्रम अथवा उसक तारतम्य को भी आधार मानकर हास्य के छ: भेद किये गय हैं, जो अधिक विख्यात हैं। इनको प्रकृति की दृष्टि से उत्तम, मध्यम और अधम इन तीन कोटियों में निम्नलिखित क्रम से रखा गया है -

क- उत्तम

  1. स्मित,
  2. हसित।

ख- मध्यम

  1. विहसित,
  2. उपहसित

ग- अधम

  1. अपहसित,
  2. अतहसित।
"स्मितमथ हसितं विहसितमुपहसितं चापहसित-मतिहसितम्। द्वौ-द्वौ भेदौ स्यातामुत्तमध्यमाधमप्रकृतौ।"
  • भरत ने न केवल यह विभाजन ही प्रस्तुत किया है, वरन् उसकी सम्यक व्याख्या भी की है, जिससे प्रत्येक भेद की विशेषताएँ तथा भेदों का पारस्परिक अन्तर स्पष्ट हो जाता है।

‘नाट्यशास्त्र’ के अनुसार-

  1.  स्मित हास्य में कपोलों के निचले भाग पर हँसी की हलकी छाया रहती है। कटाक्ष-सौष्ठव समन्वित रहते हैं तथा दाँत नहीं झलकते। 
  2. हसित में मुख-नेत्र अधिक उत्फुल हो जाते हैं, कपोलों पर हास्य प्रकट रहता है तथा दाँत भी कुछ-कुछ दीख जाते हैं। 
  3. आँखों और कपोलों का आकुंचित होना, मधुर स्वर के साथ समयानुसार मुख पर लालिमा का झलक जाना विहसित का लक्षण है। 
  4. उपहसित में नाक फूल जाना, दृष्टि में कुटिलता आ जाना तथा कन्धे और सिर का संकुचित हो जाना आवश्यक माना गया है। 
  5. असमय पर हँसना, हँसते हुए आँखों में आँसुओं का आ जाना तथा कन्धे और सिर का हिलने लगना अपहसित की विशेषता है।
  6.  नेत्रों में तीव्रता से आँसू आ जाना, उद्धत चिल्लाहट का स्वर होना तथा हाथों से बगल को दबा लेना अन्तिम भेद अतिहसित का लक्षण बताया गया है। 
इन भेदों को मुख्यतया अनुभावों के आधार पर कल्पित किया गया है। अत: इन्हें शारीरिक ही माना गया है, मानसिक कम। यह अवश्य है कि अनुभाव मनोभावों के अनुरूप ही प्रकट होते हैं और उनसे आन्तरिक मानसिक दशा परिलक्षित होती है।
कुछ संस्कृत आचार्यों ने इन छ: भेदों में ‘आत्म’ और ‘पर’ का भेद दिखाते हुए पहले तीन भेदों को ‘आत्मसमुत्थ’ और अन्तिम तीनों को ‘परसमुत्थ’ बताया है, पर इस तारतम्य-मूलक विभाजन का आधार उत्तरोत्तर विकास ही है। अत: इसमें आत्म और पर का अन्तर करना अनुपयुक्त प्रतीत होता है।
भानुदत्त  ने करुण और वीभत्स की तरह हास्य के भी ‘आत्मनिष्ठ’ और ‘परनिष्ठ’ भेद किये हैं, जो स्पष्टतया भरत के आत्मस्थ और परस्थ के समानान्तर हैं।
हिन्दी के स्वतंत्र आचार्यों में केशवदास ने हास्य के मदहास, कलहास आदि केवल चार स्वतंत्र भेदों का उल्लेख किया है, जिन पर नाट्यशास्त्रौक्त भेदों की गहरी छाया है, पर कुछ अन्तर भी दिखाई देता है। अतएव केशव का विभाजन लक्षण सहित उल्लेखनीय है -
"विकसहिं नयन कपोल कछु दसन-दसन के वास।
‘मदहास’ तासों कहै कोबिद केसवदास।
जहँ सुनिए कल ध्वनि कछू कोमल बिमल विलास।
केसव तन-मन मोहिये वरनत कवि ‘कलहास’।
जहाँ हँसहिं निरसंक है प्रगटहि सुख मुख वास।
आधे-आधे बरन पर उपजि परत ‘अतिहास’।
जहँ परिजन सव हँसि उठें तजि दम्पति की कानि।
केसव कौनहुँ बुद्धिबल सो ‘परिहास’ बखानि।"
केशव के पहले तीन भेद तो भरत के भेदों के समानान्तर और भाव के विकास क्रम पर आधारित है, जिसमें नायक-नायिका की प्रीति परिजनों के परिहास का कारण बन जाए।
केशव के अतिरिक्त अन्य रीतिकालीन काव्याचार्यों में हास्य रस का चिन्तामणि ने सबसे अधिक सांगोपांग विवरण प्रस्तुत किया है, जो ‘साहित्यदर्पण’ में दिये गये विवरण का पद्यानुवादमात्र है।
रसनिवास’ के रचयिता राम सिंह ने हास्य रस का स्थायी भाव ‘हँसना’ माना है।

स्मित, हसित आदि नाट्यशास्त्र में प्राप्त पूर्वोक्त छ: भेद नहीं हो सकते, पर कुछ लोगों ने उन्हें स्थायी भाव का भेद भी माना है, जिसका खण्डन करते हुए आधुनिक विवेचक ‘हरिऔध’ ने लिखा है -
‘किसी-किसी ने स्थायी भाव हास के छ: भेद माने हैं। यह युक्तिसंगत नहीं। सभी स्थायी भाव वासनारूप हैं। अतएव अन्त:करण में उनका स्थान है, शरीर में नहीं। स्मित, हसित, विहसित, अवहसित, उपहसित और अतिहसित के नाम और लक्षण बताते हैं कि उनका निवास स्थान देह है। अतएव ये हसनक्रिया के भेद हैं।
अपने रिमझिम नामक हास्य एकांकी संग्रह की भूमिका में रामकुमार वर्मा ने इन छ: भेदों के साथ ‘आत्मस्थ’ - ‘परस्थ’ का गुणन करके बारह भेद मान लिए हैं, जिसका आधार ‘नाट्यशास्त्र’ में ही मिल जाता है। रामकुमार वर्मा ने पाश्चात्य साहित्य में उपलब्ध हास्य के पाँच मुख्य रूप मानते हुए उनकी परिभाषा इस प्रकार से की है - विकृति (सैटायर ) -
  • आक्रमण करने की दृष्टि से वस्तुस्थिति को विकृत कर उससे हास्य उत्पन्न करना,
कैरीकेचर (विरूप का अतिरंजना) -
  • किसी भी ज्ञात वस्तु या परिस्थिति को अनुपात रहित बढ़ाकर या गिराकर हास्य उत्पन्न करना।
पैरोडी (परिहास) -
  • उदात्त मनोभावों को अनुदात्त सन्दर्भ से जोड़कर हास्य उत्पन्न करना।
आइरनी (व्यंग्य) -
  • किसी वाक्य को कहकर उसका दूसरा ही अर्थ निकालना।
विट (वचन वैदग्ध्य) -
  • शब्दों तथा विचारों का चमत्कारपूर्ण प्रयोग।
फ़्रायड ने इसे दो प्रकार का माना है - सहज चमत्कार और प्रवृत्ति चमत्कार।
सहज चमत्कार में विनोदमात्र रहता है। साहित्य की आधुनिक प्रवृत्तियों को दृष्टि में रखकर उन्होंने अपनी ओर से पाँच स्वतंत्र भेदों की स्थापना की, जिनमें से प्रत्येक में दो-दो उपभेद करके कुछ दस प्रकारों में हास्य रस के प्राय: समस्त प्रचलित स्वरूपों को समाविष्ट करने का प्रयास किया है।
  • इस विभाजन वर्गीकरण के सम्बन्ध में लेखक की अपनी धारणा है कि - "इस भाँति हास्य सहज विनोद से चलकर क्रमश: दृष्टि, भाव, ध्वनि और बुद्धि में नाना रूप ग्रहण करता हुआ विकृति में समाप्त होता है।" 
  • हास्य रस को लेकर उसको विभाजित और वर्गीकृत करने का ऊहापोह स्वतंत्र विवेचन की अपेक्षा रखता है। कुछ बातों पर सरलता से आपत्ति की जा सकती है, जैसे विनोद और ब्याजोक्ति जो ‘विट’ के रूप माने गये हैं, उन्हें बुद्धि विकार से अलग मानना और ‘सहज’ तथा ‘ध्वनि-विकार’ नामक वर्गों में रखना।
वक्रोक्ति भी काव्यशास्त्र में दो प्रकार की मानी गई है -
  1. श्लेष
  2. काकु।
ध्वनिविकार के अन्तर्गत केवल काकुवक्रोक्ति ही आ सकती है, श्लेषवक्रोक्ति नहीं। श्लेष या श्लेषवक्रोक्ति पर आधारित हास्य को भी किसी न किसी वर्ग में समाविष्ट किया जाना चाहिए था। इसी प्रकार ‘ब्याजोक्ति’, जो वाच्यार्थ का ही एक रूप है, ‘ध्वनिविकार’ के अन्तर्ग्त नहीं रखी जा सकती, क्योंकि ध्वनिगत विकार उसका आधार नहीं है, न उसके लिए अनिवार्य ही हैं।

प्रधान रस-

हास्य रस उन प्रधान रसों में है, जिनके आधार पर नाट्यसाहित्य में स्वतंत्र नाट्यरूपों की कल्पना हुई। रूपक के दस भेदों में भाण और प्रहसन न्यूनाधिक हास्य रस से सम्बद्ध हैं। प्रहसन में तो हास्य रस ही प्रधान है। भारतेन्दु के ‘वेदि की हिंसा हिंसा न भवति’ तथा ‘विषस्य विषमौषधम्’ नामक प्रहसन संस्कृत नाट्यशास्त्र के आदर्श पर ही रचे गये। संस्कृत नाटकों में हास्य रस की, सृष्टि करने के लिए विदूषक की अलग से योजना मिलती है, जिस परम्परा का निर्वाह ‘प्रसाद’ के ‘स्कन्दगुप्त’ जैसे अनेक हिन्दी नाटकों तक व्याप्त मिलता है। शेक्सपीयर के सुखान्त नाटकों में भी विदूषक की योजना की गयी है। वस्तुत: विदूषक की कल्पना मध्यकालीन सामन्ती जीवन और संस्कारों की उपज है। आधुनिक नाट्यसाहित्य में हास्य और व्यंग्य के लिए ऐसे किसी स्वतंत्र भाव की सृष्टि आवश्यक नहीं है। जीवन के स्वाभाविक क्रम में अन्य मनोभावों के साथ ही हास्य का भी सहज रूप में समावेश अपेक्षित माना जाता है।

हास्य रस का निरूपण-

हिन्दी काव्य साहित्य में भी हास्य रस का निरूपण बहुत समय तक संस्कृत साहित्य के आदर्श पर होता रहा। रीतिकालीन कविता में बहुधा आश्रयदाताओं अथवा दानदाताओं के प्रति कटु व्यंग्योक्तियाँ की गई हैं। जिन्हें हास्य रस के अन्तर्गत माना जाता है। बेनी कवि के ‘भड़ौआ’ इस क्षेत्र में विशेष प्रसिद्ध हैं। ऐसे ‘भड़ौआ’ का एक संग्रह ‘विचित्रोप्रदेश’ नाम से प्रकाशित कराया गया था। इस प्रकार की रचनाएँ हास्य का उदाहरण ही प्रस्तुत करती हैं। इधर अंग्रेज़ी ‘पैरोडी’ या विडम्बना काव्य की एक स्वतंत्र धारा का विकास पाश्चात्य साहित्य के प्रभाव से हुआ है। उर्दू कवि अकबर का प्रभाव हिन्दी के अर्वाचीन काव्य पर विशेष पड़ा है। ‘बेढ़ब’ बनारसी आदि की रचनाएँ इसका उदाहरण हैं।

गद्यसाहित्य में हास्य रस-

गद्यसाहित्य में भारतेन्दु काल से ही हास्य रस की रचनाएँ होने लगीं, पर उनका क्षेत्र अधिकतर नाटक ही रहा। द्विवेदी काल में व्यंग्यपूर्ण लेखों की भारतेन्दु युगीन परम्परा विशेष विकसित हुई। ‘दूबेजी का चिट्ठा’ आदि इसी के उदाहरण हैं। उपन्यासों के क्षेत्र में जी. पी. श्रीवास्तव को विशेष ख्याति प्राप्त हुई, पर ‘लतखोरीलाल’ ‘लम्बी दाढ़ी’ आदि अनेक उपन्यासों में कुत्रिमता की मात्रा बहुत अधिक है। अमृतलाल नागर, ‘शिक्षार्थी, केशवचन्द्र वर्मा तथा अन्य अनेक नये लेखक शिष्ट हास्य के विकास में विशेष तत्पर है। ऐसे लेखकों में स्वर्गीय अन्नापूर्णाचन्द्र का भी नाम विशेष उल्लेखनीय है। मुख्यतया हास्य रस को लेकर ‘नौंक-झौंक’, ‘मुस्कान’ और ‘तुंग-श्रृंग’ आदि कई पत्रिकाएँ प्रकाशित होती रही हैं। पर यह सत्य है कि हिन्दी का अधिकतर हास्य साहित्य अब तक अपरिपक्व है।

हास्य रस के उदाहरण: hasy ras ke udaharan

नाटकों में प्रहसन की विधा और विदूषक की उपस्थिति ने हास्य का सृजन किया है किंतु वह बहुमुखी नहीं होने पाया। सुभाषित के कई श्लोक अवश्य अच्छे बन पड़े हैं जिनमें विषय और उक्ति दोनों दृष्टियों से हास्य की अच्छी अवतारणा की गई है। कुछ उदाहरण दे देना अप्रासंगिक न होगा।

देवताओं के संबंध का मजाक देखिए। प्रश्न था कि शंकर जी ने जहर क्यों पिया? कवि का उत्तर है कि अपनी गृहस्थी की दशा से ऊबकर।
अत्तुं वांछति वाहनं गणपते राखुं क्षुधार्त: फणी
तं च क्रौंचपते: शिखी च गिरिजा सिंहोऽपिनागानर्न।
गौरी जह्रुसुतामसूयसि कलानार्थ कपालाननो
निविं्वष्ण: स पयौ कुटुम्बकलहादीशोऽपिहालाहलम्।।
शंकर जी का साँप गणेश जी के चूहे की तरफ झपट रहा है किंतु स्वत: उसपर कार्तिकेय जी का मोर दाँव लगाए हुए है। उधर गिरिजा का सिंह गणेश जी के गजमस्तक पर ललचाई निगाहें रख रहा है ओर स्वत: गिरिजा जी भी गंगा से सौतियाडाह रखती हुई भभक रही हैं। समर्थ होकर भी बेचारे शंकर जी इस बेढंगी गृहस्थी से कैसे पार पाते, इसलिए ऊबकर जहर पी लिया।
त्रिदेव खटिया पर नहीं सोते। जान पड़ता है खटमलों से वे भी भयभीत हो चुके हैं।
विधिस्तु कमले शेते हरि: शते महोदधौ
हरो हिमालये शेते मन्ये मत्कुण शंकया।।
दामाद अपनी ससुराल को कितनी सार वस्तु माना करता है परंतु फिर भी किस अकड़बाजी से अपनी पूजा करवाते रहने की अपेक्षा रखा करता है य निम्न श्लोकों में देखिए। दोनों ही श्लोक पर्याप्त काव्यगुणयुक्त हैं। जितना विश्लेषण कीजिए उतना ही मजा आता जाएगा:
असारे खलु संसारे, सारं श्वसुर मंदिरं
हर: हिमालये शेते, हरि: शेते पयोनिधौ।।
सदा वक्र: सदा क्रूर:, सदा पूजामपेक्षते
कन्याराशिस्थितो नित्यं, जामाता दशमो ग्रह:।।
परान्न प्रिय हो कि प्राण, इसपर कवि का निष्कर्ष सुनिए-
परान्नं प्राप्य दुर्बुद्धे! मा प्राणेषु दयां कुरु
परान्नं दुर्लभं लोके प्राण: जन्मनि जन्मनि।।
राजा भोज ने घोषणा की थी कि जो नया श्लोक रचकर लाएगा उसे एक लाख मुद्राएँ पुरस्कार में मिलेंगी परंतु पुरस्कार किसी को मिलने ही नहीं पाता था क्योंकि उसे मेधावी दरबारी पंडित नया श्लोक सुनते ही दुहरा देते और इस प्रकार उसे पुराना घोषित कर देते थे। किंवदंती के अनुसार कालिदास ने निम्न श्लोक सुनाकर बोली बंद कर दी थी। श्लोक में कवि ने दावा किया है कि राजा निन्नानबे करोड़ रत्न देकर पिता को ऋणमुक्त करें और इसपर पंडितों का साक्ष्य ले लें। यदि पंडितगण कहें कि यह दावा उन्हें विदित नहीं है तो फिर इस नए श्लोक की रचना के लिए एक लाख दिए ही जाएँ। इसमें "कैसा छकाया" का भाव बड़ी सुंदरता से सन्निहित है :
स्वस्तिश्री भोजराज! त्रिभुवनविजयी धार्मिक स्ते पिताऽभूत्
पित्रा ते मे गृहीता नवनवति युता रत्नकोटिर्मदीया।
तान्स्त्वं मे देहि शीघ्रं सकल बुधजनैज्र्ञायते सत्यमेतत्
नो वा जानंति केचिन्नवकृत मितिचेद्देहि लक्षं ततो मे।।
हिंदी के वीरगाथाकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल प्राय: पद्यों के ही काल रहे हैं। इस लंबे काल में हास्य की रचनाएँ यदा कदा होती ही रही हैं परंतु वे प्राय: फुटकर ढंग की ही रचनाएँ रही हैं। तुलसीदास जी के रामचरिमानस का नारदमोह प्रसंग शिवविवाह प्रसंग, परशुराम प्रसंग आदि और सूरदास जी के सूरसागर का माखनचोरी प्रसंग, उद्धव-गोपी-संवाद प्रसंग आदि अलबत्ता हास्य के अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। तुलसीदास जी का निम्न छंद, जिसमें जराजर्जर तपस्वियों की शृंगारलालसा पर मजेदार चुटकी ली गई है, अपनी छटा में अपूर्व है-
विंध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे
गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनिवृंद सुखारे।
ह्वै हैं सिला सब चंद्रमुखी, परसे पद मंजुल कंज तिहारे
कीन्हीं भली रघुनायक जू जो कृपा करि कानन को पगु धारे।।
बीरबल के चुटकुले, लाल बुझक्कड़ के लटके, घाघ और भड्डरी की सूक्तियाँ, गिरधर कविराय और गंग के छंद, बेनी कविराज के भड़ौवे तथा और भी कई रचनाएँ इस काल की प्रसिद्ध हैं। भारतजीवन प्रेस ने इस काल की फुटकर हास्य रचनाओं का कुछ संकलन अपने "भड़ोवा संग्रह" में प्रकाशित किया था। इस काल में, विशेषत: दान के प्रसंग को लेकर, कुछ मार्मिक रचनाएँ हुई हैं जिनकी रोचकता आज भी कम नहीं कही जा सकती। उदाहरण देखिए -
चीटे न चाटते मूसे न सूँघते, बांस में माछी न आवत नेरे,
आनि धरे जब से घर मे तबसे रहै हैजा परोसिन घेरे,
माटिहु में कछु स्वाद मिलै, इन्हैं खात सो ढूढ़त हर्र बहेरे,
चौंकि परो पितुलोक में बाप, सो आपके देखि सराध के पेरे।।
एक सूम ने संकट में तुलादान करना कबूल कर लिया था। उसके लिए अपना वजन घटाने की उसकी तरकीबें देखिए -
बारह मास लौं पथ्य कियो, षट मास लौं लंघन को कियो कैठो
तापै कहूँ बहू देत खवाय, तो कै करि द्वारत सोच में पैठो
माधौ भनै नित मैल छुड़ावत, खाल खँचै इमि जात है ऐंठो
मूछ मुड़ाय कै, मूड़ घोटाय कै, फस्द खोलाय, तुला चढ़ि बैठो।।

हिन्दी साहित्य में हास्य:-

वर्तमान काल में हास्य के विषयों और उनकी अभिव्यक्ति करने की शैलियों का बहुत विस्तार हुआ है। इस युग में पद्य के साथ ही गद्य की भी अनेक विधाओं का विकास हुआ है। प्रमुख हैं नाटक तथा एकांकी, उपन्यास तथा कहानियाँ, एवं निबंध। इन सभी विधाओं में हास्यरस के अनुकूल प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा गया और लिखा जा रहा है। प्रतिभाशाली लेखकों ने पद्य के साथ ही गद्य की विविध विधाओं में भी अपनी हास्यरसवर्धिनी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं।
इस युग के प्रारंभिक दिनों के सर्वाधिक यशस्वी साहित्यकार हैं भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र। इनके नाटकों में विशुद्ध हास्यरस कम, वाग्वैदग्ध्य कुछ अधिक और उपहास पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति", "अंधेर नगरी" आदि उनकी हास्य कृतियाँ हैं। उनका "चूरन का लटका" प्रसिद्ध है। उनके ही युग के लाला श्रीनिवास दास, प्रतापनारायण मिश्र, राधाकृष्णदास, प्रेमघन, बालकृष्ण भट्ट आदि ने भी हास्य की रचनाएँ की हैं। प्रतापनारायण मिश्र ने "कलिकौतुक रूपक" नामक सुंदर प्रहसन लिखा है। "बुढ़ापा" नामक उनकी कविता शुद्ध हास्य की उत्तम कृति है।
उस समय अंग्रेजी राज्य अपने गौरव पर था जिसकी प्रत्यक्ष आलोचना खतरे से खाली नहीं थी। अतएव साहित्यकारों ने, विशेषत: व्यंग और उपहास का मार्ग ही पकड़ था और स्यापा, हजो, वक्रोक्ति, व्यंगोक्ति आदि के माध्यम से सुधारवादी सामाजिक चेतना जगाने का प्रयत्न किया था।

भारतेंदुकाल के बाद महावीरप्रसाद द्विवेदी काल आया जिसने हास्य के विषयों और उनकी अभिव्यंजना प्रणालियों का कुद और अधिक परिष्कार एवं विस्तार किया। नाटकों में केवल हास्य का उद्देश्य लेकर मुख्य कथा के साथ जो एक अंतर्कथा या उपकथा (विशेषतः पारसी थिएट्रिकल कंपनियों के प्रभाव से) चला करती थी वह द्विवेदीकाल में प्रायः समाप्त हो गई और हास्य के उद्रेक के लिए विषय अनिवार्य न रह गया। काव्य में "सरगौ नरक ठेकाना नाहिं" सदृश रचनाएँ सरस्वती आदि पत्रिकाओं में सामने आई। उस युग के बावू बालमुकुंद गुप्त और पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी हास्यरस के अच्छे लेखक थे। प्रथम ने "भाषा की अनस्थिरता" नामक अपनी लेखमाला "आत्माराम" नाम से लिखी और दूसरे सज्जन ने "निरंकुशता-निदर्शन" नामक लेखमाला "मनसाराम" नाम से। दोनों ने इन मालाओं में द्विवेदी जी से टक्कर ली है और उनकी इस नोकझोंक की चर्चा साहित्यिकों के बीच बहुत दिनों तक रही। बालमुकुंद गुप्त जी का शिवशंभु का चिट्ठा, चंद्रधर शर्मा गुलेरी का कछुवा धर्म, मिश्रबंधु और बदरीनाथ भट्ट जी के अनेक नाटक, श्री हरिशंकर शर्मा के निबंध, नाटक आदि, गंगा प्रसाद श्रीवास्तव और उग्र जी के अनेक प्रहसन और अनेक कहानियाँ, अपने अपने समय में जनसाधारण में खूब समादृत हुई। जी. पी. श्रीवास्तव में उलटफेर, लंबी दाढ़ी आदि लिखकर हास्यरस के क्षेत्र में धूम मचा दी थी, यद्यपि उनका हास्य उथला उथला सा ही रहा है। निराला जी ने सुंदर व्यंगात्मक रचनाएँ लिखी हैं और उनके कुल्ली भाठ, चतुरी चमार, सुकुल की बीबी, बिल्लेसुर बकरिहा, कुकूरमुत्ता आदि पर्याप्त प्रसिद्ध है। पं. विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक निश्चय ही 'विजयानंद दुबे की चिट्ठियाँ' आदि लिखकर इस क्षेत्र में भी पर्याप्त प्रसिद्धिप्राप्त हैं। शिवपूजन सहाय और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने "हास्यरस के साहित्य की अच्छी श्रीवृद्धि की है। अन्नपूर्णानंद वर्मा को हम हास्यरस का ही विशेष लेखक कह सकते हैं। उनके "महाकवि चच्चा", "मेरी हज़ामत," "मगन रहु चोला", मंगल मोद", "मन मयूर" सभी सुरुचिपूर्ण हैं।
वर्तमान काल में उपेंद्रनाथ अश्क ने "पर्दा उठाओ, परदा गिराओ" आदि कई नई सूझवाले एकांकी लिखे हैं। डॉ॰ रामकुमार वर्मा का एकांकी संग्रह "रिमझिम" इस क्षेत्र में मील का पत्थर माना गया है। उन्होंने स्मित हास्य के अच्छे नमूने दिए हैं। देवराज दिनेश, उदयशंकर भट्ट, भगवतीचरण वर्मा, प्रभाकर माचवे, जयनाथ नलिन, बेढब बनारसी, कांतानाथ चोंच," भैया जी बनारसी, गोपालप्रसाद व्यास, काका हाथरसी, आदि अनेक सज्जनों ने अनेक विधाओं में रचनाएँ की हैं और हास्यरस के साहित्य को खूब समृद्ध किया है। इनमें से अनेक लेखकों की अनेक कृतियों ने अच्छी प्रशंसा पाई है। भगवतीचरण वर्मा का "अपने खिलौने" हास्यरस के उपन्यासों में विशिष्ट स्थान रखता है। यशपाल का "चक्कर क्लब" व्यंग के लिए प्रसिद्ध है। कृष्णचंद्र ने "एक गधे की आत्मकथा" आदि लिखकर व्यंग लेखकों में यशस्विता प्राप्त की है। गंगाधर शुक्ल का "सुबह होती है शाम होती है" अपनी निराली विधा रखता है।
राहुल सांकृत्यायन, सेठ गोविंद दास, श्रीनारायण चतुर्वेदी, अमृतलाल नागर, डॉ॰ बरसानेलाल जी, वासुदेव गोस्वामी, बेधड़क जी, विप्र जी, भारतभूषण अग्रवाल आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं जिन्होंने किसी न किसी रूप में साहित्य के इस उपादेय अंग की समृद्धि की है।

अन्य भाषाओं की कई विशिष्ट कृतियों के अनुवाद भी हिंदी में हो चुके हैं। केलकर के "सुभाषित आणि विनोद" नामक गवेषणापूर्ण मराठी ग्रंथ के अनुवाद के अतिरिक्त मोलिये के नाटकों का, "गुलिवर्स ट्रैवेल्स" का, "डान क्विकज़ोट" का, सरशार के "फिसानए आज़ाद" का, रवींद्रनाथ टैगोर के नाट्यकौतुक का, परशुराम, अज़ीमबेग चग़ताई आदि की कहानियों का, अनुवाद हिंदी में उपलब्ध है।

हास्य रस के उदाहरण (Hasya Ras Ke Udaharan):

Example 1 -

अत्तुं वांछति वाहनं गणपते राखुं क्षुधार्त: फणी
तं च क्रौंचपते: शिखी च गिरिजा सिंहोऽपिनागानर्न।
गौरी जह्रुसुतामसूयसि कलानार्थ कपालाननो
निविं्वष्ण: स पयौ कुटुम्बकलहादीशोऽपिहालाहलम्।।

Example 2 -

विधिस्तु कमले शेते हरि: शते महोदधौ
हरो हिमालये शेते मन्ये मत्कुण शंकया।।

Example 3 -

असारे खलु संसारे, सारं श्वसुर मंदिरं
हर: हिमालये शेते, हरि: शेते पयोनिधौ।।
सदा वक्र: सदा क्रूर:, सदा पूजामपेक्षते
कन्याराशिस्थितो नित्यं, जामाता दशमो ग्रह:।।

Example 4 -

परान्नं प्राप्य दुर्बुद्धे! मा प्राणेषु दयां कुरु
परान्नं दुर्लभं लोके प्राण: जन्मनि जन्मनि।।

Example 5 -

स्वस्तिश्री भोजराज! त्रिभुवनविजयी धार्मिक स्ते पिताऽभूत्
पित्रा ते मे गृहीता नवनवति युता रत्नकोटिर्मदीया।
तान्स्त्वं मे देहि शीघ्रं सकल बुधजनैज्र्ञायते सत्यमेतत्
नो वा जानंति केचिन्नवकृत मितिचेद्देहि लक्षं ततो मे।।

Example 6 -

विंध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे
गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनिवृंद सुखारे।
ह्वै हैं सिला सब चंद्रमुखी, परसे पद मंजुल कंज तिहारे
कीन्हीं भली रघुनायक जू जो कृपा करि कानन को पगु धारे।।

Example 7 -

चीटे न चाटते मूसे न सूँघते, बांस में माछी न आवत नेरे,
आनि धरे जब से घर मे तबसे रहै हैजा परोसिन घेरे,
माटिहु में कछु स्वाद मिलै, इन्हैं खात सो ढूढ़त हर्र बहेरे,
चौंकि परो पितुलोक में बाप, सो आपके देखि सराध के पेरे।।

Example 8 -

बारह मास लौं पथ्य कियो, षट मास लौं लंघन को कियो कैठो
तापै कहूँ बहू देत खवाय, तो कै करि द्वारत सोच में पैठो
माधौ भनै नित मैल छुड़ावत, खाल खँचै इमि जात है ऐंठो
मूछ मुड़ाय कै, मूड़ घोटाय कै, फस्द खोलाय, तुला चढ़ि बैठो।।
hasya ras
hasya ras

रस के प्रकार :-

श्रृंगार रस हास्य रसरौद्र रसकरुण रसवीर रसअद्भुत रसवीभत्स रसभयानक रसशांत रसवात्सल्य रसभक्ति रस

हिन्दी व्याकरण :- 

भाषा वर्ण शब्द पदवाक्य संज्ञा सर्वनाम विशेषणक्रिया क्रिया विशेषण समुच्चय बोधक विस्मयादि बोधक वचन लिंग कारक पुरुष उपसर्गप्रत्यय संधिछन्द समास अलंकाररस श्रंगार रस विलोम शब्द पर्यायवाची शब्द अनेक शब्दों के लिए एक शब्द
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वीर रस (Veer Ras Ki Paribhasha):

वीर रस: वीर रस का स्थाई भाव उत्साह है। श्रृंगार के साथ स्पर्धा करने वाला वीर रस है। श्रृंगार, रौद्र तथा वीभत्स के साथ वीर को भी भरत मुनि ने मूल रसों में परिगणित किया है। वीर रस से ही अदभुत रस की उत्पत्ति बतलाई गई है। वीर रस का 'वर्ण' 'स्वर्ण' अथवा 'गौर' तथा देवता इन्द्र कहे गये हैं। यह उत्तम प्रकृति वालो से सम्बद्ध है तथा इसका स्थायी भाव ‘उत्साह’ है - ‘अथ वीरो नाम उत्तमप्रकृतिरुत्साहत्मक:’। भानुदत्त के अनुसार, पूर्णतया परिस्फुट ‘उत्साह’ अथवा सम्पूर्ण इन्द्रियों का प्रहर्ष या उत्फुल्लता वीर रस है - ‘परिपूर्ण उत्साह: सर्वेन्द्रियाणां प्रहर्षो वा वीर:।’

वीर रस, परिभाषा, भेद और उदाहरण, Veer Ras in Hindi
Veer Ras in Hindi

"शत्रु के उत्कर्ष को मिटाने, दीनों की दुर्दशा देख उनका उद्धार करने और धर्म का उद्धार करने आदि में जो उत्साह मन में उमड़ता है वही वीर रस होता है वीर रस का स्थाई भाव उत्साह है। जिसकी पुष्टि होने पर वीर रस की सिद्धि होती है।"

आचार्य सोमनाथ के अनुसार वीर रस की परिभाषा:-

‘जब कवित्त में सुनत ही व्यंग्य होय उत्साह।
तहाँ वीर रस समझियो चौबिधि के कविनाह।’ 

वीर रस की पहिचान:

सामान्यतय रौद्र एवं वीर रसों की पहचान में कठिनाई होती है। इसका कारण यह है कि दोनों के उपादान बहुधा एक - दूसरे से मिलते-जुलते हैं। दोनों के आलम्बन शत्रु तथा उद्दीपन उनकी चेष्टाएँ हैं। दोनों के व्यभिचारियों तथा अनुभावों में भी सादृश्य हैं। कभी-कभी रौद्रता में वीरत्व तथा वीरता में रौद्रवत का आभास मिलता है। इन कारणों से कुछ विद्वान रौद्र का अन्तर्भाव वीर में और कुछ वीर का अन्तर्भाव रौद्र में करने के अनुमोदक हैं, लेकिन रौद्र रस के स्थायी भाव क्रोध तथा वीर रस के स्थायी भाव उत्साह में अन्तर स्पष्ट है।

वीर रस के अवयव :

  • वीर रस का स्थाई भाव : उत्साह।
  • वीर रस का आलंबन (विभाव) : अत्याचारी शत्रु।
  • वीर रस का उद्दीपन (विभाव) : शत्रु का पराक्रम, शत्रु का अहंकार, रणवाद्य, यश की इच्छा आदि।
  • वीर रस का अनुभाव  : कम्प, धर्मानुकूल आचरण, पूर्ण उक्ति, प्रहार करना, रोमांच आदि।
  • वीर रस का संचारी भाव : आवेग, उग्रता, गर्व, औत्सुक्य, चपलता, धृति, मति, स्मृति, उत्सुकता आदि।

क्रोध एवं उत्साह में भेद:-

भोजराज के अनुसार प्रतिकूल व्यक्तियों में तीक्ष्णता का प्रबोध क्रोध है। कथा कार्यरम्भ में स्थिरता और उत्कट आवेश उत्साह है-‘प्रतिकूलेषु तैक्ष्ण्यस्य प्रबोध: क्रोध उच्यते। कार्यारम्भेषु संरम्भ: स्थेयानुत्साह इष्यते’।

क्रोध में ‘प्रमोदप्रातिकूल्य’, अर्थात् प्रमाता के आनन्द को विच्छिन्न करने की शक्ति होती है, जब कि उत्साह में एक प्रकार का उल्लास या प्रफुल्लता वर्तमान रहती है। क्रोध में शत्रु विनाश एवं प्रतिशोध की भावना होती है, जब कि उत्साह में धैर्य एवं उदारता विद्यमान रहती है। क्रोधाविष्ट मनुष्य उछल-कूद अधिक करता है, लेकिन उत्साहप्रेरित व्यक्ति उमंग सहित कार्य में अनवरत अग्रसर होता है। क्रोध प्राय: अंधा होता है, जब कि उत्साह परिस्थितियों को समझते हुए उन पर विजय-लाभ करने की कामना से अनुप्राणित रहता है। क्रोध बहुधा वर्तमान से सम्बन्ध रखता है, जब कि उत्साह भविष्य से।
क्रोध एवं उत्साह के उपर्युक्त भेदों को ध्यान में रखने पर रौद्र रस एवं वीर रस के भेद को समझा जा सकता है। यों तो रौद्र रस में भी उत्साह संचारी रूप में आ सकता है, क्योंकि उत्साह विस्मय के साथ सभी रसों में संक्रमण कर सकता है, ‘उत्साहविस्मयौ सर्वरसेषु व्यभिचारिणौ’। वीर रस में भी क्रोध समाविष्ट हो सकता है, तथापि रौद्र में यह उत्साह अत्यन्त क्षीण होकर दब जाता है और क्रोध ही आस्वाद्य रहता है तथा वीर में आने वाला क्रोध केवल ‘अमर्थ’ व्यभिचारी होता है और उत्साह स्थायी ही उत्कटतापूर्वक आस्वादित होता है। अतएव रौद्र एवं वीर, दोनों की पृथक-पृथक् सत्ता है और एक में दूसरे को अन्तर्भूत नहीं किया जा सकता।

उत्साह को आधुनिक मनोविज्ञानियों ने प्रधान भावों में गृहीत नहीं किया है, क्योंकि उत्साह से आलम्बन एवं लक्ष्य स्फुट एवं स्थिर नहीं रहते। यद्यपि साहित्यशास्त्रियों ने प्रतिमल्ल, दानपात्र एवं दयापात्र को उत्साह का आलम्बन बताया है, तो भी भाव के अनुभूति काल में इन व्यक्तियों की ओर वैसा ध्यान नहीं रहता है, जैसा अन्य भावों के प्रतीतिकाल में उनके आलम्बनभूत व्यक्तियों की ओर रहता है। उत्साह सभी रसों में संचार करता है। रति में भी उत्साह हो सकता है और भय में भी।


वीर रस का स्थायी भाव (Veer Ras Ka Sthayi Bhav):

अभिनवगुप्त ने तो उत्साह को शान्त रस का ही स्थायी भाव माना है। इन कारणों से कुछ लोग उत्साह को वीर रस का स्थायी भाव नहीं मानते हैं। रौद्र के साथ वीर को समादृत करने के प्रयत्न में वे ‘अमर्ष’ को वीर का स्थायी भाव मान लेते हैं। निन्दा, आक्षेप, अपमान इत्यादि के कारण उत्पन्न चित्त का अभिनिवेश, अर्थात् स्वाभिमान का उदबोध अमर्ष है। लेकिन वीर रस के कतिपय स्वरूपों में अमर्ष का लवलेश भी दृष्टिगत नहीं होता।
उदाहरणतय कर्मवीर, पाण्डित्यवीर, सत्यवीर इत्यादि में अमर्ष खोजने पर भी नहीं मिलता। अतएव अमर्ष वीर रस का स्थायी भाव नहीं माना जा सकता। इधर कुछ लोगों ने ‘साहस’ को वीर का स्थायी भाव उत्पन्न करने का उद्योग किया है।
वास्तव में उत्साह में साहस गृहीत हो सकता है, क्योंकि साहस में एक निर्भीक वीरता पायी जाती है, जो उत्साह का भी महत्त्वपूर्ण अंग है। लेकिन उत्साह को साहस से पृथक् करने वाला तत्त्व उमंग या उल्लास है, जो साहस में सदैव वर्तमान नहीं रह सकता है। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए रामचन्द्र शुक्ल ने कहा है कि ‘आनन्दपूर्ण प्रयत्न या उसकी उत्कण्ठा में ही उत्साह का दर्शन हो सकता है, केवल कष्ट सहने के निश्चेष्ट साहस में नहीं’।

वीर रस की निष्पत्ति के लिए वस्तुत: आचार्यों ने आश्रय में प्रहर्ष अथवा उत्फुल्लता की उपस्थिति आवश्यक मानी है। अतएव उत्साह को ही इसका स्थायी मानना युक्तिसंगत सिद्ध होता है। यह ठीक है कि उत्साह मूल भावों में गृहीत नहीं किया जा सकता, लेकिन रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में - ‘आश्रय या पात्र में उसकी व्यंजना द्वारा श्रोता या दर्शक को ऐसा विविक्त रसानुभव होता है, जो और रसों के समकक्ष है।' अतएव रस-प्रयोजनकर्ता के विचार से उत्साह उपेक्षणीय नहीं हो सकता।

वीर रस के भेद (Veer ras ke bhed):

  1. दानवीर
  2. धर्मवीर 
  3. युद्धवीर
  4. दयावीर
यह उत्साह वास्तव में विभिन्न वस्तुओं के प्रति, जीवन के विभिन्न गुणों अथवा व्यवसाय के प्रति विकसित हो सकता है और इस दृष्टि से वीर रस के कई भेद हो सकते हैं।

आद्याचार्य भरतमुनि ने वीर रस के तीन प्रकार बताये हैं - 1- दानवीर, 2- धर्मवीर, 3- युद्धवीर। भोजराज ने ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ में धर्मवीर को न मानकर उसके बदले दयावीर का निरूपण किया है। भानुदत्त ने भी ‘धर्मवीर’ को न मानकर युद्धवीर, दानवीर और दयावीर - ये ही तीन भेद बताये हैं। विश्वनाथ ने ‘साहित्यदर्पण’ में धर्मवीर को भी मिलाकर वीर रसों को चतुर्विध निरूपित किया है -
‘स च दानधर्मयुद्धैर्दयया च समन्वितश्रतुर्धा स्यात्।'
पण्डितराज ने ‘रसगंगाधर’ में इन चार भेदों को माना है, किन्तु पाण्डित्यवीर, सत्यवीर, बलवीर, क्षमावीर इत्यादि भेदों की सम्भाव्यता का भी निर्देश किया गया है। हिन्दी के आचार्यों में देव ने युद्धवीर, दयावीर तथा दानवीर - ये तीन ही भेद स्वीकृत किये हैं। अन्य आचार्यों ने प्राय: ‘साहित्यदर्पण’ के चार प्रकारों को स्वीकृत किया है। ‘हरिऔध’ ने ‘रसकलश’ में कर्मवीर नामक पाँचवाँ भेद भी उपपादित किया है।
इस प्रकार यदि उत्साह अथवा वीरत्व के व्यापकत्व का विचार किया जाए, तो वीर रस श्रृंगार के समकक्ष ठहरता है। आस्वादनीयता को दृष्टि में रखते हुए ‘साहित्यदर्पण’ के चार प्रकार ही सर्वमान्य हैं। यद्यपि कतिपय विद्वान ‘युद्धवीर रस’ में ही सच्चे उत्साह अथवा शौर्य का प्रस्फुटन सम्भव मानते हैं तथा धर्मवीर, दानवीर इत्यादि को शान्त, भक्ति प्रभृति रसों में अन्तर्भूत करते हैं।

वीर रस के उपादानों को समन्वित रूप से विश्वनाथ ने निर्दिष्ट किया है - ‘विजित किए जाने योग्य इत्यादि व्यक्ति आलम्बन विभाव तथा उनकी चेष्टाएँ इत्यादि उद्दीपन विभाव हैं। युद्ध इत्यादि के सहायक आदि का अन्वेषणादि इसके अनुभाव हैं। धृति, मति, गर्व, स्मृति, तर्क, रोमांचादि इसके संचारी भाव हैं।'

हिन्दी के आचार्य कुलपति ने ‘रसरहस्य’ नामक ग्रन्थ में वीर रस को जो वर्णन किया है, वह सरल एवं सुबोध है:-
‘मिलि विभाव अनुभाव अरु संचारिन की भीर।
व्यंग्य कियो उत्साह जहँ सोई रस है वीर।
युद्ध दान अरु दया पुनि, धर्म सु चारि प्रकार।
अरि बल समर विभाव यह, युद्धवीर बिस्तार।
वचन अरुणता बदन की, अरु फूलै सब अंग।
यह अनुभव बखानिये, सब बीरन के संग’।

युद्धवीर रस (yudh veer ras):-

युद्धवीर का आलम्बन शत्रु, उद्दीपन शत्रु के पराक्रम इत्यादि, अनुभाव गर्वसूचक उक्तियाँ, रोमांच इत्यादि तथा संचारी धृति, स्मृति, गर्व, तर्क इत्यादि होते हैं।

युद्ध वीर रस का उदाहरण (yudh-veer ras ke udaharan):-

‘निकसत म्यान तै मयूखै प्रलै भानु कैसी, फारे तमतोम से गयन्दन के जाल को।
लागति लपटि कण्ठ बैरिन के नागिन सी, रुद्रहिं रिझावै दै दै मुण्डनि के माल को।
लाल छितिपाल छत्रसाल महाबाहु बली, कहाँ लौं बखान करौ तेरी करबालको।
प्रतिभट कटक कटीले केते काटि काटि, कालिका-सी किलक कलेऊ देति कालको।'
यहाँ शत्रु आलम्बन, शत्रु के कार्य उद्दीपन इत्यादि व्यभिचारी भाव हैं। इनसे परिपोष प्राप्त कर उत्साह स्थायी आस्वादित होता है, जिससे युद्धवीर रस की निष्पत्ति हुई है। युद्धवीर वहीं होता है, जहाँ पसीना, मुख या नेत्र की रक्तिमा इत्यादि अनुभाव न हों, क्योंकि ये क्रोध के अनुभाव हैं और इनकी उपस्थिति में रौद्र रस होगा, वीर नहीं।

दानवीर रस (dan veer ras):-

दानवीर के आलम्बन तीर्थ, याचक, पर्व, दानपात्र इत्यादि तथा उद्दीपन अन्य दाताओं के दान, दानपात्र द्वारा की गई प्रशंसा इत्यादि होते हैं। याचक का आदर-सत्कार, अपनी दातव्य-शक्ति की प्रशंसा इत्यादि अनुभाव और हर्ष, गर्व, मति इत्यादि संचारी हैं।

दान वीर रस का उदाहरण (dan veer ras ke udaharan):-

‘जो सम्पत्ति सिव रावनहिं दीन दिये दस माथ।
सो सम्पदा विभीषनहिं सकुचि दीन्ह रघुनाथ।'
यहाँ विभीषण, आलम्बन शिव के दान का स्मरण उद्दीपन, राम का दान देना तथा उसमें अपने गौरव के अनुकूल तुच्छता का अनुभव करना और इसलिए संकोच होना अनुभाव है। धृति, स्मृति, गर्व औत्सुक्य इत्यादि व्यभिचारी हैं। इनसे पुष्ट होकर उत्साह स्थायी दानवीर रस में परिणत हो गया है।

दयावीर रस (daya veer ras):-

दयावीर के आलम्बन दया के पात्र, उद्दीपन उनकी दीन, दयनीय दशा, अनुभाव दयापात्र से सान्त्वना के वाक्य कहना और व्यभिचारी धृति, हर्ष, मति इत्यादि होते हैं।

दया वीर रस का उदाहरण (daya veer ras ke udaharan):-

‘पापी अजामिल पार कियो जेहि नाम लियो सुत ही को नरायन।
त्यों पद्माकर लात लगे पर विप्रहु के पग चौगुने चायन।
को अस दीनदयाल भयो। दसरत्थ के लाल से सूधे सुभायन।
दौरे गयन्द उबारिबे को प्रभु बाहन छाड़ि उपाहने पायन।'
यहाँ गयन्द आलम्बन, गज की दशा उद्दीपन, गज के उद्धार के लिए दौड़ पड़ना अनुभाव तथा धृति, आवेग, हर्ष इत्यादि व्यभिचारी भाव हैं, इनसे पुष्ट होकर उत्साह स्थायी दयावीर रस में परिणत हो गया है।

धर्मवीर रस (dharm veer ras):-

धर्मवीर में वेद शास्त्र के वचनों एवं सिद्धान्तों पर श्रद्धा तथा विश्वास आलम्बन, उनके उपदेशों और शिक्षाओं का श्रवण-मनन इत्यादि उद्दीपन, तदनुकूल आचरण अनुभाव तथा धृति, क्षमा आदि धर्म के दस लक्षण संचारी भाव होते हैं। धर्मधारण एवं धर्माचरण के उत्साह की पुष्टि इस रस में होती है।

धर्म वीर रस का उदाहरण (dharm veer ras ke udaharan):-

‘रहते हुए तुम-सा सहायक प्रण हुआ पूरा नहीं।
इससे मुझे है जान पड़ता भाग्यबल ही सब कहीं।
जलकर अनल में दूसरा प्रण पालता हूँ मैं अभी।
अच्युत युधिष्ठिर आदि का अब भार है तुम पर सभी।’
यहाँ अर्जुन का शास्त्रोक्त भाग्यफल इत्यादि पर विश्वास आलम्बन, प्रण का पूर्ण न होना उद्दीपन, अर्जुन का प्रण-पालनार्थ उद्यत होना अनुभाव और धृति, मति इत्यादि संचारी हैं। इनसे पुष्ट होकर धर्माचरण उत्साह धर्मवीर रस में परिपक्व हो गया है।

युद्धवीर, श्रृंगार रस के साथ:

युद्धवीर का श्रृंगार रस के साथ संयोग कवियों को विशेष प्रिय रहा है। केशवदास के उद्धृत कवित्त में इसी का चित्र है -
‘गति गजराज साजि देह की दिपति बाजि,
हाव रथ भाव पति राजि चल चाल सों।
लाज साज कुलकानि शोच पोच भव मानि,
भौंहें धनु तानि बान लोचन बिसाल सों।
केसोदास मन्द हास असि कुच भट मिरें,
भेंट भये प्रतिभट भाले नख जाल सों।
प्रेम को कवच कसि साहस सहायक है,
जीति रति रण आजु मदनगुपाल सो’। - रसिकप्रिया
साहित्यदर्पण’ में वीर को श्रृंगार रस का विरोधी माना गया है, किन्तु ‘रसगंगाधर’ में इसे श्रृंगार का अविरोधी कहा गया है। विश्वनाथ में भयानक और शान्त के साथ वीर का विरोध ठहराया है, किन्तु पण्डितराज ने केवल भयानक के साथ। वे वीर के साथ रौद्र रस का अविरोध मानते हैं। वस्तुत: वीर एवं शान्त रस में विरोध तथा वीर एवं रौद्र में मैत्रीभाव मानना युक्तिसंगत प्रतीत होता है।

वीर रस के काव्य (veer ras ke kavya):-

हिन्दी साहित्य में रासो ग्रन्थों का वीरकाव्य की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व स्वीकार किया गया है। इनमें से कुछ मुक्तकीय वीरगति के रूप में उपलब्ध हैं और कुछ प्रबन्धकाव्य के रूप में। ‘वीसलदेवरासो’ तथा ‘आल्हा खण्ड’ प्रथम कोटि की और ‘खुमानरासो’ तथा ‘पृथ्वीराजरासो’ द्वितीय श्रेणी की रचनाएँ हैं। इनमें ‘आल्हा खण्ड’ तो प्रारम्भ से ही जनप्रिय काव्य रहा है तथा उत्तर भारत की ग्रामीण जनता में इसके श्रवण के लिए पर्याप्त अनुराग है।

भक्तिकाल एवं रीतिकाल में परिस्थितियों के परिवर्तन के कारण वीर रस की धारा सूखती-सी प्रतीत होती है। तथापि, केशव का ‘वीरसिंहदेव चरित’, मान का ‘राजविलास’, भूषण का ‘शिवराजभूषण’, लाल का ‘छत्रप्रकाश’ इत्यादि ग्रन्थों में वीर रस का प्रवाह प्रवहमान है। ‘रामचरितमानस’ यों तो शान्त रस-प्रधान रचना है तो भी राम - रावण युद्ध के प्रसंग में प्रचुर वीर रस की निष्पत्ति हुई है।

भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के अनन्तर जो राष्ट्रीयता की लहर जनसमुदाय में दौड़ गई, उसके फलस्वरूप एक बार पुन: हिन्दी काव्य में वीर रस की धारा नवजीवन सहित बही है। मैथिलीशरण गुप्त, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, माखनलाल चतुर्वेदी, ‘निराला’, ‘नवीन’, 'सुभद्रा कुमारी चौहान', अनूप शर्मा, ‘दिनकर’, श्यामनारायण पाण्डेय इत्यादि ने अपनी रचनाओं में वीर रस का अजस्र प्रवाह प्रवाहित किया है, जिसमें नव-जाग्रत राष्ट्र की सकल आकांक्षाएँ मूर्तिमती एवं मुखर हो उठी हैं।

वीर रस के उदाहरण: Veer Ras Ke Udaharan

मैं सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानो मुझे,
यमराज से भी युद्ध में, प्रस्तुत सदा मानो मुझे ।
है और कि तो बात क्या, गर्व मैं करता नहीं,
मामा तथा निज तात से भी युद्ध में डरता नहीं ।।
स्पष्टीकरण : अभिमन्यु का ये कथन अपने साथी के प्रति है। इसमें कौरव- आलंबन, अभिमन्यु-आश्रय, चक्रव्यूह की रचना-उद्दीपन तथा अभिमन्यु के वाक्य- अनुभाव है। गर्व, औत्सुक्य, हर्ष आदि संचारी भाव हैं। इन सभी के संयोग से वीर रस के निष्पत्ति हुई है।

उदाहरण : 2 -

साजि चतुरंग सैन अंग में उमंग धारि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत हैं।
भूषन भनत नाद बिहद नगारन के,
नदी नाद मद गैबरन के रलत हैं।।
स्पष्टीकरण : प्रस्तुत पद में शिवाजी कि चतुरंगिणी सेना के प्रयाण का चित्रण है। इसमें शिवाजी के ह्रदय का उत्साह स्थाई भाव है। युद्ध को जीतने कि इच्छा आलंबन है। नगाड़ों का बजना उद्दीपन है। हाथियों के मद का बहना अनुभाव है तथा उग्रता संचारी भाव है। इनमें सबसे पुष्ट उत्साह नामक स्थाई भाव वीर रस की दशा को प्राप्त हुआ है।
Veer Ras
Veer Ras

वीर रस की कविताएँ (poem on veer ras in hindi by famous poets):

  1. Chetak Ki Veerta Kahani, चेतक की वीरता
  2. वीर रस की कविता (Veer Ras Ki Kavita) ~ रामधारी सिंह दिनकर

वीर रस के दोहे (veer ras ke dohe):


  1. दोहे - Dohe, Hindi Couplets, Dohe in Hindi
रस के भेद विस्तार से !
श्रृंगार रस हास्य रसरौद्र रसकरुण रसवीर रसअद्भुत रसवीभत्स रसभयानक रसशांत रसवात्सल्य रसभक्ति रस
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भक्ति रस क्या है?: भक्ति रस की परिभाषा -

इसका स्थायी भाव देव रति है इस रस में ईश्वर कि अनुरक्ति और अनुराग का वर्णन होता है अर्थात इस रस में ईश्वर के प्रति प्रेम का वर्णन किया जाता है।
or
भरतमुनि से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ तक संस्कृत के किसी प्रमुख काव्याचार्य ने ‘भक्ति रस’ को रसशास्त्र के अन्तर्गत मान्यता प्रदान नहीं की। जिन विश्वनाथ ने वाक्यं रसात्मकं काव्यम् के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया और ‘मुनि-वचन’ का उल्लघंन करते हुए वात्सल्य को नव रसों के समकक्ष सांगोपांग स्थापित किया, उन्होंने भी 'भक्ति' को रस नहीं माना। भक्ति रस की सिद्धि का वास्तविक स्रोत काव्यशास्त्र न होकर भक्तिशास्त्र है, जिसमें मुख्यतया ‘गीता’, ‘भागवत’, ‘शाण्डिल्य भक्तिसूत्र’, ‘नारद भक्तिसूत्र’, ‘भक्ति रसायन’ तथा ‘हरिभक्तिरसामृतसिन्धु’ प्रभूति ग्रन्थों की गणना की जा सकती है।
भक्ति रस (Bhakti Ras), What is Bhakti Ras?
Bhakti Ras: मीराबाई का भक्ति रस

भक्ति रस के अवयव भाव(Bhakti Ras Ka Sthayi Bhav):

  • भक्ति रस का स्थाई भाव : देवविषयक रस ।
  • भक्ति रस का आलंबन (विभाव) : परमेश्वर, राम, श्रीकृष्ण आदि।
  • भक्ति रस का उद्दीपन (विभाव) : परमात्मा के अद्भुत कार्यकलाप, सत्संग, भक्तो का समागम आदि ।
  • भक्ति रस का अनुभाव : भगवान के नाम तथा लीला का कीर्तन, आंखो से आँसुओ का गिरना, गदगद हो जाना, कभी रोना, कभी नाचना।
  • भक्ति रस का संचारी भाव : निर्वेद, मति,  हर्ष, वितर्क आदि।

भक्ति रस है या भाव:

भक्ति को रस मानना चाहिए या भाव, यह प्रश्न इस बीसवीं शताब्दी तक के काव्य-मर्मज्ञों के आगे एक जटिल समस्या के रूप में सामने आता रहा है।
  • कुछ विशेषज्ञ भक्ति को बलपूर्वक रस घोषित करते हैं। 
  • कुछ परम्परानुमोदित रसों की तुलना में उसे श्रेष्ठ बताते हैं, कुछ शान्त रस और भक्ति रस में अभेद स्थापित करने की चेष्टा करते हैं 
  • तथा कुछ उसे अन्य रसों से भिन्न, सर्वथा आलौकिक, एक ऐसा रस मानते हैं, जिसके अन्तर्गत शेष सभी प्रधान रसों का समावेश हो जाता है। 
  • उनकी दृष्टि में भक्ति ही वास्तविक रस है। शेष रस उनके अंग या रसाभासमात्र हैं। इस प्रकार भक्ति रस का एक स्वतंत्र इतिहास है, जो रस तत्त्व विवेचन की दृष्टि से महत्ता रखता है।
नाट्यशास्त्र’ के सर्वप्रधान व्याख्याता अभिनव गुप्त ने भरतमुनि के रस-सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए शान्त को नवाँ रस सिद्ध कर दिया, पर नव रसों के अतिरिक्त अन्य किसी रस की स्वतंत्र स्थिति को स्वीकार नहीं किया। सबका नौ में से ही किसी न किसी रस में अन्तर्भाव मान लिया और - ‘एवं भक्तावपि वाच्यमिति’ लिखकर वही बात भक्ति पर भी लागू कर दी। यही नहीं, उन्होंने भक्ति को रस मानने का स्पष्ट निषध भी किया है। यथा -
‘अतएवेश्वरप्रणिधानविषये भक्तिश्रद्धेस्मृतिमतिधृत्युत्साहाद्यनु
प्रविष्टेभ्योऽन्यथैवागमिति न तयो: पृथक् रसत्वेन गणनम्’
अर्थात्: अतएव ईश्वरोपासना विषयक भक्ति और श्रद्धा, स्मृति, मति, धृति, उत्साह आदि में ही समाविष्ट होने के कारण अंगरूप ही है, अत: उनका पृथक् रसरूप से परिगणन नहीं होता।

आचार्य मम्मट का भक्ति रस के विचार:

मम्मट ने भक्ति का न तो शान्त रस में अन्तर्भाव माना और न ही स्वतंत्र रसरूप में ही उसे स्थापित कर सके। अभिनवगुप्त की उक्त धारणा से भी वे सन्तुष्ट नहीं हुए, अतएव मध्यम मार्ग का अनुसरण करते हुए उन्होंने भक्ति की मूल भावना ‘देवादिविषयक रति’ को व्यभिचारी भावों से पुष्ट भाव विशेष के रूप में स्पष्ट मान्यता दे दी -
'रतिर्देवादिविषया व्यभिचारी तथाऽञ्जित:। भाव:, प्रोक्त:।'

क्या रस इतने (नौ) ही हैं? 

इस प्रश्न को सामने रखकर जगन्नाथ ने अपने पूर्वपक्ष का निरूपण करते हुए भक्ति को रस मानने वाले मत के आधार से पूरी अभिज्ञता प्रदर्शित की:-
'भगवान जिसके आलम्बन हैं, रोमांच, अश्रुपातादि जिसके अनुभाव हैं, भागवतादि पुराण श्रवण के समय भगवद्भक्त जिसका प्रकट अनुभव करते हैं और भगवान के प्रति अनुरागस्वरूपा भक्ति ही जिसका स्थायी भाव है, उस जीवन रस का शान्त रस में अन्तर्भाव नहीं किया जा सकता है, क्योंकि अनुराग और विराग परस्पर विरोधी हैं।

भक्ति का सम्बन्ध:

भक्ति देवादिरति विषय से सम्बन्ध रखती है। अतएव वह भाव के अन्तर्गत है और उसमें रसत्व नहीं माना जा सकता।
  • पहले तो लेखक ने रस के विभाव, अनुभाव, संचारी तथा स्थायी सभी रसांगों का उल्लेख करके उसका पूरा स्वरूप खड़ा किया, फिर रस के नवत्व की रूढ़ि के आग्रह से उसने शान्त रस में भक्ति रस के अन्तर्भाव पर विचार किया है। 
  • तदनन्तर ‘मुनि वचन’ का उल्लघंन न हो जाए, यह सोचकर भक्ति को रस न मानकर भाव मानने के पक्ष का ही समर्थन कर दिया। तर्क यह दिया कि देवादिविषयक रति के आधार पर भक्ति को रस माना जायेगा तो पुत्रादि विषयक रति के आधार पर स्वतंत्र वात्सल्य रस को भी मानना पड़ेगा। 
  • यही नहीं, इससे आगे जुगुत्सा और शोक को स्थायी भाव न मानकर शुद्ध भाव ही मनवाने का आग्रह किया जा सकता है। 
  • जिसके परिणामस्वरूप सारा रसशास्त्र विश्रृंखल हो जाने की आशंका होती है। अतएव मुनि वचन से नियन्त्रित रसों की नवत्व गणना ही मान्य होनी चाहिए। 
  • यहाँ पण्डितराज ने निश्चय ही संकीर्ण परम्परावादी दृष्टिकोण का परिचय दिया है। अनुराग और विराग के विरोध की जो महत्त्वपूर्ण समस्या उन्होंने उठायी, उसका भी समुचित विश्लेषण विवेचन नहीं किया गया। 
  • भक्ति में अनुराग ईश्वर के प्रति और विराग संसार के प्रति रहता है, अत: आलम्बन भेद होने से दोनों का वैसे विरोध सिद्ध नहीं होता, जैसे ‘रसगंगाधर’ के रचयिता ने परिकल्पित कर लिया।

भक्ति रस की भी गणना :

भामह, दण्डी आदि के द्वारा मान्य ‘प्रेयस’ अलंकार में जिन रत्यादिक भावों का समावेश होता था, उनमें पुत्रविषयक रति की तरह देवादिविषयक रति की भी गणना की जा सकती है, इसका सप्रमाण निर्देश करते हुए भक्ति रस के विकास का कुछ सम्बन्ध उक्त अलंकार से भी बताया गया है।

भक्ति शास्त्र में गीता :

उपनिषद के अन्तर्गत ब्रह्म के रसमय तथा आनन्दमय होने का अनेक स्थानों पर उल्लेख मिलता है। गीता में भक्ति और भक्त को विशेष महत्ता प्रदान की गई है, किन्तु ‘भागवतपुराण’ को ही भक्ति को व्यापक एवं श्रेष्ठ रसरूप में प्रतिष्ठापित करने का मौलिक श्रेय है। ‘भागवत’ के प्रारम्भ में ही भगवद्विषयक आलौकिक रस तथा उसके रसिकों का उल्लेख मिलता है -


'निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंसुतम्।
पिबत भागवतं रसमालयम् मुहुरहो रसिका भुवि भावुका:।
  • भक्ति रस की महत्ता तथा उसका स्वरूप ‘भागवत’ में स्थान-स्थान पर व्यक्त किया है।

'शाण्डिल्य भक्ति सूत्र' में भक्ति रस:

शाण्डिल्य भक्तिसूत्र में भक्ति को परानुरक्तिरीश्वरे रूप में परिभाषित करते हुए उसे द्वेष की विरोधिनी तथा ‘रस’ से प्रतिपाद्य होने के कारण भी रागस्वरूपा माना गया है-
‘द्वेषप्रतिपक्षभावाद्रसशब्दाच्च राग:।

'नारद भक्तिसूत्र' में भक्ति रस:

‘नारद भक्तिसूत्र’ में भक्ति को परमप्रेमरूपा कहा गया है। इन सूत्र ग्रन्थों में ज्ञान और भक्ति के पारस्परिक सम्बन्ध तथा राग और विराग की भावना के भक्तिगत अविरोध पर भी सूक्ष्म प्रकाश डाला गया है। भक्ति की उपलब्धि अमृतत्व, तृप्ति और सिद्धिकारक होती है तथा उससे शोक, द्वेष, रति और उत्साह आदि का शमन होता है। इसे बताकर शान्त और भक्ति रस के बीच जो द्वैध खड़ा करने की चेष्टा की जाती है, उसका तात्त्विक निषध किया गया है।

'भक्तिरसायन' ग्रन्थ में भक्ति रस:

मधुसूदन सरस्वती के ‘भक्तिरसायन’ नामक ग्रन्थ में भक्ति के आलौकिक महत्त्व और रसत्व का विशद निरूपण करते हुए उसे एक ओर दसवाँ रस बताया गया है, तो दूसरी ओर सब रसों से श्रेष्ठ भी माना गया है। उसके रसांगों का निर्देश भी ‘भक्तिरसायन’ में मिलता है।

'भगवद्भक्तिचन्द्रिका' ग्रन्थ के रचयिता के अनुसार भक्ति रस:

‘भगवद्भक्तिचन्द्रिका’ नामक ग्रन्थ के रचयिता ने भी पराभक्ति को रस कहा है- पराभक्ति: प्रोक्ता रस इति।

भक्ति के रूप :

गौड़ीय सम्प्रदाय के प्रतिष्ठित आचार्य रूपगोस्वामी कृत ‘हरिभक्तिरसामृतसिन्धु’ में काव्य शास्त्रीय दृष्टि से भक्ति रस का विस्तार एक सुनिश्चित व्यवस्था के साथ किया गया है। ‘भागवत’ के बाद भक्ति रस की मान्यता का सर्वाधिक श्रेय रूपगोस्वामी को ही है। उन्होंने भक्ति के पाँच रूप माने हैं -
  1. शान्ति,
  2. प्रीति,
  3. प्रेय,
  4. वत्सल
  5. मधुर।
ये शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य पाँच भाव-भक्ति के मूल हैं। उत्कृष्टता के आधार पर भक्ति रस पराकोटि और अपराकोटि का माना गया है। इन भावों का मूल ‘भागवत’ की नवधा भक्ति तथा ‘नारद भक्ति सूत्र’ की एकादश आसक्तियों में मिल जाता है। ग्रन्थ के दक्षिण विभाग में भक्ति के रसांगों का विवेचन विस्तार सहित किया गया है। चैतन्य महाप्रभु गौड़ीय भक्ति सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे। उनकी उपासना का आधार रसप्लावित तीव्र प्रमानुभूति रही है। अतएव उन्हीं के सम्प्रदाय में भक्ति रस का विशद विस्तार हुआ, यह स्वाभाविक ही था।

रीतिकालीन भक्ति रस:

हिन्दी में रीतिकालीन काव्याचार्यों ने भक्तिमूलक काव्य की तो रचना की, परन्तु काव्य रस के रूप में भक्ति की प्रतिष्ठा का कदाचित् कोई भी प्रयास उन्होंने नहीं किया। देव ने अवश्य भक्ति रस पर विचार करते हुए उसको प्रेम, शुद्ध तथा प्रेमशुद्ध नामक तीन भेद किए हैं और प्रेमाश्रयी भक्ति के अन्तर्गत शान्त की गणना की है।

आधुनिक काल में भक्ति रस:

आधुनिक लेखकों में ‘हरिऔध’ को इस स्थिति से सबसे अधिक क्षोभ हुआ, जो उनके ‘वात्सल्य रस’ शीर्षक में भक्तिविषयक प्रसंगान्तर बनकर तीव्रता से व्यक्त हुआ। भक्ति रस का महत्त्व अन्य रसों की तुलना में बताते हुए उन्होंने लिखा- रसो वै स:। रस शब्द का अर्थ है - य: रसयति आनन्दयति स रस:। वैष्णवों को माधुर्य उपासना परम प्रिय है। अतएव भगवदनुरागरूपा भक्ति को रस मानते हैं।.....मेरा विचार कि वत्सल में उतना चमत्कार नहीं, जितना भक्ति में.... ।

हरिश्चन्द्र के भक्ति रस मे विचार:

हरिश्चन्द्र ने ‘भक्ति या दास्य’ लिखकर उसे दास्य तक परिमित कर दिया है, किन्तु भक्ति बहुत व्यापक और उदात्त है, साथ ही उसमें इतना चमत्कार है कि श्रृंगार रस भी समता नहीं कर सकता।

कन्हैयालाल पोद्दार का भक्ति रस:

कन्हैयालाल पोद्दार ने भी इस समस्या पर विचार करते हुए कि ‘भक्ति भाव है या रस’ अपना मत बलपूर्वक भक्ति के रसत्व के पक्ष में दिया है:-
  • दुख और आश्चर्य है कि जिन साक्ष्याभास श्रृंगारादि रसों में चिदानन्द के अंशांश के स्फुरण मात्र से रसानुभूति होती है, उनको रस संज्ञा दी जाती है और जो साक्षात् चिदानन्दात्मक भक्ति रस है, उसे रस न मानकर भाव माना गया है। 
  • यही क्यों, क्रोध, भय, जुगुत्सा आदि स्थायी भावों को (जो प्रत्यक्षत: सुखविरोधी हैं) रौद्र, करुण, भयानक और बीभत्स रस की संज्ञा दी गई है।

पोद्दार की भक्ति रस के अवयवों की व्याख्या:

पोद्दार ने भक्ति रस के रसांगों की व्याख्या निम्नलिखित रूप में निर्धारित की है और सबको आलौकिक माना है। 
  • स्थायी भाव - भगवद्विषयक अनुराग। 
  • आलम्बन विभाग - भगवान राम, कृष्ण आदि के अखिल विश्व सौन्दर्य निधि दिव्य विग्रह। 
  • अनुभाव- भगवान के अनन्य प्रेमजन्य अश्रु, रोमांच आदि। 
  • व्यभिचारी भाव- हर्षश, सुख, आवेग, चपलता, उन्माद, चिन्ता, दैन्य, धृति, स्मृति और मति। 
शान्त रस की तरह ही पोद्दार भक्ति रस को वास्तविक ब्रह्मनन्द सहोदर बताया है। रति स्थायी आलम्बन भेद से ही रस या भाव होता है, अतएव आलौकिक आलम्बन होने से तो यह आलौकिक भक्ति रस होगा ही।

आधुनिक मराठी रस शास्त्रियों के भक्ति रस के बारे में विचार:

आधुनिक मराठी रस शास्त्रियों ने भक्ति रस की समस्या पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया है। वाटवे ने बीभत्स तथा रौद्र रस को कम करके नव रसों में उनके स्थान पर वात्सल्य और भक्ति रस को स्थापित करने का प्रस्ताव किया है।

डी. के. बेडेकर के अनुसार के भक्ति रस के बारे में विचार:

डी. के. बेडेकर ने इससे भरत के रस-चतुष्टय की व्याख्या भंग होती हुई देखकर वाटवे के मत का तीव्र विरोध किया है। उनकी धारणा है कि रस-व्यवस्था का मूल आधार ‘देवासुर-कथा’ है और रौद्र और बीभत्स को निकाल देने से वह बिना रावण के रामायण जैसी एकपक्षी हो जाती है।

मा. दा. आलतेकर एवं आनन्दप्रकाश दीक्षित के भक्ति रस के बारे में विचार:

मा. दा. आलतेकर भक्ति का श्रृंगार में अन्तर्भाव करते हैं, इसी तरह कृ. कोल्हटकर अद्भुत में। आनन्दप्रकाश दीक्षित ने इनके मत का सतर्क विरोध किया है। द. सा. पंगु निर्जीव आलम्बन होने से, रा. श्री जोग भक्ति की अव्यापकता तथा उसके मूल में भावना न होने से तथा रा. हिंगणेकर शक्ति के विक्रियाहीन होने से उसकी रसत्व का अधिकारी नहीं मानते। 

शिवराम पन्त के भक्ति रस के बारे में विचार:

शिवराम पन्त ने भक्ति के विविध रूपों की कल्पना करके ‘देशभक्ति’ को स्वतंत्र रस बताया है, जिसका स्थायी भाव उन्होंने ‘देशभिमान’ निर्धारत किया है।

भक्ति रस के उदाहरण (Bhakti Ras ke Udaharan):

अँसुवन जल सिंची-सिंची प्रेम-बेलि बोई
मीरा की लगन लागी, होनी हो सो होई

उदाहरण - 2 -

उलट नाम जपत जग जाना
वल्मीक भए ब्रह्म समाना

उदाहरण - 3 -

एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास
एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास

अंतत: निष्कर्ष -

वस्तुत: भक्ति रस का आलम्बन लौकिक न होकर आलौकिक ही मानना समीचीन होगा। भक्तिशास्त्र में निराकार-निर्गुण ब्रह्म की अवतारवाद के आधार पर इस प्रकार सगुण-साकार कल्पना की गई कि वह भक्ति-भावना का वास्तविक आलम्बन बन सका। निश्चय ही भक्ति काव्य में भावना का जो विस्तार भारतीय साहित्य में मिलता है, उसको देखते हुए भक्ति को रस न स्वीकार करना वस्तुस्थिति की उपेक्षा करना है। यह अवश्य है कि महत्त्व के साथ भक्ति रस की अपनी अनेक सीमाएँ भी हैं, जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। भारत की सभी प्रमुख प्रान्तीय भाषाओं में भक्ति का साहित्य उपलब्ध होता है। हिन्दी साहित्य में सूर, तुलसी, मीरा आदि की रचनाएँ भी भक्ति रस का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। निर्गुणधारा के काव्य में जहाँ तक वैष्णव भावना का प्रवेश हुआ है, वहीं तक भक्ति रस की व्याप्ति है, अन्यथा नहीं।
Bhakti Ras
Bhakti Ras

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श्रृंगार रस हास्य रसरौद्र रसकरुण रसवीर रसअद्भुत रसवीभत्स रसभयानक रसशांत रसवात्सल्य रसभक्ति रस
हिन्दी व्याकरण:-
भाषा वर्ण शब्द पदवाक्य संज्ञा सर्वनाम विशेषणक्रिया क्रिया विशेषण समुच्चय बोधक विस्मयादि बोधक वचन लिंग कारक पुरुष उपसर्गप्रत्यय संधिछन्द समास अलंकाररस श्रंगार रस विलोम शब्द पर्यायवाची शब्द अनेक शब्दों के लिए एक शब्द
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रस: रस का शाब्दिक अर्थ होता है- आनन्द। काव्य को पढ़ते या सुनते समय जो आनन्द मिलता है उसे रस कहते हैं। रस को काव्य की आत्मा माना जाता है।
"कविता कहानी या उपन्यास को पढ़ने से जिस आनंद की अनुभूति होती है उसे रस कहते हैं। रस काव्य की आत्मा है।"
आचार्य विश्वनाथ ने साहित्य-दर्पण में काव्य की परिभाषा देते हुए लिखा है-
'वाक्यं रसात्मकं काव्यं' अर्थात रसात्मक वाक्य काव्य है।
नाट्य शास्त्र के छठे पाठ में, भरत ने संस्कृत में लिखा है:-
"विभावानूभावा व्याभिचारी स़ैयोगीचारी निशपाथिहि" - अर्थात विभाव, अनुभव और व्याभिचारी के मिलन से रस का जन्म होता है। 
जिस प्रकार लोग स्वादिष्ट खाना, जो कि मसाले, चावल और अन्य चीज़ो का बना हो, जिस रस का अनुभव करते है और खुश होते है उसी प्रकार स्थायी भाव और अन्य भावों का अनुभव करके वे लोग हर्ष और संतोष से भर जाते है। इस भाव को तब 'नाट्य रस' कहा जाता है। कुछ लोगो की राय है कि रस और भाव की उठता उनके मिलन के साथ होती है। लेकिन यह बात सही नहीं है, क्योंकि रसो का जन्म भावो से होता है परंतु भावो का जन्म रसो से नहीं होता है। इसी कारण के लिये भावो को रसो का मूल माना जाता है। जिस प्रकार मसाले, सब्जी और गुड के साथ स्वाद या रस बनाया जा सके उसी प्रकार स्थाई भाव और अन्य भावों से रस बनाया जा सकता है और ऐसा कोई स्थाईभाव नहीं है जो रस की वृद्धि नहीं करता और इसी प्रकार स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव और व्याभिचारी भावों से रस की वृद्धि होती है।

रस के भाव:

रसों के आधार भाव हैं। भाव मन के विकारों को कहते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं- स्थायी भाव और संचारी भाव। यही काव्य के अंग कहलाते है।
भाव दर्शक को अर्थ देता है। उसे भाव इसिलिए कह्ते हैं क्योकि यह कविता का विषय, शारीरिक क्रिया और मानसिक भावनाओं दर्शको तक पहुँचाता है। भाव 'भविता' 'वसिता' और 'प्रक्रिता' जैसे शब्दों से निर्मित है जिसका अर्थ है होना ।

विभाव या निर्धारक तत्व: 

विभाव वजह या कारण या प्रेरणा होता है। उसे इसीलिए विभाव कहते हैं क्योंकि यह वचन शरीर, इशारों और मानसिक भावनाओं का विवरण करते हैं।
विभाव दो प्रकार का होता है:-
  1. आलंबन विभाव / मौलिक निर्धारक
  2. उद्दीपन विभाव / उत्तेजक निर्धारक
आलंबन विभाव: यह भाव की निर्माण का मुख्य कारण होता है। जब भाव एक आदमी या वस्तु या कर्म की वजह से आकार लेता है उसे आलम्भन विभाव कहते हैं।  उदाहरण: जब प्रिय मित्र को देखने के बाद आनन्द मिलता है। 

उद्दीपन विभाव: जब किसी वस्तु भावना को उत्तेजित करता हे जैसे गुण, कार्रवाई, सजावट, वातावरण आदि।

अनुभाव:

जिसका उद्भव वाक्य और अंगाभिनय से होता हे उसे अनुभाव कहते हैं। यह विभाव का परिणामी है | यह एक व्यक्ति द्वारा महसूस अभिव्यक्ति भावनात्मक भावनाएं हैं।

 रस का स्थायी भाव : Ras and Sthayi Bhav

Hindi me ras
रस का स्थायी भाव - ras ka sthayi bhav
स्थायी भाव: स्थायी भाव से रस का जन्म होता है। जो भावना स्थिर और सार्वभौम होती है उसे स्थायी भाव कहते हैं। रस का उत्पादन भाव के बिना नही हो सकता, इस प्रकार से स्थायी भाव रस के नाम मे मशहूर है। स्थायी भाव 9  होते है:-
  1. रति (प्रेम)
  2. उत्साह (ऊर्जा)
  3. शोक
  4. हास
  5. विस्मय
  6. भय
  7. जुगुप्सा
  8. क्रोध 
  9. निर्वेद
संचारी भाव: रस की वस्तु या विचार का नेतृत्व करते हे उसे संचारी भाव कहते हे।

सात्विक भाव: आश्रय की शरीर से उसके बिना किसी बाहरी प्रयत्न के स्वत: उत्पन्न होने वाली चेष्टाएँ सात्विक अनुभाव कहलाती है इसे 'अयत्नज भाव' भी कहते है.। सात्विक भाव 8 तरह के होते है। स्तम्भ, स्वेद, स्वरभंग, वेपथु (कम्पन), वैवर्ण्य, अश्रुपात, रोमांस व प्रलय ।


रस के प्रकार (Ras Ke Prakar)

रस के प्रकार: रस नौ हैं - वात्सल्य रस को दसवाँ एवं भक्ति रस को ग्यारहवाँ रस भी माना गया है। वत्सलता तथा भक्ति इनके स्थायी भाव हैं। विवेक साहनी द्वारा लिखित ग्रंथ "भक्ति रस- पहला रस या ग्यारहवाँ रस" में इस रस को स्थापित किया गया है।
  1. शृंगार रस
  2. हास्य रस
  3. करुण रस
  4. रौद्र रस
  5. वीर रस
  6. भयानक रस
  7. वीभत्स रस
  8. अद्भुत रस
  9. शांत रस - शांत रस  में भरत का योगदान था।
  10. वात्सल्य रस
  11. भक्ति रस 
इन 9 रस मे से 4 रस मौलिक रस है- वे हैं - श्रृंगार, रौद्र, वीर और वीभत्स। इन चार मौलिक रस से बाकी 9 रस का उद्भव हुआ है- श्रृंगार से हास्य का उद्भव, रौद्र से करुण का उत्भव, वीर से अद्भुत का उत्भव और वीभत्स से भयानक का उद्भव होता है । कुछ रंगों का भी उपयोग रस के वर्णन करने के लिए किया जाता है:-
  • शृंगार के लिए हरा रग
  • रौद्र के लिए लाल
  • वीर के लिए सुनहरा पीला
  • वीभत्स के लिए नीला
  • हास्य के लिए सफेद
  • करुण के लिए कोरा वस्त्र
  • भयानक के लिए काला
  • अद्भुत के लिए पीला
रंग की तरह हर रस के लिए एक एक देवता भी होता है:-
  • श्रृंगार के लिए विष्णु
  • हास्य के लिए शिवगण
  • रौद्र के लिए रुद्र
  • करुण के लिए यम
  • वीर के लिए इन्द्र
  • विभत्स के लिए महाकाल
  • भयानक के लिए कामदेव
  • अद्भुत के लिए ब्रह्मा


शृंगार रस


Sringar Ras
Sringar Ras
शृंगार (कामुक) का भाव रति (प्यार) नामक स्थायी मानोभाव से उत्पन्न होता है। इस दुनिया मे जो कुछ भी सुध और दीप्तिमान है उसे शृंगार कहा जाता है।
यह भाव पुरुष, स्त्री और उज्जवल युवों से संबंधित है। इसका मतलब यह है कि ये पुरुष और स्त्री के बीच प्यार और उसके परिणामो से संबंध रखता है। इस अवधि द्वारा एक बहुत गहरी समझ अवगत को कराया जाता है, श्रृंगार अवधि का मतलब है सौंदर्य। इसलिए श्रृंगार लहरी को सौंदर्य लहरी भी कहा जाता है। प्यार मनुष्य का सौंदर्य है और यही प्यार उसे एक अलग पहचान देती है और उसे सभी कृतियों में सर्वोच्च बनाती है। इस रस के दो कुर्सियां है; अर्थात: स्ंघ मे प्यार (संयोग श्रृंगार) और जुदाई मे प्यार (विप्रलम्भ श्रृंगार)।

संयोग शृंगार

सुखद मौसम, माला, गहने, लोग, अच्छे घर, सुखों का आनंद, उद्यान के यातरें, सौंदर्य की बातें सुनने और देखने और आदि विभावों से सम्भोग श्रृंगार उत्पन्न होता है। आंखें, भौंहे आदि के निपुण आंदोलन द्वारा इस भाव का प्रतिनिधित्व किया जाता है। इसके भावनायें आलस्य, ऊग्रता और जुगुप्सा को छोडकर अन्य तीस भावनायें है। सम्भोग श्रृंगार को फिर से दो भागो में बांटां गया है, जो कि इस प्रकार है:
  1. संक्षिप्त
  2. संपन्न
संक्षिप्त श्रृंगार को सात्विक भाव और शर्म द्वारा दिखाया जाता है और जुदाई के बाद पुनर्मिलन और प्यार से भरी अभिव्यक्ती को सम्पन्न सम्भोग कहा जाता है।

संयोग श्रंगार का उदाहरण:-

मेरे तो गिरधर गोपाल दुसरो न कोई
जाके तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई।

विप्रलम्भ शृंगार

प्यार मे जुदाई के विविधताओं को निर्वेदा, ग्लानि, स्ंक, असूय, श्रमा, सिन्त, उत्सुक्ता, आवेग, भय, विषाद, अवसाद, निद्रा, सुप्ति, विबोध, व्यधि, उन्माद, अपस्मर, जडता, मोह, मरण आदि अन्य क्षणभंगुर भावनायों द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है। रास प्रकारण वीप्रलंभ को दो भागों में बांटा है;

अयोग्य (अभाव मे प्यार)

अपने प्रियतम से मिलने के पेहले, अभिनेत्रि कि दशा को अयोग्य विप्रलम्भ कहा जाता है। यहमुग्ध नायिकामे देखा जाता है, उदाहरण के लिये: शादि से पेहले पारवति का प्यार शिव जी के लिये और रुकमिणी का प्यार कृषण के लिये। अयोग्य विप्रलम्भ के मुख्य तौर पर दस तरिकों से दिखाया जा सकता है, जैसे कि:
  1. अभिलाषा
  2. सिन्त
  3. स्मृति
  4. गुणकध
  5. उद्वेग
  6. प्रलाप
  7. उन्माद
  8. समझवर
  9. जडता
  10. मरण

विप्रयोग (जुदाई मे प्यार)

विप्रयोग दो तरह के होते है: अभाव से उत्पन्न होने वाली जुदाई और असंतोष से उत्पन्न होने वाली जुदाई। अभाव से उत्पन्न होने वाली जुदाई को प्रवास कहा जाता है, यह प्रोषित्प्रिय नामक अभिनेत्रि मे देखा गया है। असंतोष से उत्पन्न होने वाली जुदाई, दो प्रेमी जो कि एक दूसरे को देखना नही चाहते या एक दूसरे को आलंगन नही करना चाहते, के बीच पैदा होता है। यह फिर से दो तरह का होता है:
  1. प्रणय माण
  2. ईर्ष माण

वियोग श्रंगार का उदाहरण:- 

हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी
तुम देखि सीता मृग नैनी।


हास्य रस


Hasy Ras
Hasy Ras
हास्य भाव का जन्म हास्य नामक स्थायी या प्रमुख मनोदषा से होती है। यह विक्रतप्रवेश, धृषटता, विक्रतालंकार, लौल्य, कुहाका, असतप्रलाप, व्यंगदर्शन, और दोसोधारण, आदि निर्धारकों द्वारा उतपन्न होता है। यह ओषथास्पंदन, नासस्पंदन, कापोलस्पंदन, दृष्टिव्याकोस, दृष्टाकुणचन, स्वेद, अस्यराग, पर्सव्याग्रह और आदि इशारों से दिखाया जात है। यह हास्य भाव दो तरह के होते हैं: जब कोई अपने आप से ह्ंसता है, तब आतमस्त कहलाता है और जब कोई दूसरों को हंसाता है तो परस्थ कहलाता है। हंसी के ६ प्रकार होते है:
  1. स्मिता
  2. हसिता
  3. विहसिता
  4. उपहसिता
  5. अपहसिता
  6. अतिहसिता
इन मे से स्मिता और हसिता उत्तम वर्ग के वर्ण है, विहसिता और उपहसिता मधयम वर्ग के वर्ण है, और अपहसिता और अतिहसिता नीचि वर्ग के वर्ण है।

हास्य रस का उदाहरण:-

मातहिं पितहिं उरिन भये नीके।
गुरू ऋण रहा सोंच बड़ जी के।।


करुण रस

Karun Ras
Karun Ras
करुणा का भाव शोक नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। इसका उत्पादन अपनो और रिशतेदारों से जुदाई, धन की हानी, प्राण की हानी, कारावास, उडान, बदकिसमती, आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होति है। अश्रुपात, परिवेदना, मुखषोशना, वैवरन्य, स्वरभेद, निश्वास, और स्मृतिलोप, से इसका प्रतिनिधित्व होता है। निर्वेद, ग्लानि, उत्सुकता, आवेग, मोह, श्रमा, विषाद, दैन्य, व्याधि, जडता, उनमाद, अपस्मर त्रासा, आल्स्य, मरण आदि अन्य इसके श्रणभंगुर भावनाएं है। स्तम्भ, सिहरन, वैवरन्य, अश्रु और स्वरभेद इसके सात्विक भाव है। करुण रस प्रिय जन कि हत्या की दृष्टि, या अप्रिय शब्दो के सुनने से भी इसकी उठता होति है। इसका प्रतिनिधित्व ज़ोर ज़ोर से रोने, विलाप, फूट फूट के रोने और आदि द्वारा होता है।

करुण रस का उदाहरण:-

जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौ जड़ दैव जियावई मोही।।

रौद्र रस

Raudra Ras
Raudra Ras
रौद्र क्रोध नामक स्थायी भाव से आकार लिया है | और यह आमतौर पर राक्षसों दानवो और बुरे आदमियो मे उत्भव होता है |और य्ह निर्धारकों द्वारा उत्पन्न जैसे क्रोधकर्सन, अधिकशेप, अवमन, अन्र्तवचना आदि रौद्र तीन तरफ क है - बोल से रौद्र नेपध्य से रौद्र और अग से रौद्र।

रौद्र रस का उदाहरण:-

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा,
यह मत लछिमन के मन भावा।
संधानेहु प्रभु बिसिख कराला,
उठि ऊदथी उर अंतर ज्वाला।


वीर रस

Veer Ras
Veer Ras
वीर का भाव उत्साह नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। वीर का भाव बेहतर स्वभाव के लोग और उर्जावन उत्साह से विषेशता प्राप्त करती है। इसका उत्पादन असम्मोह, अध्यवसय, नाय, पराक्रम, श्क्ती, प्रताप और प्रभाव आदि अन्य :निर्धारक तत्वों द्वारा होति है। स्थैर्य, धैर्य, शौर्य, त्याग और वैसराद्य से इसका प्रतिनिधित्व होता है। धृर्ती, मति, गर्व, आवेग, ऊग्रता, अक्रोश, स्मृत और विबोध आदि अन्य इसके श्रणभंगुर भावनाएं है। येह तीन प्रकार के होते है:
  1. दानवीर- जो कोई भि दान देके या उपहार देके वीर बना हो, वोह् दानवीर कहलाता है। उदा:कर्ण।
  2. दयावीर- जो कोई भि हर क्षेत्र के लोगो कि ओर सहानुभूति कि भावना प्रकट करता हो, वोह दयावीर कहलाता है। उदा:युद्धिष्टिर।
  3. युद्यवीर-जो कोई भि साहसी, बहादुर हो और मृत्यु के भय से न दरता हो, युद्यवीर कहलाता है। उदा:अर्जुन।

वीर रस का उदाहरण:-

चमक उठी सन सत्तावन में वो तलवार पुरानी थी,
बुंदेलों हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।


भयानक रस

Bhayanak Ras
Bhayanak Ras
भयानक का भाव भय नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। इसका उत्पादन, क्रूर जानवर के भयानक आवाज़ो से, प्रेतवाधित घरों के दृषय से या अपनों कि मृत्यु कि खबर सुनने आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होता है। हाथ, पैर, आखों के कंपन द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। जडता, स्ंक, मोह, दैन्य, आवेग, कपलता, त्रासा, अप्सर्मा और मरण इसकी श्रणभंगुर भावनाएं है। इसके सात्विक भाव इस प्रकार है:
  1. स्तम्भ
  2. स्वेद
  3. रोमान्च
  4. स्वरभेद
  5. वेपथु
  6. वैवर्न्य
  7. प्रलय
यह तीन प्रकार के होते है: व्यज, अपराध और वित्रसितक, अर्थात भय जो छल, आतंक, या गलत कार्य करने से पैदा होता है।

भयानक रस का उदाहरण:-

लंका की सेना कपि के गर्जन रव से काँप गई।
हनुमान के भीषण दर्शन से विनाश ही भांप गई।
उस कंपित शंकित सेना पर कपि नाहर की मार पड़ी।
त्राहि- त्राहि शिव त्राहि- त्राहि शिव की सब ओर पुकार पड़ी।।


वीभत्स रस


Veebhats Ras
Veebhats Ras
वीभत्स का भाव जुगुप्सा नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। इसका उत्पादन, अप्रिय, दूषित, प्रतिकूल, आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होता है। सर्वङसम्हर, मुखविकुनन, उल्लेखन, निशिवन, उद्वेजन, आदि द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। आवेग, मोह, व्याधि इसकी श्रणभंगुर भावनाएं है। यह तीन प्रकार के होते है:
  1. शुद्ध
  2. उद्वेगि
  3. क्षोभना

वीभत्स रस का उदाहरण:-

कोउ अंतडिनी की पहिरि माल इतरात दिखावट।
कोउ चर्वी लै चोप सहित निज अंगनि लावत।।
कोउ मुंडनि लै मानि मोद कंदुक लौं डारत।
कोउ रूंडनि पै बैठि करेजौ फारि निकारत।।


अद्भुत रस

Adbhut Ras
Adbhut Ras
अद्भुत का भाव विस्मय नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है। इसका उत्पादन दिव्यजनदरशन, ईप्सितावाप्ति, उपवनगमण्, देवाल, यगमण, सभादर्शण, विमणदर्शण, आदि अन्य निर्धारक तत्वों द्वारा होता है। नयणविस्तार, अनिमेसप्रेक्षण, हर्ष, साधुवाद, दानप्रबन्ध, हाहाकार और बाहुवन्दना आदि द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। आवेग, अस्थिरता, हर्ष, उन्माद, धृति, जडता इसकी श्रणभंगुर भावनाएं है। स्तम्भ, स्वेद, रोमान्च, अश्रु और प्रलय इस्के सात्विक भाव है। यह भाव दो तरह के होते है:
  1. दिव्य
  2. आनन्दज

अद्भुत रस का उदाहरण:-

इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मति भ्रम मोरि कि आन बिसेखा।।
तन पुलकित मुख वचन न आवा नयन मूँदि चरनन सिुर नावा।।


शांत रस


Shaant Ras
Shaant Ras 
शांत का भाव शांति नामक स्थायी मणोदषा से उतपन्न होता है और यह भाव हर उस चीज़ से हमे मुक्ति दिलाता है जो हमारि मणोदषा को परेशान करती है। इसका उत्पादन तत्त्वज्नान, वैर्ग्य, आशय शुद्धि निर्धारक तत्वों द्वारा होता है। याम, नियाम, अध्यात्माध्यान, धारण, उपासन, आदि द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया जा सकता है। निर्वेद, स्मृति, धृति और मति इसकी श्रणभंगुर भावनाएं है। स्तम्भ और रोमान्च इस्के सात्विक भाव है। शात रस योगियो ने गिना हुआ है | शात रस सारे जीवियो को आनद देते है।

शांत रस का उदाहरण:-

मेरो मन अनत सुख पावे
जैसे उडी जहाज को पंछी फिर जहाज पे आवै।

वात्सल्य रस


Vatsaly Ras
Vatsaly Ras
जब काव्य में किसी की बाल लीलाओं या किसी के बचपन का वर्णन होता है तो वात्सल्य रस होता है।सूरदास ने जिन पदों में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन किया है उनमें वात्सल्य रस है।

वात्सल्य रस का उदाहरण:-

मैया मोरी दाऊ ने बहुत खिजायो।
मोसों कहत मोल की लीन्हो तू जसुमति कब जायो।

भक्ति रस


Bhakti Ras
Bhakti Ras
इसका स्थायी भाव देव रति है इस रस में ईश्वर कि अनुरक्ति और अनुराग का वर्णन होता है अर्थात इस रस में ईश्वर के प्रति प्रेम का वर्णन किया जाता है।

भक्ति रस के उदाहरण:-

अँसुवन जल सिंची-सिंची प्रेम-बेलि बोई
मीरा की लगन लागी, होनी हो सो होई


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भाषा, वर्ण, शब्द, पद, वाक्य, विराम चिन्ह, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रिया विशेषण, समुच्चय बोधक, विस्मयादि बोधक, संबंधबोधक, निपात, वचन, लिंग, कारक, पुरुष, उपसर्ग, प्रत्यय, संधि, छन्द, समास, अलंकार, रस, श्रंगार रस, विलोम शब्द, पर्यायवाची शब्द, अनेक शब्दों के लिए एक शब्द
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